Monday, October 25, 2021
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Homeसंवादकिसानों से इतनी नफरत क्यों ?

किसानों से इतनी नफरत क्यों ?

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वर्तमान परिदृश्य में सरकार की बदलती सोच एवं असंवेदनशीलता के चलते लखीमपुर खीरी में किसानों को निर्दयता पूर्वक कुचलने का जो घिनौना कार्य किया गया, यह भारतीय इतिहास में आज तक का सबसे क्रूरतम एवं तानाशाही व्यवहार प्रदर्शित करने वाला है। वर्तमान की केंद्र सरकार द्वारा लगातार किसानों की अनदेखी उनके प्रति असंवेदनशीलता, संवादहीनता सरकार के सत्ता के घमंड को दर्शाने तथा सरकार की आम जनमानस से बढ़ती दूरी को रेखांकित करता है। लगभग 11 महीने किसान आंदोलन को हो गए।

ऐसे में सरकार अपनी सत्ता के हनक में मतवाली बनी बैठी है और हमारे देश का अन्नदाता सड़कों पर गर्मी, सर्दी, बरसात के महीने में संघर्ष कर रहा है, यह कहां का न्याय है? लखीमपुर के बर्बर दृश्य को देखने पर लगता है कि सरकार किसानों की अनदेखी ही नहीं, बल्कि किसानों के प्रति सरकार के मन में नफरत भरी हुई है। लखीमपुर की वीभत्स एवं क्रूरतम घटना को देखने पर यह प्रश्न उठता है कि किसानों के प्रति इतनी नफरत क्यों? क्या अपने हक की लड़ाई लड़ना कोई गुनाह है? क्या सरकार द्वारा किसानों की आवाज दबाने की लिए इतने क्रूरतम हथकंडों को अपनाने का संकेत लखीमपुर में दिया गया? क्या अपने परिवार, समाज और देश की लड़ाई लड़ना आज के परिदृश्य में गुनाह है? क्या किसानों को कुचलने की घटना लोकतंत्र को कुचलने का बर्बरतम प्रयास है?

आज इन प्रश्नों के बीच देश का आम जनमानस किसानों के साथ व्यथित है। सत्ता में बहुमत प्राप्त करने का पर्याय यह है कि अल्पमत की अनदेखी की जाए। लखीमपुर की घटना से एक दिन पहले हमने 2 अक्टूबर को देश के दो महापुरुषों का जन्मदिवस बड़े उल्लास के साथ मनाया। हमारे प्रधानमंत्री और देश के प्रत्येक नागरिकों द्वारा महात्मा गांधी के ‘अहिंसा के सिद्धांत’ और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के ‘जय जवान-जय किसान’ के उद्घोष को बड़ी तन्मयता से याद किया गया लेकिन अगले ही दिन लखीमपुर खीरी के तिकुनिया के समीप किसानों को क्रूरतम हिंसा के माध्यम से कुचल दिया गया जिसमें वर्तमान सरकार द्वारा अहिंसा के आदर्श एवं जय जवान-जय किसान के निहितार्थ को बर्बरतम तरीके से कुचलने का प्रयास परिलक्षित होता है। यह किसानों को कुचलने की घटना मात्र नहीं है, वरन इस बदलते दौर में यह घटना दर्शाती है कि हमारी केंद्र एवं राज्य सरकार किसानों एवं आम जनमानस के प्रति कितनी बेपरवाह है तथा क्रूरतम व्यवहार करने को प्रतिबद्ध है।

किसानों की हत्या के पश्चात मुख्यमंत्री ने किसानों के प्रति असंवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हुए किसानों से मिलने और शोक संतप्त होने के इतर विपक्ष की पार्टियों के प्रति अपनी निरंकुशता प्रस्तुत करते हुए लखीमपुर में किसी भी पार्टी और नेताओं के जाने पर रोक लगा दी, उनकी यह निरंकुशता और प्रतिशोध कांग्रेस पार्टी के प्रति ज्यादा दिखी। हद तो तब हो गई जब लखीमपुर घटना के अभियुक्त आशीष मिश्र की गिरफ्तार करने के बजाय कांग्रेस महासचिव श्रीमती प्रियंका गांधी को गिरफ्तार किया गया और उनके साथ आए कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा के साथ प्रशासन ने धक्का-मुक्की की। सरकार ने 32 घंटे से भी अधिक समय व्यतीत होने के बाद भी प्रियंका गांधी को रिहा नहीं किया। यह तथ्य भाजपा सरकार का कांग्रेस और महिलाओं के प्रति नफरत को दर्शाने वाला है।

किसानों के प्रति नफरत का यह पहली घटना नहीं है, इससे पहले भारतीय जनता पार्टी द्वारा संचालित हरियाणा सरकार में 28 अगस्त को करनाल में धरना कर रहे किसानों को पुलिस प्रशासन द्वारा बर्बरता पूर्वक पीटा गया और इस घटना पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा खेद प्रगट करने के स्थान पर उनके नफरत भरे बयान सुनने को मिले, जिसमें किसानों के प्रति खट्टर एक सभा को संबोधित करते हुए अपने लोगों से आग्रह कर रहे थे कि-‘जैसे के साथ तैसा व्यवहार करो और 500, 700, 1000 लोगों का समूह बनाओ उन्हें स्वयं सेवक बनाओ उसके बाद हर जगह शठे-शाठ्यं समाचरते का व्यवहार करने को कहा। चिंता मत करो आप जब वहां (जेल) एक महीने, तीन महीने रहोगे तो आप बड़े नेता बन जाओगे, इतिहास में नाम दर्ज होगा।’ इस जनसभा में खट्टर जी द्वारा दिए गये नफरत भरे बयानों से उनका किसानो के प्रति वैचारिक दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है।

भारतीय जनता पार्टी के मंत्री, सांसद, विधायक लगातार अपने बयानों से किसानों को हमेशा प्रताड़ित करने का प्रयास करते रहते हैं, कैबिनेट मंत्री मीनाक्षी लेखी उनको मवाली कहती हैं तो सांसद साक्षी महराज किसानों को आतंकवादी कहते हैं और दूसरे सांसद अक्षयवर लाल गोंड किसानों को सिखिस्तान, पाकिस्तान समर्थित राजनैतिक दलों के लोग कहते हैं। इसी प्रकार से इससे पहले भी भाजपा के कई मंत्री, सांसद और विधायकों ने प्रति नफरत भरे बयान दिए हैं। किसानों की अस्मिता और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने का प्रयास किया है तथा किसानों के गौरव को कलंकित किया है।

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे किसान आंदोलन में इन लगभग 11 महीनों में 500 से अधिक किसानों की जान जा चुकी है और सरकार द्वारा ऐसे में एक भी संवेदनशील बयान न देना, तीन काले कृषि कानूनों में से विचार करके एक भी कानून को निरस्त न करना, सरकार द्वारा लगातार उनको रोकने के लिए पुलिस प्रशासन का प्रयोग, कटीले तारों की घेराबंदी तथा अब अपने दबंग कार्यकर्ताओं द्वारा किसानों का क्रूरतम दमन, ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो सरकार के किसानों के प्रति क्रूरतम व्यवहार तथा नफरत को दर्शाते हैं।


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