Monday, December 6, 2021
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महिला सशक्तिकरण दुनिया की भी जरूरत

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बारूद के ढेर पर बैठी क्रूरता का नित्य नया इतिहास लिखने वाली और मानवता के बजाये अतिवाद की सभी सीमाएं पार कर रही यह दुनिया क्या पुरुष प्रधान अहंकार पूर्ण राजनीति के चलते रसातल की ओर जा रही है? क्या अब एक करुणामयी विश्व के निर्माण के लिए महिलाओं की राजनीति में बराबर की भागीदारी वक़्त की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है? प्रियंका गांधी ने पिछले दिनों लखनऊ में यह घोषणा कर राजनीति में महिला सशक्तिकरण के संबंध नई बहस छेड़ दी कि कांग्रेस पार्टी 2022 में उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देगी। प्रियंका गांधी की इस घोषणा के बाद हालांकि देश के विभिन्न राजनैतिक दलों ने अपने अपने नफे-नुक़्सान के अनुसार अपनी सधी हुई प्रतिक्रियाएं दी हैं, परंतु भारत ही नहीं बल्कि इस समय पूरी दुनिया के जो विस्फोटक हालात बने हुए हैं, उन्हें देखते हुए यह सोचना जरूरी हो गया है कि क्यों न क्रूर, निर्दयी,अहंकारी व बेलगाम सी होती जा रही विश्व की इस पुरुष प्रधान राजनीति पर नकेल डालने लिए विश्व की आधी आबादी को विश्व राजनीति में भी बराबर की भूमिका अदा करने का अवसर दिया जाए?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महिलाओं को चालीस प्रतिशत टिकट देने का विचार प्रियंका गांधी के मन में इसीलिए आया क्योंकि वे एक कोमल ह्रदय रखने वाली महिला हैं। वे स्वयं उच्चकोटि की परवरिश व रहन सहन के बावजूद गत पांच वर्षों से पूरी सक्रियता से जिस प्रकार देश की आम महिलाओं से मिलती रही हैं तथा उनकी दु:ख तकलीफ व जरूरतों को समझती रही हैं, यह फैसला निश्चित रूप से उसी जमीनी अध्ययन का परिणाम है।

अन्यथा देश की पुरुष प्रधान लोकसभा ने तो अभी तक महिलाओं को वह 33 प्रतिशत आरक्षण भी नहीं दिया जिसका वादा देश की महिलाओं से किया गया था। ऐसे में प्रियंका के इस मास्टर स्ट्रोक को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल महिला सशक्तिकरण के नजरिये से ही देखने की जरूरत है।

यदि प्रियंका गांधी के प्रयासों को लंगड़ी मारने या इसमें किंतु परंतु ढूंढने की कोशिश की जाती है तो इसका अर्थ यही होगा कि ऐसा वर्ग महिलाओं को पुरुषों की बराबरी करते नहीं देखना चाहता।

आज विश्व राजनीति में महिलाओं का अग्रणी होना क्यों जरूरी है, इसे चंद उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। अफगानिस्तान का तालिबान राज इस समय पुरुष प्रधान सत्ता का एक वीभत्स उदाहरण है। इनके शासन में राजनीति में महिलाओं की भागीदारी तो दूर उन्हें पढ़ने व बे पर्दा रहने तक की इजाजत नहीं।

महिलाओं की शिक्षा के तो यह इतने बड़े दुश्मन हैं कि मलाला यूसुफ जई पर केवल इसलिए जान लेवा हमला किया क्योंकि वह लड़कियों को शिक्षा हेतु प्रेरित करती थी। दर्जनों स्कूल इसी पुरुष वर्चस्ववादी व महिला विरोधी सोच ने ध्वस्त कर दिये। और तो और यह लोग महिला को केवल बच्चा पैदा करने का माध्यम मात्र समझते हैं।

ठीक इसके विपरीत यूरोपीय देश न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न की राजनैतिक शैली है। न्यूजीलैंड दुनिया का ऐसा पहला देश बना जो प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न के कुशल नेतृत्व में सबसे पहले कोरोना वायरस से मुक्त हुआ। इस सफलता के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने जेसिंडा अर्डर्न की कार्यशैली की भरपूर प्रशंसा की।

यहां तक कि अर्डर्न के नेतृत्व क्षमता की तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे सफल राजनीतिज्ञों से की जाती है। इससे पहले जब 15 मार्च, 2019 को न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर में जिस समय एक के बाद एक कर दो मस्जिदों में भारी हथियारों से लैस एक ईसाई आतंकी ने नमाज पढ़ने वाले मुसलमानों पर गोलियां चलाई थीं।

और इस हमले में 51 लोगों की मौत हो गई थी। उस समय भी प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न की भूमिका ने केवल न्यूजीलैंड के मुसलमानों का नहीं बल्कि पूरे मुस्लिम जगत का दिल जीत लिया था। इस हमले के बाद न्यूजीलैंड में सेमी आटोमेटिक बंदूकों की बिक्री प्रतिबंधित कर दी गई थी।

ईसाई आतंकवादी के कृत्य के लिए खुद मुआफी मांगी। उनके व्यवहार का कारण केवल यही था कि वे एक महिला हैं और कोमल व करुणा पूर्ण ह्रदय रखती हैं।

पिछले दिनों बांग्लादेश में कट्टरपंथी तालिबानी मानसिकता के लोगों ने वहां के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के कई दुर्गा पूजा पंडाल व मंदिरों पर हमला करने जैसा घोर निंदनीय कार्य किया। इन्हीं उपद्रवियों द्वारा हिंदू समुदाय के कई लोगों की हत्या भी कर दी गई। परंतु वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी बहुसंख्यक मुस्लिम समाज की नाराजगी की फिक्र किए बिना दोषियों के विरुद्ध तत्काल सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए।

यहां तक कि प्रधानमंत्री हसीना की कार्रवाई इन कट्टरपंथियों को नागवार गुजरी और उन्होंने शेख हसीना के विरुद्ध कई शहरों में प्रदर्शन भी किए। परन्तु प्रधानमंत्री हसीना के मानवीय रवैय्ये के चलते बंगला देश के मुसलमानों का भी एक बड़ा वर्ग कट्टरपंथी आक्रमणकारियों के दुष्कृत्य की निंदा व प्रदर्शन करने तथा उनके विरुद्ध सख़्त कार्रवाई किये जाने की मांग करते हुए सड़कों पर उतरा। दोषियों की गिरफ्तारियां बिना भेदभाव के हुई।

हमारे देश में भी इंदिरा गांधी से लेकर ममता बनर्जी तक कई ऐसी महिला राजनीतिज्ञ रही हैं, जिन्होंने प्रेम व करुणा के साथ साथ अपने सख़्त फैसलों व हिम्मत से भी पूरी दुनिया में अपनी राजनैतिक काबलियत का परचम लहराया है। लिहाजा आज के हिंसापूर्ण व बहुसंख्यकवाद की राजनीति के दौर में महिला सशक्तिकरण केवल हमारे ही देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की भी बहुत ज्यादा जरूरत है।


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