Tuesday, April 21, 2026
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भाड़े की भीड़ में यूट्यूबर

भारतीय लोकतंत्र में अफवाहों के आधार पर नित्य ही कहीं न कहीं भीड़ जुटती है, तदुपरांत वह किसी सार्वजनिक स्थल पर धरना प्रदर्शन करने लगती है। उसके हाथों में न जाने कहां से विरोध पट्टिकाएं आ जाती हैं। कुछ बैनर भी नमूदार होते हैं। भीड़ ये नहीं जानती, कि वह किस उद्देश्य से एकत्रित है। भीड़ में कुछ यू ट्यूबर अपने अपने मोबाइलों के कैमरे चालू करके जीवंत प्रसारण करने लगते हैं। बरसों तक समाचार चैनलों के किए कवरेज करने के बाद हटाए गए निराश हताश और कुंठित पत्रकार हाथों में माइक लेकर आ धमकते हैं। भीड़ में किसी को पकड़ कर मनमाफिक बात उगलवाना शुरू कर देते हैं।

उनके भी अपने विमर्श तय हैं, कि उन्हें समाज को क्या दिखाना है और क्या छिपाना है। उन्हें अपने किस सहयोग कर्ता अपनी सेवाओं से प्रसन्न करना है और किस किस के विरुद्ध अफवाहों का प्रसारण करके अपने आकाओं से उपहार प्राप्त करने हैं। उनकी देखा देखी कुछ नए लोग भी इस धंधे में उतरते हैं तथा अपने निजी यू ट्यूब चैनल चलाने वालों का अनुसरण करते हैं। उन्हें भी नाच मेरी बुलबुल की तर्ज पर पत्रकारिता ढोनी है। उन्हें न किसी आंगन को टेढ़ा देखना है और न ही नृत्य के लिए उपयोगी उपकरणों की जरुरत महसूस करनी है। उन्हें केवल भीड़ में घुसकर भीड़ का हिस्सा बनना है और भीड़ से अपने मनमुताबिक सवाल करके मन मुताबिक उत्तर प्राप्त करने हैं। यदि कोई उत्तर बुलबुल के मन मुताबिक न मिले, तो संपादन करते समय उस उत्तर दाता के जवाब को ही डिलीट करना उनकी मजबूरी बन जाती है।

यह यू ट्यूबर और चुके हुए पत्रकार की इच्छा पर निर्भर रहता है कि वह क्या देखना चाहता है और क्या दिखाना चाहता है। कई बार दिल्ली के जंतर मंतर पर ऐसे ही नजारे देखने में आते हैं, जब कुछ यू ट्यूबर आपस में ही भिड़ जाते हैं। एक दूसरे को नंगा करने पर उतारू हो जाते हैं। इसके पीछे भी नमक का कर्ज अदा करने की मजबूरी होती है। अपने आका को खुश करने की भावना होती है कि आका खुश हुआ तो यू ट्यूबर का धंधा चलेगा, आका शाबाशी देगा, तो यू ट्यूबर भी खुश होगा। भीड़ का काम ही भेड़ जैसा आचरण अपनाना है और यू ट्यूबर का काम अपने चैनल के माध्यम से भीड़ को उकसाना है। भीड़ सत्य को नही जानती, न वह सत्य को जानना चाहती है। उसे विरोध की वजह से कोई सरोकार नही होता।

भीड़ में किसी की व्यक्तिगत पहचान नही होती। वह किराए पर जुटाई जा सकती है। भीड़ भोली होती है, भीड़ नादान होती है। कई बार वह सच भी उगल देती है। वह बता देती है, कि उसे भाड़े पर लाया गया है। वह न विरोध का कारण जानती है और न ही समर्थन का। भीड़ की कोई गलती नही होती। उसकी केवल दिहाड़ी पक्की होनी चाहिए, क्योंकि भीड़ जानती है, कि उसके वजूद पर ही आंदोलन का वजूद जिंदा है। उसके वजूद से ही यू ट्यूबर की दुकान चलती है। सो भीड़ का अभिनंदन वंदन किया ही जाना यू ट्यूबरों का भी धंधा है, उनकी मजबूरी है।

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