
मुख्य डाक घर की सीढ़ी उतर रहा था तो सफेद बाल वाले एक सज्जन से टकराते बचा।चेहरा पहचाना सा लगा। वो भी थोड़ा रुके, काफी वृद्ध हो गए थे। मैंने उनके नाम से सम्बोधित करते हुए आवाज दिया
‘सुर्री भाई नमस्कार’ वे चौंक गए कि इस नाम से पुकारने वाला कोई बहुत जान-पहचान वाला ही होगा।
‘कौन’, उन्होंने अपना चश्मा लगाया और बोले।
‘मैं श्रीधर का भाई। उनके चाचा का लड़का’ मैंने उन्हें अपना परिचय दिया।
‘बहुत सालों बाद मिल रहे हो, पहचान भी नहीं पा रहा हूं।’ बहुत ही धीरे से कहा उन्होंने। सीढ़ी के एक किनारे पर जाकर खड़े हुए और बोले, ‘क्या हाल हैं श्रीधर का, वह भी रिटायर हो गया था। उसने मोहल्ला छोड़ दिया है ना?’ एक ही बार में वे सब पूछ लिए।
‘दो साल पहले उनका निधन हो गया। भाभी भी नहीं रहीं।’ मैंने उन्हें बताया।
‘ओह ! बताओ उससे मिले हुए 15 साल हो गए। पोस्ट आॅफिस आया था मैं तो सामने वह निगम कार्यालय के गेट के पास मिला था।’ थोड़ा चुप रहे। आंखों से चश्मा उतारा फिर बोले, ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ ‘विमल, मैंने कहा।
‘तुमसे पहले भी यही पोस्ट आॅफिस में ही मुलाकात हुई थी।’
‘जी, और आप अपने पुराने मोहल्ले नहीं आते?’ मैंने यूं ही पूछ लिया।
‘आकर क्या करूंगा। सब आंखों के सामने बीते दिन याद आ जाते हैं। भाई की हत्या हुई है वहां, उस रास्ते से गुजरना भी नहीं होता कभी’, इतना कहते हुए उनकी आंखें डबडबा गई ।
‘ओह! माफ कीजिएगा, मैंने जानबूझकर नहीं पूछा था, ऐसे ही पूछ लिया था। वह बात दिमाग में मेरे थी ही नहीं।’ मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर उन्हें ढाढ़स बंधाया।
‘अच्छा सुर्री भैया चलता हूं’, इतना कहकर मैं सीढ़ी उतरकर बाहर निकल गया।
सुर्री भैया का परिवार पहले हमारे मोहल्ले में ही हमारे घर के ठीक सामने रहता था। बच्चे बड़े होने लगे और जगह की कमी की वजह से वे पास ही दूसरे मोहल्ले में चले गए। मैं जब प्राइमरी स्कूल जाना शुरू किया, तब सुर्री भैया ग्यारहवीं कक्षा में मेरे बड़े पिताजी के लड़के के साथ पढ़ते थे।
उनका पूरा नाम मुझे नहीं पता। मेरा बड़ा भाई दोस्ती में उसे पुकारते, ‘अबे सुर्री कहां जा रहा है?’ यही मुझे याद है। जब मुझे यह अच्छी तरह से पता चल गया कि हम स्वयं किस मोहल्ले, किस शहर में रहते हैं, तब सुर्री भैया बालिग हो चुके थे और उनके बड़े भाई उनसे पांच साल बड़े थे। गबरू जवान, चौड़ी छाती और उसमें ढेर सारे बाल।
उनके परिवार का दूसरे मोहल्ले में रहना हो गया था मगर उनके बड़े भाई निनी से मोहल्ला नहीं छूटा था, क्योंकि वे मोहल्ले के दादा हो गए थे। आसपास की लड़कियां घर से निकलने में डरती थीं, क्योंकि निनी खुले बदन चौक में स्टूल लेकर बैठ जाता था। पूरे मोहल्ले के लोगों की खबर उसे रहती थी। बिना मतलब किसी पर धौंस जमाने की आदत उसे हो गई थी। थोड़ी सफलता मिलने पर आदमी को अहंकार हो जाता है। यह बात निनी पर लागू होती थी।
हमारे घर से थोड़ी दूर पर ही सिटी कोतवाली थी। वहां एक नए थानेदार आए थे। सरदारजी थानेदार का चेहरा बहुत ही रौबीला था। हिंदी फिल्मों के हीरों की नकल कर कोई चुस्त पैंट पहनता तो वे थाने में पकड़कर ले लाते और सिपाही से कहकर उसकी पैंट खोलकर उसमें बोतल डलवाते और बोतल अगर नीचे निकल गई तो शरीफ मानकर छोड़ देते थे।
सरदारजी थानेदार ने हमारे मोहल्ले के कुछ लड़कों को भी बुलवाया था और बोतल नीचे नहीं निकलने पर खूब पिटाई की थी। बाद में पता चला कि उसमें निनी भी था। जब थानेदार साहब अपनी बुलेट में निकलते तो चौक और चबूतरे पर बैठे लड़के भाग जाते या अपने घर के अंदर घुस जाते। निनी बहुत ही बेशर्म था, थानेदार की धौंस का ज्यादा असर उस पर नहीं हुआ।
मैं जब आठवीं कक्षा में था तो उसने मोहल्ले के ही अपने मित्र के साथ एक व्यक्ति को चाकू मार दिया था। दोनों को तीन साल की सजा हुई थी। सजा से छूट के आने के बाद उसकी हिम्मत और बढ़ गई थी। हमारा मोहल्ला उससे छूटा नहीं था। उसके छूट के आने के बाद उसकी पुरानी हरकत से लोग परेशान थे।
हमारे घर में एक किराएदार थे जो शहर के टॉकीज के मैनेजर थे। उन्होंने पिताजी से कहा, ‘इस लड़के निनी से कहना कि टॉकीज में नौकरी करेगा।’ पिताजी ने उससे कहा और वे तैयार हो गए। वे टिकट काटते और उसके बाद फिर मोहल्ले आ जाते। मैं जब दसवीं कक्षा में पहुंचा, उस समय बड़े बाल और बेलबॉटम का दौर था।
फैशन का असर हमारी हमउम्र के लड़कों पर भी हुआ जो स्वाभाविक था। लड़कों को अच्छा पहनता देख पता नहीं निनी को क्या चिढ़ हो होती थी, यह समझ में परे था। वह मोहल्ले के लड़कों के लंबे हुए बाल को अपने सामने खड़े होकर कटवा देता। मोहल्ले में उसका दबदबा था। दो बार उसने मेरे भी बाल कटवा दिए थे। मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गई थी। उससे चिढ़ होने वाले लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी।
एक दिन उसने मुझे धौंस देते हुए कहा, ‘सुन बे, तेरे छोटे भाइयों ने मेरी साइकिल के दोनों चक्कों के नट खोल दिए थे, साइकिल उठाया तो दोनों चक्के अलग-अलग हो गए।’ उसने समझा कि उसके धौंस दिखाने से मैं डर जाऊंगा। मैं उससे भिड़ गया। मेरे बारह और सात साल के छोटे भाई ऐसा नहीं कर सकते थे। लेकिन उसकी बात से मुझे यह महसूस हो गया था कि मोहल्ले में उनके खिलाफ साजिश शुरू हो गई है। सब मन से चाहने लगे थे कि किसी तरह इसकी मौत हो जाए।
दिन बीतते गए और मैं महाविद्यालय का छात्र हो गया था। एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी भी करने लगा था। मेरे पिता मेरी बहनों के विवाह के संबंध में बहुत से गांव का चक्कर लगा रहे थे। वे सरकारी कर्मचारी थे। बार-बार नहीं जा सकते थे। एक दिन उन्होंने बताया कि बड़ी बहन का विवाह तय कर दिया है और लड़के वाले की शर्त थी कि उनकी लड़की का विवाह भी वे कर लें तो जल्द ही सब निपट जाएगा। उन्होंने मेरा भी विवाह उसी घर में गुरावट तय कर दिया था। छत्तीसगढ़ में उस समय यह आम बात थी।
मेरे घर में पिता का कोई विरोध नहीं कर पाता था। दादी ने कहा, ‘बेटा बहन का ब्याह हो जाएगा मान जा।’ मेरी उम्र के उस समय बीस वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे। घर में विवाह की तैयारी होने लगी थी। लड़की वालों ने यह शर्त रख दी थी कि मेरी बारात पहले उनके घर आएगी। विवाह की रस्मों का पहला दिन था। बड़े पिताजी के बेटे ने उसी दिन निनी को शादी का कार्ड दिया था। उस समय शाम के चार बजे थे। उन्होंने बताया कि निनी को भी दे आया हूं।
अभी घर में बात चल ही रही थी कि बाहर मोहल्ले में हल्ला मचा गया। लोग अपनी-अपनी दुकान बंद करने लग गए। मंझले भाई ने आकर बताया कि निनी का मर्डर हो गया है। धारदार हथियार से किसी ने उसकी गर्दन पर वार किया था।
मई के आरंभ का महीना था। शाम होने के बाद मोहल्ले में जैसे कर्फ्यू लग गया हो। जब पुलिस आई तब आसपास के लोगों द्वारा निनी को अस्पताल ले जाया जा चुका था। दूसरे दिन दोपहर के बाद निनी की शवयात्रा निकली उसके अर्थी को कंधे दिए सामने सुर्री भैया थे।
मैं घर की बाल्कनी में खड़ा देख रहा था। उसके जीते जी मैंने भी उसे जी भरकर गालियां दी थीं। बुरा था, मगर मोहल्ले वालों ने उसकी इतनी बुरी मौत की कल्पना नहीं की थी । उस दिन मेरी आंखों में भी आंसू थे। विवाह की सारी तैयारी फीकी पड़ चुकी थी।
सुधीर कुमार सोनी


