
‘दादा,आप तो इस संस्थान के फाउंडर मेंबर रहे हैं लेकिन आज जब यह संस्थान इतनी ऊंचाई पर पहुंच चुका है तब आपकी उपेक्षा पर हमें तो बहुत दुख होता है। क्या आपको तकलीफ नहीं होती है कि जिस संस्थान की नींव ही आपने रखी हो,उसकी भव्य इमारत बनने पर आपको भूला दिया गया है।’
‘नहीं मुझे कोई तकलीफ नहीं होती है क्योंकि मुझे मालूम है कि भले ही भव्य इमारत जमीन के ऊपर खड़ी रहे और लोगों को लुभाती रहे, फिर भी नींव का पत्थर जमीन के भीतर रहकर भी उसे थामे रहता है। इस खुशी को हर कोई महसूस नहीं कर सकता। आखिरकार नींव का पत्थर ही तो उस भवन की बुनियाद होता है।
प्रदीप उपाध्याय


