
हाथियों की तेजी से घटती संख्या के बावजूद ये कम से कम भारत में तो इंसानों के लिए जानलेवा मुसीबत बने हुए हैं। सच तो यह है कि हाथियों की खुद की रिहाइश बेहद खतरे में है और दिनों दिन खत्म होती जा रही है। खाने की तलाश में जंगलों से दूर उन पुराने ठौर पर आ धमकते हैं, जो अब इंसानी तरक्की की नई पहचान है। खूब उत्पात मचाते हैं, जान तक ले लेते हैं। बीते 100 बरसों में इनकी संख्या बहुत घटी है। अब तब के मुकाबले केवल 10-15 प्रतिशत ही हैं। दुनिया के सबसे बड़े जानवरों में शुमार हाथी की तीन प्रजातियां अफ्रीकी सवाना, अफ्रीकी वन और एशियाई हैं। संख्या घटने का कारण प्राकृतिक विचरण क्षेत्रों की बर्बादी और अवैध शिकार है। दुनिया भर में बस 50 से 60 हजार एशियाई हाथी ही बचे हैं जिनकी भारत में 2017 में हुई गणना के अनुसार संख्या 27312 हैं।
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, बिहार, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तराखंड, असम, कर्नाटक, ओडीशा, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मेघालय, आन्ध्र प्रदेश व अन्य राज्यों से अक्सर हाथियों के उत्पात की चौंकाने वाली हकीकत सामने आती रहती हैं। अभी कई राज्यों से हाथियों के तांडव की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं।
शहडोल के जयसिंहनगर, खैरहा व करीबी गांवों में हाथियों ने 20-22 दिनों में जगह बदल-बदल खूब उत्पात मचाया। हद तब हुई जब बीते पखवाड़े 3 हाथी कोदवार, करकटी, होकर घनी आबादी वाले नगर धनपुरी पहुंच गए। शहडोल जिले में इन्होंने हफ्ते भर में 5 लोगों को कुचल मौत के आगोश में समा दिया। बहुत से कच्चे मकान ढहा दिए, खेत, खलिहान, बाग-बगीचों को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। घरों में रखा अनाज तक खा गए और बचा खुचा रौंद गए। शहडोल संभाग हाथियों के निशाने पर हमेशा रहा लेकिन ऐसा भयावह उत्पात पहले कभी नहीं दिखा। कमोबेश यही हालात छत्तीसगढ़ के सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर व कोरिया इलाके सहित कई दूसरे राज्यों में भी हैं।
छत्तीसगढ़ व मप्र के काफी बड़े क्षेत्र कभी हाथियों की रिहाइश थे, जिनमें कई जगह अब कोयला खदानें संचालित हैं। हाथी अभयारण्य की बातें तो होती हैं। लेकिन रकबा तय होने बाद वहां बनना तो दूर उल्टा घटा दिया जाता है। जहां-तहां खुलती खदानों से इंसानों और हाथियों का संघर्ष भी भयंकर होता जा रहा है। हाथियों के पुराने ठिकानों पर बढ़ते इंसानी प्रहार की आशंका से लेमरू रिजर्व(छग) को आनन-फानन में मंजूरी दी गई। पहले रकबा 3827 वर्ग किलोमीटर तय था, लेकिन अक्टूबर-2021 में जारी अधिसूचना में घटाकर 1995.48 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया।
उसमें भी घना हसदेव अरण्य शामिल न होना हैरान करता है जो पर्यावरणीय व जैवीय विविधतताओं से भरपूर है। पास ही अचानकमार और कान्हा टाइगर रिजर्व व बोरामदेव वन्य जीव अभ्यारण्य हैं जिनका करीबी भौगोलिक जुड़ाव है। यहां संरक्षित प्रजाति के वन्य जीवों शेर, हाथी, तेंदुआ, भालू, भेड़िया, धारीदार लकड़बग्घों को विचरते देखा जाता है।
हाथियों के हमले से हर साल लगभग 500 भारतीय मारे जाते है। करीब 100 हाथी भी जान गंवाते हैं। ये आंकड़ा बाघ या तेंदुए जैसे जानवरों के शिकार इंसानों से 10 गुना ज्यादा है। 2015 से 2020 तक लगभग 2500 लोगों को हाथी मार चुके हैं। फरवरी 2019 में संसद बताया गया कि बीते 3 वर्षों में 1713 इंसान और 373 हाथियों की जान गई।
बेहद हैरानी भरी सच्चाई भी सामने आई जिसमें सबसे ज्यादा हाथियों की मौतें बिजली के करंट लगने से हुर्इं जो 226 है। 62 हाथी ट्रेन से मरे जबकि 59 शिकारियों के हाथों और 26 को जहर देकर मार गया। संकटग्रस्त प्रजातियों के प्राकृतिक संरक्षण खातिर अंतर्राष्ट्रीय संघ यानी इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आॅफ नेचर(आईयूसीएन) की रेड लिस्ट है। यह स्विटजरलैण्ड से अपडेट होती है। इसमें एशियन हाथी भी ‘लुप्तप्राय’ प्राणियों में सूचीबद्ध है।
हाथियों से हुए नुकसान की भरपाई व इंसानी मौतों के मुआवजे में करोड़ों रुपए जाते हैं। लेकिन सच यही है कि हाथियों की राह में इंसान खुद रोड़ा है। एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि भारत में 88 चिन्हित रास्ते हैं, जिनसे सदियों से हाथी आवागमन करते रहे हैं। वहीं 2017 में जारी महत्वपूर्ण जानकारियों वाले 800 पृष्ठ के अध्ययन ‘राइट आॅफ पैसेज’ में हाथियों के 101 भारतीय गलियारों की पहचान संबंधी जानकारियां है। जिनमें 28 दक्षिण, 25 मध्य, 23 पूर्वोत्तर, 14 उत्तरी पश्चिम बंगाल में और 11 उत्तर-पश्चिमी भारत में हैं।
तीन में दो गलियारों में खेती होना तो दो तिहाई के पास रेल लाइनें या सड़कें बन गर्इं। 2 गलियारे खनन और उत्खनन से बाधित हैं। 11 प्रतिशत पास से नहरें निकलने लगीं। जाहिर है गलियारों के स्वरूप बदलने या खत्म करने से हाथियों के स्वछंद विचरण में ढेरों बाधाएं हैं। इससे क्रुद्ध हाथियों ने घनी आबादी में दाना-पानी की तलाश खातिर जबरदस्त उत्पात मचाना शुरू कर दिया।
अपनी आदत और जबरदस्त याददाश्त को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित करते हाथी बरसों पुराने इलाके में आ जाते हैं। हमें लगता है कि वो आबादी, बाग, बगीचों या खेत, खदानों में कैसे आ गए? लेकिन सच तो यह है कि हमने ही उल्टा इनके ठिकानों पर कब्जा कर लिया है। बस यही हाथियों और इंसान के संघर्ष की असल वजह है। हमने जंगलों का तेजी से नाश किया जिससे जंगली उपज घटी। इसी कारण बंदर, हिरण, सांभर, जंगली सुअर व कुत्ते, सियार नील गाय भी इंसानी बस्तियों और खेतों में आ धमकते हैं। हाथी जरूर सबका साथी था लेकिन अब शायद वह भी समझ गया कि कौन उसके अस्तित्व को मिटाने पर तुला है?
हैरानी की बात है कि हाथियों से बचाव के न कोई ठोस उपाय है, न रणनीति। ऐसा लगता है कि वन विभाग भी सही ढंग से निदान के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कर पाता है। यह बड़ी विडंबना नहीं तो और क्या है जो हम अत्याधुनिक संसाधनों से लैस होकर भी हाथियों के आक्रमण या काबू रखने का कोई कामियाब तरीका नहीं निकाल पाए! मोटी पगार और बड़े-बड़े पदों में बैठे जंगलों के अफसरों क्यों नहीं नए और वैज्ञानिक तरीके खोजते हैं? हाथियों का व हाथियों से बचाव की तरफ गंभीर होना होगा।
दिनों दिन गजराज के तांडव की दहलाती घटनाओं से बेहद सुंदर और बुद्धिमान जानवर जहां निशाने पर है वहीं इसके निशाने पर भी वहीं हैं, जिन्होंने नाइंसाफी की है। लगता नहीं कि मधुमक्खियों, मशाल, ढोल, नगाड़ों, पटाखों या फिर लाठी, डंडों से इतर कोई नई तकनीक जल्द ईजाद जिससे हाथियों का संरक्षण भी हो और जन-धन हानि भी रुके। काश वन्य जीवों की रिहाइश में इंसानी दखल रुक पाती औरएक बार फिर हाथी मेरा साथी बन जाता।


