- 20 करोड़ का प्लांट, कोआॅपरेटिव पराग संस्थान के पास दूध बनाने का करोड़ों का प्लांट फिर भी
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: किसानों की आर्थिक सुधार में कभी भागीदारी निभाने वाला कोआॅपरेटिव पराग संस्थान की अर्थ व्यवस्था बिगड़ गयी हैं। घालमेल भी कम नहीं हो रहे हैं। चार वर्ष पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने किसानों को लाभान्वित करने के लिए दूध से पाउडर बनाने का प्लांट लगाया था। जो चालू हालत में हैं। यह प्लांट करीब 20 करोड़ में चालू हुआ था। दो वर्ष से दूध से पाउडर नहीं बन पा रहा हैं।
दूध की कमी बताकर प्लांट बंद हैं, लेकिन वर्तमान में पराग के पास दूध ही उपलब्ध नहीं है तो फिर कैसे पाउडर प्लांट चलेगा? प्लांट के बावजूद पराग को पंजाब से दूध का पाउडर खरीदना पड़ रहा है। क्योंकि गर्मी के मौसम में दूध की खपत बढ़ जाती है और दूध का कम उत्पादन होता है। इसी वजह से पराग हर साल सर्दी में दूध व्यापक स्तर पर किसानों से खरीद कर उसका पाउडर तैयार करता था, लेकिन वर्तमान में पराग के पास अपना पाउडर भी नहीं है।

हालात पराग की बेहद दयनीय चल रही है। यही वजह है कि पराग कंपनी कोआॅपरेटिव संस्था को पंजाब से दूध का पाउडर खरीदना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में लगातार पराग कोआॅपरेटिव संस्था घाटे में जा रही है। पराग में पिछले कुछ वर्षों से बड़ा घालमेल चल रहा है, जिसके चलते पराग लगातार घाटे में जा रही है। जो कोआॅपरेटिव संस्था आर्थिक रूप से मजबूत हुआ करती थी, वो संस्था आखिर कैसे घाटे में चली गई?
कहीं न कहीं या तो बड़ा घालमेल चल रहा है या फिर मैनेजमेंट की लापरवाही हो सकती हैं। जहां दूध 5 लाख लीटर प्रतिदिन दूध खरीदा जाता था। वर्तमान में 3 लाख लीटर दूध ही पराग को किसानों से मिल पा रहा है। पराग जैसी महत्वपूर्ण कोआॅपरेटिव संस्था भी कंगाली के द्वार पर आकर खड़ी हो गई है। अब इसे बचाएं आखिर कौन? इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता हैं।
चिलिंग प्लांट बंद
चार वर्ष पहले जो चिलिंग प्लांट यूपी सरकार की मदद से विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित किए गए थे। वो वर्तमान में बंद हो गए हैं। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? चिलिंग प्लांट इस वजह से चालू किए गए थे कि दूध खरीदने के बाद कम से कम एक दिन तक दूध खराब नहीं होता था, जिसके बाद मुख्य प्लांट पर दूध पहुंचा दिया जाता है, लेकिन वर्तमान में दूध ही नहीं मिल रहा है तो चिलिंग प्लांट सफेद हाथी बन गए हैं।
वर्तमान में सरधना, किठौर, अनवरपुर समेत छह ऐसे चीटिंग प्लांट है, जो बंद पड़े हैं। इनको कोआॅपरेटिव पराग प्रबंध तंत्र बीएमसी प्लांट भी कहते हैं। एक चिलिंग प्लांट को चालू करने के लिए पराग को यूपी सरकार ने दो वर्ष पहले ही 10-10 लाख रुपये दिये थे।
एक चिलिंग प्लांट को चालू करने पर 10 लाख रुपये तक खर्च होता हैं। सरकार ने किसानों को लाभान्वित करने के लिए ये प्लांट चालू किये गए थे, मगर यह सरकार को भी अंदाजा नहीं था कि लाखों रुपये खर्च कर जिन प्लांट को चालू किया जा रहा हैं, वो एक वर्ष बाद ही बंद हो जाएंगे। आखिर इसके लिए जवाबदेही किसकी हैं?
सरकार से मिले करोड़ों, तब हुआ भुगतान
पिछले तीन माह से किसानों से खरीदे जा रहे दूध का भुगतान पराग की तरफ से नहीं किया जा रहा था। क्योंकि पराग की आर्थिक स्थिति अचानक खराब हो गई थी। स्थिति प्लांट बंद करने के कगार पर पहुुंच गई थी। इसके बाद ही यूपी सरकार ने किसानों का बकाया तीन माह के दूध का बकाया भुगतान करने के लिए करोड़ों रुपये दिये हैं, जिसके बाद ही किसानों के दूध का भुगतान हुआ हैं। इतना सब होने के बाद भी पराग प्रबंध तंत्र सुधरने का नाम नही ले रहा हैं, जो दूध प्लांट वर्षों से बचत में चल रहा था आखिर ऐसा क्या हुआ कि घाटे में चला गया? आखिर इसके लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही हैं?

