Thursday, March 5, 2026
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ईश्वर से प्रेम

AMRITWANI 1


नूरी रक्काम फारस देश के बहुत पहुंचे हुए सूफी संत थे। उनके साथ बहुत से अनुयायी सूफी भी थे। सूफी सदा ईश्वर की मोहब्बत में इस कदर लीन रहते थे को उन्हें अपने खुदा के सिवा कुछ भी याद नहीं रहता है। वे शरीर को ही ईश्वर और खुदा का सबसे बड़ा मंदिर मस्जिद मानते हैं। तत्कालीन शासक ने सूफी संत नूरी रक्काम को देशद्रोही ठहरा दिया और काफिर कहकर सजा ए मौत दी गई। अदालत का हुक्म था, पहले दूसरों को कत्ल किया जाए और बाद में नूरी रक्काम को। जल्लाद अपने हाथ में नंगी तलवार लेकर आया। जैसे ही उसने दूसरों पर वार करने को तलवार उठाई, नूरी रक्काम ने उनकी जगह अपने आप को पेश कर दिया और वह भी अत्यन्त प्रसन्नता एवं विनम्रता से। चूंकि सजा ए मौत सार्वजनिक रूप से दी जाती थी। अत: वहां इकट्ठे सैकड़ों लोग सकते में आ गए।

खुद जल्लाद भी भौंचक्का रह गया। उसने कहा, ए नौजवान एक तो तुम्हारी बारी अभी नहीं आई है, दूसरे तलवार कोई ऐसी चीज नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग इतने व्याकुल हों। फकीर नूरी बोला, मेरे उस्ताद ने मुझे यही सिखाया है कि तुम्हारा दीन सिर्फ मोहब्बत है। मोहब्बत का मतलब है दूसरे के दु:ख को अपना दु:ख समझ कर उसे सहने के लिए खुद को पेश करना। उस्ताद कहते थे कि जब तुम किसी की मैयत जाते हो देखो तो यह कल्पना करो, मानो तुम खुद ताबूत में हो या अर्थी पर बधे हो; जिंदगी खेल है। मोहब्बत श्रेष्ठ है। मौत आए तो मित्र के आगे हो जाओ। जीवन मिलता हो तो पीछे हो जाओ, इसे हम प्रार्थना कहते हैं। वस्तुत: प्रार्थना हृदय का सहज अंकुरण है। जब दूसरे की मृत्यु का वरण करके उसे जीवन देने की चेतना जगे तब प्रभु प्रार्थना समझ लेनी चाहिए।और वो ही सबसे बड़ी इबादत है।
-राजेंद्र कुमार शर्मा


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