Tuesday, April 21, 2026
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क्या यही नारी का सम्मान है?

Nazariya 22


यह भी एक अजीब संयोग था कि स्वतंत्रता की 76 वीं वर्षगांठ के अवसर पर जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए अपने भाषण में महिला सशक्तिरण की बातें कर रहे थे, जिस समय वे अपने ओजस्वी भाषण में महिलाओं के प्रति इन शब्दों में भावुक अंदाज में चिंता जता रहे थे कि ‘किसी न किसी वजह से हमारे अंदर यह सोच आ गई है कि हम अपनी वाणी से, अपने व्यवहार से, अपने कुछ शब्दों से महिलाओं का अनादर करते हैं’ और इन्हीं शब्दों के साथ वे भारतवासियों से अपने दैनिक जीवन में महिलाओं को अपमानित करने वाली हर चीज से छुटकारा पाने का संकल्प लेने का आग्रह करते हुए अमृत काल में देश की तरक़्की में नारी शक्ति का कई गुना योगदान देख रहे थे तथा बेटियों को ज्यादा अवसर व सुविधाएं देने की बात कह रहे थे, लगभग ठीक उसी समय गोधरा जेल से गुजरात सरकार की छूट नीति के तहत उम्रकैद की सजा पाए हुए गैंगरेप के 11 दोषी गोधरा जेल से बाहर निकल रहे थे।

स्वतंत्रता दिवस व आजादी के अमृतकाल की यह भी कितनी बड़ी त्रासदी कही जाएगी कि जहां गुजरात सरकार ने इन बेशर्म दुष्कर्मियों को छोड़ने में तत्परता दिखाई वहीं इन बलात्कारियों ने गोधरा जेल के बाहर बाकायदा एक ग्रुप फोटो शूट कराया जिसमें प्रफुल्लित मुद्रा में नजर आ रहे इन सभी दुष्कर्मियों को मिठाइयां खिलाई गर्इं व इनको तिलक किया गया।
गौरतलब है कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस के कुछ डिब्बों में गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के पास उपद्रवियों की बेकाबू भीड़ द्वारा आग लगाए जाने की वजह से 59 कारसेवकों की जिंदा जलकर मौत हो गयी थी। उसके बाद गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे भड़क उठे थे। दंगाइयों के हमले से बचने के लिए गुजरात के दाहोद जिÞले के रंधिकपुर गांव की रहने वाली बिल्कीस बानो साढ़े तीन साल की अपनी एक बेटी सालेहा और 15 दूसरे लोगों के साथ गांव से भाग गई थीं। बिल्कीस उन दिनों पांच महीने की गर्भवती भी थी।

दंगाई दाहोद और आसपास के इलाकों में बे रोक टोक कहर बरपा रहे थे। वे चुन चुनकर मुसलमानों के घरों को जला रहे थे और उनके घरों के सामान लूट रहे थे। दंगाइयों द्वारा इसी दौरान बिल्कीस व चार अन्य मुस्लिम महिलाओं को पहले तो खूब मारा पीटा गया फिर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। बिल्कीस की मां के साथ भी यही किया गया। दंगाइयों के इस हमले में रंधिकपुर गांव में बिल्कीस की बेटी सहित उनके परिवार के सात सदस्य मारे गए।

इस मामले में दायर की गई चार्जशीट में कहा गया है कि 12 दंगाई लोगों सहित 20-30 लोगों ने लाठियों और जंजीरों से बिल्कीस और उसके परिवार के लोगों पर हमला कर दिया था। इसी मामले में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने 2008 में बिल्कीस बानो के साथ गैंगरेप और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के आरोप में 11 अभियुक्तों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस सजा पर अपनी सहमति की मुहर भी लगाई थी। परंतु इस 15 अगस्त को गुजरात सरकार ने इन्हीं दरिंदों को रिहा कर दिया। दुष्कर्मियों के प्रति हमदर्दी की ऐसी ही प्रवृत्ति हाथरस गैंग रेप के मामले में भी उस समय देखी गयी थी, जबकि 14 सितंबर 2020 को दलित समुदाय की बीस वर्ष की गरीब युवती अपनी मां के साथ अपने घर से लगभग आधा किलोमीटर दूर घास काटने गई थी। वहीं उसी के गांव के रहने वाले तथाकथित उच्च जाति के चार अभियुक्तों ने उस दलित लड़की का रेप किया। उसे गंभीर अवस्था में 28 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था जहां अगले दिन उसकी मौत हो गई थी। पुलिस ने परिवार को चेहरा दिखाए बिना तीस सितंबर को रात के अंधेरे में खेतों में लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया। उस समय भी दुष्कर्मियों के समर्थन में जातिवादी मानसिकता रखने वाले लोग इकट्ठे हो गये थे। आज भी उस पीड़िता का परिवार अपने घर में दहशत व भारी सुरक्षा के बीच रह रहा है।

इसी तरह 14 जनवरी 2018 को जम्मू के कठुआ में एक गरीब मुस्लिम लकड़हारे की आठ वर्षीय बेटी आसिफा की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर उसका शव जंगल में फेंक दिया गया था। इस सामूहिक दुष्कर्म व हत्याकांड में ग्राम प्रधान व मंदिर के पुजारी से लेकर कई पुलिस कर्मी भी शामिल थे। अदालत ने इन छ: अभियुक्तों में से तीन को उम्रकैद और अन्य तीन को पांच पांच साल की सजा सुनाई थी। यहां भी इन हत्यारे दुष्कर्मियों के पक्ष में तिरंगा हाथों में लेकर जुलूस निकाले गए थे, धरना प्रदर्शन किया गया था। हैरानी तो यह कि इन प्रदर्शनों में तत्कालीन जम्मू कश्मीर सरकार के कई भाजपाई मंत्री भी शामिल थे जो दुष्कर्मियों के पक्ष में केवल धर्म के आधार पर खुलकर खड़े थे। देश में इस तरह की और भी कई घटनाएं हो चुकी हैं।

इन परिस्थितियों में क्या प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से महिलाओं के प्रति व्यक्त की गई चिंता का कोई मायने भी रह जाता है? जब साधू के वेश में दिन के उजाले में भीड़ भरे माहौल में धर्म विशेष की महिलाओं को दुष्कर्म की धमकी दी जाए, जब योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में उनके मंच से कोई वक्ता धर्म विशेष की महिलाओं को कब्र से निकालकर उनकी लाशों से दुष्कर्म की धमकी दे, उस माहौल में आजादी के अमृत महोत्सव काल में प्रधानमंत्री का बेगम हजरत महल को याद करने का आखिर क्या अर्थ रह जाता है? आजादी के अमृत महोत्सव के बीच गोधरा में बिल्कीस के दुष्कर्मियों की रिहाई व उनका सम्मान एक बार फिर नारी सशक्तिकरण के दावों पर सवाल खड़ा कर रहा है।


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