
एसएस |
हाल ही में पूजा भट््ट, आर बाल्की द्वारा निर्देशित ‘चुप: द रिवेंज आॅफ आर्टिस्ट’ में नजर आर्इं। इस फिल्म में उन्होंने एक मनोचिकित्सक का किरदार निभाया है। फिल्म में उनके साथ सनी देओल, दुलकर सलमान और श्रेया धन्वंतरी जैसे कलाकार मौजूूद थे। ‘चुप:द रिवेंज आॅफ आर्टिस्ट’, होम प्रोडक्शन और पेन इंडिया लिमिटेड द्वारा निर्मित फिल्म थी। फिल्म में पूजा भट््ट के काम की हर किसी ने खूब सराहना की। 1989 में ‘डैडी’ फिल्म से अपने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाली पूजा भट््ट, जाने माने फिल्म मेकर महेश भट््ट और किरण भट््ट की पु़त्री हैं। ‘दिल है कि मानता नही’ (1991), ‘सडक’ (1991) और ‘बोर्डर’ (1997) जैसी अनेक सुपर हिट फिल्मों में काम कर चुकीं पूजा भट््ट 1998 में एक साथ चार फिल्मों में नजर आई थीं। उसके एक लंबे अरसे बाद 2009 में वह ‘सनम तेरी कसम’ में नजर आर्इं। ‘सनम तेरी कसम’ (2009) के ग्यारह साल बाद उन्होंने ‘सड़क 2’ (2020) के साथ वापसी की लेकिन फिल्म को आॅडियंस का कुछ खास रिस्पॉन्स नहीं मिल सका और अब उनकी ‘चुप:द रिवेंज आॅफ आर्टिस्ट’ (2022) रिलीज हुई है। प्रस्तुत हैं पूजा भट््ट के साथ की गई बातचीत के मुख्य अंश:
आर बाल्की की और से जब आपको ‘चुप:द रिवेंज आॅफ आर्टिस्ट’ का आॅफर मिला, तब आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
-फिल्म का कंसेप्ट हमारी इंडस्ट्री से जुड़े आर्टिस्ट और क्रू मेंबर्स के इर्द गिर्द घूमता है। इसमें दिखाया गया था कि कुछ लोग आपके काम की तारीफ करेंगे तो कुछ आपके बारे में इतना नेगेटिव रिएक्शन देंगे कि ये नेगेटिविटी पूरी तरह आप पर हॉवी हो जाएगी और आप खुद को इसकी चपेट में आने से रोक नहीं सकेंगे। मुझे यह कंसेप्ट इतना यूनिक लगा कि मैने बिना कोई सवाल किए फौरन हां कह दिया था।
क्या कभी अपनी निजी जिंदगी में आपको भी इस तरह के नेगेटिव कॉमेंट्स का सामना करना पड़ा है?
-इस मामले में मैं बहुत खुशनसीब रही हूं कि मेरी फिल्मों को काफी अच्छे रिव्यूज मिलते रहे हैं। यदि कोई एकाध फिल्म आॅडियंस को पसंद नहीं भी आई, तब भी मेरे काम की प्रशंसा अवश्य ही हुई है लेकिन मैं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हूं कि नेगेटिव बातें, स्लो पॉइजन की तरह होती हैं जो किसी भी इंसान को अंदर तक तोड़ कर रेख देती हैं।
आजकल हमारी इंडस्ट्री में जो बॉयकाट ट्रेंड शुरू हुआ है, उसकी वजह से बड़ी बड़ी फिल्में धराशायी हो रही हैं। इस ट्रेंड ने बड़े से बड़े स्टार्स को चिंता और परेशानी में डाल रखा है?
-मैं इस बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूं। मुझे नहीं लगता कि बॉयकाट ट्रेंड या और कोई एजेंडा फिल्म के चलने न चलने के लिए काम करता होगा। यदि आप एक अच्छी फिल्म बनाएंगे तो मुझे नहीं लगता कि उसे चलने से कोई रोक सकता है। दर्शक उसे देखने थिएटर में जरूर जाएंगे।
‘दिल है कि मानता नहीं’ में आपके को-स्टार रहे आमिर की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ को इस नए ट्रेंड के कारण काफी नुक्सान उठाना पड़ा है?
-आमिर एक बहुत अच्छे कलाकार हैं। वह कोई भी काम शुरू करने के पहले उसके बारे में काफी सोचते हैं। बतौर आर्टिस्ट हम अपनी फिल्में केवल आॅडियंस के लिए ही बनाते हैं और सिर्फ अच्छे से अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन चूक किसी से भी हो सकती है। मैं उनकी इस फिल्म के बारे में कुछ नहीं कहूंगी, क्योंकि मैं कोई क्रिटिक नहीं हूं। बस एक ही बात कहूंगी कि टिकिट खरीद कर फिल्म देखने वाली आॅडियंस किसी भी एजेंडे या नफरत की परवाह नहीं करती और मेरी इस बात को ‘ब्रह्मास्त्र‘ ने साबित भी कर दिखाया है। फिल्म ने बॉयकाट के बावजूद काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
अब तक के कैरियर में आप लगभग सभी तरह का काम कर चुकी हैं। क्या अभी भी किसी खास किरदार के लिए मन में चाहत है?
-बस मुझे इंतजार है उस रोल का जिससे मुझे बतौर एक्ट्रेस चैलेंजिंग काम करने को मिले लेकिन पर्सनली सुपरनेचरल और थ्रिलर शैली मुझे काफी पसंद है। ये एक ऐसी शैली है जिसे मैने अब तक एक्सप्लोर नहीं किया है।


