Sunday, May 10, 2026
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फसल अवशेष प्रबंधन की आवश्यकता

Khetibadi


भारत में पहले खेती केवल जीविकोपार्जन के लिए किया जाती थी लेकिन धीरे धीरे खेती ने व्यवसाय का रूप ले लिया है। किसान अधिक उपज प्राप्त करने के लिय अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों का प्रयोग कर रहा है जिससे मृदा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी हानिकारक प्रभाव हो रहा है फसल अवशेष को जलाना भी एक पर्यावरण तथा मृदा प्रदूषण का महत्वपूर्ण कारण है।

पिछले कुछ वर्षों में एक समस्या मुख्य रूप से देखी जा रही है कि जहां हार्वेस्टर के द्वारा फसलों की कटाई की जाती है उन क्षेत्रों में खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग खेत में खड़े रह जाते हैं। तथा वहां के किसान खेत में फसल के अवशेषों को आग लगाकर जला देते हैं। खरीफ सीजन में 500 लाख टन फसल अवशेष का उत्पादन होता है।

फसल के अवशेषों का सिर्फ 22 प्रतिशत ही इस्तेमाल होता हैं, बाकी को जला दिया जाता है। फसलों की कटाई के मौसम में फसल अवशेषों को जलाने तथा इसके मानव स्वास्थ्य पर हो रहे दुष्प्रभाव की खबरें प्राय अखबारों की सुर्खियां बनी रहती है। वास्तव ये एक गंभीर समस्या है जिसके लिए बहुत हद तक खेती की परंपरागत शैली जिम्मेदार है।

फसल अवशेष जलाने से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग

अवशेषों के जलने से ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बल मिलता है। फसल अवशेष जलाने से ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली व अन्य हानिकारक गैसों जैसे मीथेन कार्बन मोनो आक्साइड नाइट्रस आक्साइड और नाइट्रोजन के अन्य आक्साइड के उत्सर्जन होता है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा इसका प्रभाव मानव और पशुओं के अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव

फसल अवशेषों को जलाने के कारण मृदा ताप में वृद्धि होती है। जिसके फसलस्वरुप मृदा सतह सख्त हो जाती है एवं मृदा की सघनता में वृद्धि होती है साथ ही मृदा जलधारण क्षमता में कमी आती है तथा मृदा में वायु संचरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

मृदा पर्यावरण पर प्रभाव

फसल अवशेषों को जलाने से मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की संख्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है और फसल अवशेष जलाए जाने से मिट्टी की सर्वाधिक सक्रिय 15 सेंटीमीटर तक की परत में सभी प्रकार के लाभदायक सूक्ष्म जीवियों का नाश हो जाता है। फसल अवशिष्ट जलाने से केचुएं, मकड़ी जैसे मित्र कीटों की संख्या कम हो जाती है। इससे हानिकारक कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण नहीं हो पाता, फलस्वरुप महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना आवश्यक हो जाता है। इससे खेती की लागत बढ़ जाती है।

मृदा में उपस्थित पोषक तत्वों की कमी

फसल अवशेषों को जलाने के कारण मिट्टी में पाए जाने वाले पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश एवं सल्फर नष्ट हो जाते हैं, इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। कृषि वैज्ञानिकों ने एक अनुमान के अनुसार बताया कि एक टन धान के पैरों को जलाने से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटेशियम तथा 1.2 किलोग्राम सल्फर नष्ट हो जाता है।

फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में मिलाने के लाभ

कार्बनिक पदार्थ की उपलब्धता में वृद्धि: कार्बनिक पदार्थ ही एकमात्र ऐसा स्रोत है जिसके द्वारा मृदा में उपस्थित विभिन्न पोषक तत्व फसलों को उपलब्ध हो पाते हैं तथा कम्बाइन द्वारा कटाई किए गए प्रक्षेत्र उत्पादित अनाज को तुलना में लगभग 1.29 गुना अन्य फसल अवशेष होते हैं। फसल अवशेष खेत में सड़कर मृदा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करते हैं।

जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि फसल अवशेष से बने खाद में पोषक तत्वों का भण्डार होता है। फसल अवशेषों में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्वों के साथ 0.45 प्रतिशत नाइट्रोजन की मात्रा पाई जाती है, जो कि एक प्रमुख पोषक तत्व है।

मृदा के भौतिक गुणों में सुधार: मृदा में फसल अवशेषों को मिलाने से मृदा की परत में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ने से मृदा सतह की कठोरता कम होती है तथा जलधारण क्षमता एवं मृदा में वायु संचरण में वृद्धि होती है। भूमि से पानी के भाप बनकर उड़ने में कमी आती है।

मुदा की उर्वराशक्ति में सुधार: फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने से मृदा के रसायनिक गुण जैसे उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा, मृदा की विद्युत चालकता एवं मृदा पीएच में सुधार होता है तथा फसल को पोषक तत्व अधिक मात्रा में मिलते है।

मुदा तापमान: फसल अवशेष भूमि के तापमान को बनाये रखते हैं। गर्मियों में छायांकन प्रभाव के कारण तापमान कम होता है तथा सर्दियों में गर्मी का प्रवाह ऊपर की तरफ कम होता है,

फसल उत्पादकता में वृद्धि: भूमि में खरपतवारों के अंकुरण व बढ़वार में कमी होती है। फसल अवशेषों को मृदा में मिलाने पर आने वाली फसलों की उत्पादकता में भी काफी मात्रा में वृद्धि होती है
                                                                                                                डॉ. रूपेंद्र कौर


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