Monday, March 30, 2026
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भारत के लिए जी-20 एक चुनौती

Samvad


26 15वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा तय करने वाली दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह जी-20 का नेतृत्व अब भारत के हाथों में होगा। भारत आधिकारिक तौर पर 1 दिसंबर, 2022 से जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण करेगा और नवंबर 2023 में होने वाले शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। अभी इंडोनेशिया जी-20 का अध्यक्ष है। रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि के बीच भारत का जी-20 का अध्यक्ष बनना इस बात को दर्शाता है कि वैश्विक समस्याओं के समाधान की उसकी क्षमता पर महाशक्तियों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन वर्तमान में दुनिया जिस तरह से भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक मंदी, खाद्यान्न व ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों और महामारी के दीर्घकालीन दुष्प्रभावों से जूझ रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अध्यक्ष के रूप में भारत का कार्यकाल आसान नहीं होगा। जी-20 विकसित और विकासशील देशों का समूह है। रूस-यूक्रेन युद्ध के मुद्दे पर यह पूरी तरह से बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। बाली बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी छाया रहा।

सम्मेलन के अंत में जारी साझा बयान में जिस तरह से सदस्य देशों ने पुतिन द्वारा यूक्रेन पर बार-बार दी जा रही परमाणु हमले की धमकियों की आलोचना की है, और यूके्रन के जी-20 का सदस्य नहीं होने के बावजूद जेलेंस्की को शिखर सम्मेलन को संबंोधित (विडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए) करने का अवसर दिया गया, उससे पुतिन का नाराज होना स्वाभाविक ही है। रूस को जी-20 से बाहर किए जाने की मांग भी कुछ सदस्य देशों द्वारा कि जा रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि भारत किस तरह से दुनिया के सबसे ताकतवर देशों को एक साथ लेकर चलेगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इससे विकास बाधित हुआ है और मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई है। युद्ध के चलते दुनिया के एक बड़े हिस्से में ऊर्जा और खाद्यान्न सकंट पैदा हो गया है। इस संकट से निकलने में सदस्य देशों के लिए क्या ‘मोदी मंत्र’ होगा, यह अहम सवाल भी भारत के सामने है।

हालांकि, जिस तरह से भारत के पश्चिमी देशों और रूस दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत समस्या के कूटनीतिक समाधान में सफल होगा। पश्चिमी मीडिया भी बार-बार इस बात पर जोर देकर कह रहा है कि भारत-यूक्रेन युद्ध में शांति कराने की क्षमता रखता है।

इसके अतिरिक्त जी-20 की कार्य योजना और उसके क्रियाकलाप सदस्य देशों के आपसी विवाद और द्विपक्षीय तनाव की काली छाया से मुक्त रहे, इसके लिए भी भारत को काम करना होगा। रूस सदस्य देशों की अपीलों के बावजूद यूक्रेन को नष्ट करने पर आमादा है। चीन का भारत को लेकर आक्रामक रवैया बना हुआ है।

ताइवान मसले पर चीन का अमेरिका के साथ भी तनाव चल रहा है। कश्मीर मसले पर तुर्की पाकिस्तान के साथ है। तुर्की कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर भारत को घेरने की कोशिश का चुका है। यह तमाम वे कारण हैं, जो जी-20 की विश्वसनीयता पर प्रश्न पैदा कर रहे हैं। जी-20 के अध्यक्ष रहते हुए भारत को सदस्य देशों के बीच उत्पन्न द्विपक्षीय विवादों को हल करना होगा ताकि जी-20 समूह आपसी तालमेल और समन्वय के साथ आगे बढ़े।

इसके अलावा जलवायु परिर्वतन और वैश्विक आतंकवाद जैसे गंभीर मसलों से भी दुनिया जूझ रही है। जलवायु परिर्वतन को लेकर विकसित और विकासशील देश लगातार एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। भारत और दूसरे विकासील देशों पर कार्बन-उत्सर्जन को कम करने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसे में जी-20 कितना कारगर होगा यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। उम्मीद है कि भारत जी-20 देशों के आपसी विवादों के हल करने की दिशा में भी कोई निर्णायक पहल करेगा। कुल मिलाकर कहें तो जी-20 को खेमेबाजी से बाहर निकालने की बड़ी जिम्मेदारी भी भारत के सामने होगी।

जी-20 वैश्विक आर्थिक सहयोग का एक प्रभावशाली संगठन है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को दशा और दिशा देने के लिए 2008 में जी-20 का गठन किया गया। वैश्विक स्तर पर आर्थिक मामलों में सहयोग करने के लिए यह समूह काम करता है। यह वैश्विक जीडीपी का लगभग 85 प्रतिशत, वैश्विक व्यापार का 75 प्रतिशत से अधिक और विश्व की लगभग दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।

समूह में भारत के अलावा अमेरिका, अर्जेंटीना, आॅस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, ब्राजील, कनाडा, चीन, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, इटली, फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, जापान, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब और तुर्की शामिल है। समूह की हर साल एक शिखर बैठक आयोजित की जाती है। समूह की अगली बैठक 9 और 10 सिंतबर, 2023 को नई दिल्ली में होगी।

निसंदेह, जी-20 की अध्यक्षता मिलना जहां एक ओर वैश्विक फलक पर भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है, वहीं अगला एक साल नई दिल्ली के लिए चुनौतीपूर्ण और अवसरों से भरा हुआ रहने वाला होगा। शिखर बैठक की तैयारियों को लेकर तकरीबन 200 से अधिक बैठकें नई दिल्ली में होनी हैं। शिखर बैठक के आयोजन, राष्ट्राअध्यक्षों की सुरक्षा और उनकी मेहमाननवाजी तथा शिखर बैठक के एजेंडे की बड़ी जिम्मेदारी भी भारत के सामने होगी।

इसके अतिरिक्त बाली शिखर बैठक के दौरान संयुक्त घोषणा-पत्र को लेकर जिस तरह से पूरा समूह दो भागों में बंटा हुआ दिख रहा था उम्मीद है, नई दिल्ली शिखर बैठक में ऐसा नहीं होगा और माहौल सामान्य बना रहेगा। इससे पहले साल 1983 में भारत गुटनिरपेक्ष देशों की शिखर बैठक आयोजित कर चुका है, जिसमें आंदोलन से जुड़े सदस्य देशों के सभी राष्ट्राअध्यक्षों ने भाग लिया था। दुनिया के तमाम देश इस समय भारत को एक ऐसे नेता के रूप में देख रहे हैं, जो शांति और कूटनीति के जरिए मौजूदा युद्ध संकट से मुक्ति दिलवाने की दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है।

यही वजह है कि पिछले दिनों भारत ने जी-20 का लॉगो, उसकी थीम और वेबसाइट जारी करते हुए दुनिया के सामने भारत की प्राथमिकताओं की ओर संकेत किया था। अगले एक साल में भारत की कोशिश रहेगी कि जी-20 नए विचारों की परिकल्पना और सामूहिक एक्शन को गति देने के लिए एक ग्लोबल प्राइम मूवर की तरह काम करे। निसंदेह भारत के नेतृत्व में जी-20 नए विचारों की परिकल्पना और सामूहिक प्रयासों को गति देकर वैश्विक बदलाव का उत्प्रेरक मंच बन सकेगा इसमें संदेह नहीं है।


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