
मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा करीब डेढ़ सदी पुराने राजद्रोह कानून पर अपना फैसला सुनाते हुए रोक लगा दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए इस बदनाम कानून पर अपना फैसला सुनाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को इंडियन पेनल कोड (भारतीय दंड संहिता) की धारा 124ए के तहत कोई भी एफआईआर दर्ज ना करने का निर्देश दिया गया था। यह निर्देश केंद्र सरकार की तरफ से राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने तक के लिए था जिसका मतलब था कि अगर इस दौरान राजद्रोह का कोई नया मामला दायर किया जाता है तो आरोपित व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन लोगों को जमानत मिलने की उम्मीद देने का काम किया है, जो इस कानून की वजह से लंबे समय से जेल में हैं, यह एक लंबी सूची है जिसमें कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता और युवा शामिल हैं। दरअसल डेढ़ सौ साल पहले 1870 में प्रभाव में आने के साथ ही यह कानून विवादों में रहा है। पहले अंग्रेजों ने अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया और अब आजाद हिंदुस्तान के हुक्मरान भी यही करते आ रहे हैं। खास बात यह है कि हम ब्रिटिश सरकार के गुलामी के दौरान के इस कानून को अभी भी ढ़ोते आ रहे हैं, लेकिन इस बीच खुद ब्रिटेन द्वारा साल 2009 में इस कानून से अपना पीछा छुड़ा लिया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए में ‘राजद्रोह’ को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है, ऐसे किसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ इस धारा के तहत राजद्रोह का मामला दर्ज किया जा सकता है। राजद्रोह एक गैर जमानती अपराध है जिसके तहत तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।
आजादी के लड़ाई के दौरान कई राष्ट्रीय नेताओं द्वारा इस कानून को हटाने की बात कही गई थी, लेकिन दुर्भाग्य से आजाद भारत के संविधान में भी धारा 124ए को जोड़ा गया। खुद जवाहर लाल नेहरू जैसे नेता की सरकार द्वारा ‘आजादी पर तर्कपूर्ण प्रतिबंध’ के नाम पर बोलने की आजादी को सीमित करने के लिए संविधान संशोधन लाया गया। इसके बाद 1974 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा देशद्रोह को ‘संज्ञेय अपराध’ (ऐसा अपराध जिसमें गिरफ्तारी के लिए पुलिस को किसी वारंट की जरूरत नहीं होती है) बना दिया गया। इस तरह से राजद्रोह कानून के तहत पुलिस को किसी को भी बिना वारंट के पकड़ने का अधिकार दे दिया गया।
वर्तमान में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से राजद्रोह के मामले बढ़ गए हैं, 2014 से 2020 के बीच इस मामले में हर साल औसतन 28 प्रतिशत मामलों की बढ़ोतरी दर्ज की गई हैं। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 से लेकर 2020 के बीच 399 लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। राज्यवार स्थिति देखें तो इस दौरान में सबसे अधिक राजद्रोह के मामले दर्ज करने वाले राज्यों में असम है, जहां साल 2014 से 2020 के बीच पूरे देश के तकरीबन 16 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए। उसके बाद झारखंड, कर्नाटक और हरियाणा का नाम आता है।
यह इस देश का दुर्भाग्य है कि खुद को लोकतंत्र का पहरेदार बताने वाली लगभग सभी पार्टियों की सरकारों को औपनिवेशिक काल का यह कानून बेहद पसंद रहा है, हालांकि इस कानून का लगातार विरोध भी होता रहा है। विपक्ष में रहने वाली हर पार्टी इसके विरोध में खड़ी नजर आती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद हर सरकार को अपने विरोधियों और आलोचकों से निपटने के लिए इस काले कानून का डंडा चाहिए। अदालतें भी इस कानून के खिलाफ मुखर रही हैं। साल 2021 में भारत का मुख्य न्यायधीश द्वारा इस कानून पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘ये एक औपनिवेशिक कानून है। इसका मकसद भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलना था। इसी कानून का इस्तेमाल महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं की आवाज को दबाने के लिए किया गया। ऐसे में, आजादी के 75 साल बाद क्या इस कानून की आवश्यकता है?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशद्रोह कानून को चुनौती दी जाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया था, जिन्हें मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे (सेवानिवृत्त) और एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा दायर की गर्इं थीं। इनमें मेजर जनरल वोम्बटकेरे 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ सियालकोट सेक्टर में युद्ध लड़ चुके हैं। मेजर जनरल वोम्बटकेरे मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं। वे हरिद्वार व दिल्ली धर्म संसद में दिए गए नफरत भरे भाषणों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुके हैं।
सुप्रीमकोर्ट का यह फैसला इस कानून से पीड़ितों के लिए एक बड़ी राहत है जो लंबे समय से मानवधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने और सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़े होने की वजह से सलाखों के पीछे हैं, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जिन लोगों पर राजद्रोह का केस चल रहा है, वे जमानत के लिए निचली अदालतों का दरवाजा खटखटा सकते हैं। ऐसे में राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है, लेकिन यह अंतिम फैसला नहीं है, यह एक लंबी लड़ाई की छोटी जीत है, जिसका मुकम्मल होना इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र की मौजूदा सरकार इस पर क्या रुख अख्तियार करती है।
बहरहाल राजद्रोह कानून पर रोक लगाने के करीब सात महीने बाद जनवरी 2023 के दूसरे हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजों के शासन काल के दंडात्मक कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक बार फिर सुनवाई शरू करने वाली है। पिछले दिनों मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ द्वारा कानून के खिलाफ एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया की ओर से दायर याचिका सहित 12 अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
अब देखना है कि अगली सुनवाइयों के दौरान केंद्र सरकार क्या रवैया अपनाती है। मोदी सरकार के मिजाज को देख कर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि उसका क्या रुख रहने वाला है? हालाकि सरकार के पास गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के रूप में दूसरा डंडा पहले भी मौजूद है, जिसे 2019 में मोदी सरकार द्वारा संशोधन करके और भी सख्त बना दिया गया था जिसके तहत यूएपीए में यह प्रावधान जोड़ा गया है कि सरकार चाहे तो बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकती है। अगर मोदी सरकार यूएपीए के साथ राजद्रोह कानून को बनाए रखना चाहती है तो निश्चित रूप से भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।




