Wednesday, March 18, 2026
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सही सुर वो जो दिल को झकझोर दे: साजन मिश्रा

  • 300 साल पुरानी समृद्ध परंपरा हो बढ़ा रहे आगे

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: राजन और साजन मिश्रा समकालीन समय में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सर्वश्रेष्ठ युगल गायक थे। कोरोना काल में बड़े भाई राजन मिश्रा के निधन के बाद भी अनुज साजन मिश्रा अपने परिवार की तीन सौ साल पुरानी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। बनारस घराने की मुख्य परंपरा के पर्याय बने साजन मिश्रा और उनके बड़े भाई ने ख्याल गायिकी की घराने की परंपरा को दुनिया से परिचय कराया।

साजन मिश्रा हालांकि अपने ख्याल गायिकी के लिये जाने जाते हैं लेकिन उनके भजन, टप्पा, तराना और ठुमरी भी कमाल के हैं। हालांकि उनका मानना है कि शुरुआती चालीस साल तक उन्होंने ख्याल के अलावा कुछ नहीं गाया। साजन मिश्रा को 2007 में पदम भूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार1998 में संयुक्त रुप से, 1994 में गंधर्व राष्ट्रीय पुरस्कार और 2012 में राष्ट्रीय तानसेन सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

शुक्रवार को क्रांतिधरा में आए पदम भूषण साजन मिश्रा ने कहा सही सुर वो जो दिल को झकझोर दे। पत्रकारों से रुबरु हुए साजन मिश्रा ने कहा कि टेलीविजन से संगीत का बेड़ा गर्क कर दिया है। संगीत के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है। सुखद बात यह है कि वर्तमान समय में युवाओं का रुझान शास्त्रीय संगीत की तरफ बढ़ रहा है। इसे अगर देखना है तो मुंबई, कोलकाता, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शिरकत करके देखिये।

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मेरठ में पहले काफी कार्यक्रम होते थे लेकिन अब इनमें भी कमी आ गई है। ख्याल गायक साजन मिश्रा ने कहा कि अजराड़ा और किराना घराना वेस्ट यूपी का है लेकिन इसको ख्याति मुंबई जाकर मिली। अगर शास्त्रीय संगीत की जड़ों को और अधिक मजबूत करना है तो स्कूली स्तर पर योग्य संगीत शिक्षकों के जरिये संगीत की शिक्षा दी जानी चाहिये। उन्होंने कहा कि संगीत की गरिमा और इज्जत आज भी मौजूद है।

शास्त्रीय संगीत कभी कम होने वाला नहीं है। भीमसेन जोशी, रवि शंकर जैसे दिग्गज लोगों की जीवनी और वीडियो देखकर युवा इस रास्ते पर तेजी से आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सैंकड़ों सुरो को साधने का प्रयास करने के बजाय कुछ सुरों पर ध्यान केन्द्रित किया जाए तो सफलता मिलती है। बताया कि संगीत शिव के मुख्स से निकला है और आराधना का विषय है। उन्होंने कहा कि फिल्मों में शास्त्रीय संगीत को पहले तवज्जो दी जाती थी और वो गाने कई दशकों के बाद भी जेहन में समाये हुए हैं लेकिन वर्तमान फिल्मों के गाने चंद दिनों के मेहमान होते हैं।

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