Thursday, March 5, 2026
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बैकुंठ धाम का मार्ग प्रशस्त करता है मोहिनी एकादशी उपवास

Sanskar 4


साल भर में करीब 24 एकादशी आती हैं, जिनमें से वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी (मोहिनी एकादशी) का बहुत बड़ा महत्व धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में बताया गया है। जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करता है उसके सभी पाप, दुख, परेशानियां आदि दूर हो जाते हैं।

मोहिनी एकादशी व्रत वैशाख मास शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन रखा जाता है और इस वर्ष मोहिनी एकादशी व्रत 1 मई (सोमवार) 2023 के दिन रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की पूजा की जाती है। मतानुसार आज ही के दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया था।

माना जाता है कि मोहिनी एकादशी के दिन व्रत करने से लोगों को मोक्ष की प्राप्ति होती है । एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद एकादशी का पारण ( उपवास समाप्त करना ) किया जाता है। कभी-कभी लगातार दो दिनों तक एकादशी व्रत रखने का विधान है। परिवार सहित किए जाने वाला उपवास पहले दिन होता है। जबकि दूसरे दिन का उपवास सन्यासियों , विधवाओं और मोक्ष चाहने वालों को करना चाहिए।

मोहिनी, भगवान विष्णु का एक मात्र स्त्री अवतार है इसमें उन्हें ऐसी स्त्री के रूप में दिखाया गया है जो सभी को मोहित कर ले और उसके मोह में सब कुछ भूल जाए। समुद्र्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों को सागर से अमृत मिल चुका था। तब देवताओं को यह डर था कि असुर कहीं अमृत पीकर अमर न हो जाएं। तब उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि ऐसा होने से रोकिए। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत देवताओं को पिलाया और असुरों को मोहित कर अमर होने से रोका।

एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से मोहिनी एकादशी की महत्व के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने एक पौराणिक कथा के माध्यम से मोहिनी एकादशी के महत्व की व्याख्या की।

एक समय श्री राम, गुरु वशिष्ठ से बोले कि हे गुरुदेव, कोई ऐसा व्रत बताइए जिससे समस्त पापों का नाश हो जाए । ऋषि वशिष्ट बोले, हे राम, आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। लोकहित में यह प्रश्न अच्छा है। वैशाख मास आने वाली एकादशी को ही ‘मोहिनी एकादशी’ के रूप में जाना जाता है। इस दिन व्रत करने से मनुष्य सब पापों और दुखों से मुक्त हो जाता है। मैं इसकी कथा कहता हूं । सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान चंद्रवंशी राजा राज करता था। उसी राज्य एक संपन्न वैश्य धनपाल भी रहता था।

वह अत्यंत विष्णु भक्त था उसने नगर में अनेक सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे। उसके 5 पुत्र थे। सुमन, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति, धृष्टबुद्धि इनमें से पांचवा पुत्र धृष्टबुद्धि माता-पिता का कहा नहीं मानता था। वह वेश्यागमन, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर भोग विलास तथा मध मांस का सेवन करता था। इन्हीं कारणों से पिता ने उसे घर से निकाल दिया। घर से निकलने के बाद वह अपने गहने और कपड़े बेच कर अपना निर्वाह करने लगा।

जब सब कुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब भूख से दुखी हुआ तो चोरी करना सीख गया ।एक बार पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर ,चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया तो राजा ने पहले तो उसे कारागार में डलवा दिया। फिर उसे नगरी से निकाल दिया। वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहां पशु पक्षियों को मारकर खाने लगा। एक दिन भूख प्यास से व्यथित होकर ,खाने की तलाश में घूमता हुआ है, कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुंचा।

उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा स्नान कर वापिस आ रहे थे कि उनके वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे सद्बुद्धि प्राप्त हुई। वह कौडिन्य ऋषि के सामने हाथ जोड़कर कहने लगा, हे मुनि, मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं, आप इन पापों से छूटने का कोई साधारण, बिना धन का उपाय बताइए। ऋषि ने प्रसन्न होकर उसे मोहिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। इससे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। तब उसने विधि अनुसार व्रत किया।

महर्षि वशिष्ठ श्री राम से बोले, हे राम! इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप मिट गए और अंत में वो गरुड़ पर सवार होकर बैकुंठ चला गया। इस व्रत से मोह-माया सबका नाश हो जाता है। संसार में इस व्रत से और कोई श्रेष्ठ व्रत नहीं है। इस व्रत की महिमा को पढ़ने या सुनने मात्र से ही एक हजार गोदान का फल प्राप्त होता है।

साल भर में करीब 24 एकादशी आती हैं, जिनमें से वैशाख शुक्ल पक्ष की एकादशी (मोहिनी एकादशी) का बहुत बड़ा महत्व धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में बताया गया है। जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करता है उसके सभी पाप, दुख, परेशानियां आदि दूर हो जाते हैं। साथ ही बताया कि मोहिनी एकादशी व्रत वाले दिन भद्रा भी है। सोमवार 1 मई को भद्रा सुबह से शाम तक रहने वाली है। वैसे तो पूजा पाठ के दौरान राहु काल और भद्रा काल आते रहते हैं। भद्रा का व्रत करने, भूखे रहने या पूजा पाठ करने से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन यदि इस दिन आप कोई शुभ कर्म करते हैं जैसे- मंदिर की स्थापना आदि पर भद्रा का विचार जरूर करना चाहिए.
                                                                                                                             

राजेंद्र कुमार शर्मा


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