
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार उपभोकता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति दिसंबर 2023 में बढ़कर 5.69 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई, जो नवंबर 2023 में 5.5 प्रतिशत थी और जुलाई 2023 में 7.44 प्रतिशत के स्तर पर थी। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सहनशीलता सीमा जो 4 प्रतिशत से 2 प्रतिशत अधिक या 2 प्रतिशत कम है के अंदर है। बावजूद इसके, इस दर को तेज विकास के लिए उत्साहजनक कतई नहीं माना जा सकता है। किसी की क्रय शक्ति को निर्धारित करने में मुद्रास्फीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुद्रास्फीति बढ़ने पर वस्तु एवं सेवा दोनों की कीमतों में इजाफा होता है, जिससे व्यक्ति की खरीददारी क्षमता कम हो जाती है और वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग कम हो जाती है। फिर,उनकी बिक्री कम होती है, उनके उत्पादन में कमी आती है, कंपनी को घाटा होता है, कामगारों की छंटनी होती है, रोजगार सृजन में कमी आती है आदि। फलत: आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं एवं विकास की गति बाधित होती है।साफ है,मुद्रास्फीति को कम करने से ही विकास की गाड़ी आगे बढ़ सकती है। भारत से इतर,वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमत में गिरावट का सिलसिला 2023 से जारी है और यह 2024 के जनवरी महीने में 35 माह के सबसे निचले स्तर 118 अंक पर पहुँच गया, जो मार्च 2022 में 160.3 अंक पर था। संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संस्थान (एफएओ) के मुताबिक दुनिया के अधिकांश देशों में गेहूं, मक्का के साथ मांस की कीमत में आई गिरावट के कारण वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई है। एफएओ के अनुसार अनाज मूल्य सूचकांक जनवरी 2024 में घटकर 120.1 अंक पर पहुंच गया।
चूंकि, भारत में कृषि क्षेत्र अभी भी कमजोर है और आर्थिक मानकों के तय करने के पैमाने दुनिया के दूसरे देशों से थोड़े अलग हैं,इसलिए, भारत में मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक द्वारा तय की गई सहनशीलता के अंदर रहने के बावजूद मध्यम स्तर पर है। इसलिए,भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दरों को यथावत रखना एक समीचीन फैसला हो सकता है,क्योंकि मंहगाई को लेकर केंद्रीय बैंक बहुत ज्यादा संवेदनशील है और यह महंगाई और विकास दर के बीच संतुलन बनाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत रखना चाहता है।
रिजर्व बैंक ने अंतिम बार फरवरी 2023 में रेपो दर को बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत किया था। इस तरह, विगत 12 महीनों से रेपो दर 6.5 प्रतिशत पर बरकरार है। वित्त वर्ष 2024-25 में राजस्व संग्रह में बढ़ोतरी हुई है और आगामी महीनों में भी कर और गैर कर राजस्व संग्रह में तेजी आने की संभावना है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह भी विगत 6 महीनों से लगातार 1.5 लाख करोड़ रुपए से ऊपर के स्तर पर बना हुआ है। इसलिए, माना जा रहा है कि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान सरकार उधारी कम लेगा। लिहाजा, रिजर्व बैंक 8 फरवरी को पेश किए जाने वाले मौद्रिक समीक्षा के साथ-साथ अप्रैल और जून की मौद्रिक समीक्षा में भी रेपो दर को यथावत रख सकता है, क्योंकि अभी भी भारत में महंगाई का स्तर संतोषजनक दायरे में नहीं है। हालांकि, अगस्त की मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दरों में कटौती की जा सकती है, लेकिन वह भी मानसून की सकारात्मक चाल, फेडरल रिजर्व बैंक की अपनाई गई नीति, राजस्व संग्रह की स्थिति आदि पर निर्भर करेगा। रेपो दर में लंबे समय तक वृद्धि नहीं करने का इतिहास भी रहा है।
2008 की आर्थिक मंदी के समय 10 महीनों तक रेपो दर 6.5 प्रतिशत की दर पर बरकरार रहा था। 2013 के कर्ज संकट के समय भी रेपो दर 7.85 प्रतिशत के स्तर पर 8 महीनों तक यथावत रहा था। फिर, 2020 में कोरोना काल के समय में भी रेपो दर 4 प्रतिशत के स्तर पर 25 महीनों तक बना हुआ रहा था। जनवरी महीने में पीएमआई के आंकड़े जारी किए गए थे, जिसके अनुसार सेवा क्षेत्र की गतिविधियां विगत 6 महीनों में सबसे अधिक बढ़ी है और सेवा क्षेत्र का पीएमआई विगत 30 महीनों से लगातार आगे बढ़ रहा है। अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों और मांग में तेजी की वजह से सेवा क्षेत्र का पीएमआई जनवरी में 61.8 अंक पर पहुँच गया, जो दिसंबर में 59 अंक पर था। सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं। नए व्यवसाय का विस्तार तेज हुआ है और भविष्य को लेकर सकारात्मक माहौल बना है। सेवा क्षेत्र से जुड़े निर्यात में भी तेजी आई है।
विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई सूचकांक भी दिसंबर महीने में 54.9 अंक से बढ़कर जनवरी महीने में 56.5 अंक पर पहुंच गया, जो विगत 3 महीनों का उच्चतम स्तर है। पीएमआई का कांपोजिट सूचकांक भी दिसंबर महीने में 58.5 अंक से बढ़कर जनवरी महीने में 61.2 अंक पर पहुँच गया, जो दुनिया में सबसे अधिक है। मामले में 52.5 अंक के साथ चीन दूसरे स्थान पर और 52.3 अंक के साथ अमेरिका तीसरे स्थान पर है। पीएमआई सूचकांक के 50 अंक से कम रहने पर यह माना जाता है कि संबंधित क्षेत्र में संकुचन आ रहा है, जबकि सूचकांक के 50 अंक से ऊपर रहने पर माना जाता है कि वह क्षेत्र आगे बढ़ रहा है।
रिजर्व बैंक मुख्य तौर पर रेपो दर में बढ़ोतरी करके महंगाई से लड़ने की कोशिश करता है। जब रेपो दर अधिक होता है तो बैंकों को रिजर्व बैंक से महंगी दर पर कर्ज मिलता है, जिसके कारण बैंक भी ग्राहकों को महंगी दर पर कर्ज देते हैं। ऐसा करने से अर्थव्यवस्था में मुद्रा की तरलता कम हो जाती है और लोगों की जेब में पैसे नहीं होने की वजह से वस्तुओं की मांग में कमी आती है और वस्तुओं व उत्पादों की कीमत अधिक होने के कारण इनकी बिक्री में कमी आती है, जिससे महंगाई में गिरावट दर्ज की जाती है। इसी तरह अर्थव्यवस्था में नरमी रहने पर विकासात्मक कार्यों में तेजी लाने के लिए बाजार में मुद्रा की तरलता बढ़ाने की कोशिश की जाती है और इसके लिए भी रेपो दर में कटौती की जाती है, ताकि बैंकों को रिजर्व बैंक से सस्ती दर पर कर्ज मिले और सस्ती दर पर कर्ज मिलने के बाद बैंक भी ग्राहकों को सस्ती दर पर
कर्ज दे।
महंगाई की वजह से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, लेकिन बीते कुछ महीनों से उधारी ब्याज दर के उच्च स्तर पर बने रहने के बावजूद भी ऋण वितरण में तेजी आ रही है और विकास दर की रफ्तार भी तेज बनी हुई है। वैसे, ऐसी स्थिति अपवाद वाली है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार वर्ष दर वर्ष के आधार पर बैंकों का ऋण वृद्धि दर दिसंबर 2023 में 16.5 प्रतिशत रहा,जिसके वित्त वर्ष 2024-25 में 12 से 13 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अभी रिजर्व बैंक का लक्ष्य विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना है, ताकि आम आदमी को परेशानी नहीं हो और विकास की रफ्तार भी तेज बनी रहे।


