- गठबंधन में पाला बदलकर रालोद से जीते थे गुलाम मौहम्मद
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: रालोद सुप्रीमो के समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़ने का सबसे ज्यादा असर सिवाल खास के विधायक गुलाम मौहम्मद पर पड़ेगा। भले ही गुलाम मौहम्मद रालोद के विधायक कहलाये जाते हों, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सिर्फ जीत हासिल करने के लिए ही उन्होंने ऐन चुनाव के मौके पर सपा छोड़कर रालोद का दामन थामा था। रालोद सुप्रीमो के सपा गठबंधन से अलग होने से गुलाम मौहम्मद के सामने सबसे बड़ा संकट आयेगा।
समाजवादी पार्टी से यूपी के विधान सभा चुनाव से ठीक पहले गठबंधन करने पर रालोद और सपा में सीटों का पहले ही बंटवारा हो गया था। सिवाल खास सीट से समाजवादी पार्टी के सिंबल पर ही गुलाम मौहम्मद पूर्व में जीत हासिल कर चुके थे, इसलिए वह लंबे समय से इस सीट पर मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाये हुए थे।
जबकि रालोद अपने गढ़ की इस सीट पर अपने प्रत्याशी को ही टिकट देना चाहती थी। गठबंधन होने के बाद गुलाम मौहम्मद को सपा नेतÞत्व की ओर से सलाह दी गई कि वह दुनिया दिखावे के लिए सपा से पाला बदलकर रालोद का टिकट लेकर सिवाल खास से चुनाव मैदान में डटे रहें।

हालांकि सपा के इस दांव पेंच पर रालोद के वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर विरोध किया था। उस समय रालोद में रहे वरिष्ठ नेता चौधरी यशवीर सिंह, सुनील रोहटा तथा डा. राजकुमार सांगवान ने खुलकर विरोध भी किया था, लेकिन जयंत चौधरी के समझाने पर यह सभी रालोदी नेता अपना मन मसोसकर रह गये और अपनी इस सीट पर सपाई खेमे से आये गुलाम मौहम्मद के सिर फिर विधायक का सेहरा बंधने का तमाशा देखते रहे।
गुलाम मौहम्मद भले ही रालोद के टिकट पर जीत हासिल करने में कामयाब हो गये हों, लेकिन सपा नेताओं से अपने संबंधों में उन्होंने कभी दूरी नहीं आने दी। अब जयंत चौधरी के पाला बदलने की अटकलों के बीच गुलाम मौहम्मद के उपर अपनी सियासत बचाने का संकट आ गया है। यदि वह रालोद में ही शामिल रहते हैं तो जयंत चौधरी के पाला बदलने के बाद वह भी भाजपाई विधायक कहलायेंगे,
जिसका सीधा असर गुलाम मौहम्मद की निजी जिंदगी पर भी पड़ेगा। अब गुलाम मौहम्मद सियासत के ऐसे भंवर में फंस रहे हैं कि वह इससे चाहकर भी बाहर निकलेंगे तो दोनों ही सूरतों में उनके समक्ष हार ही होगी। फिलहाल सवाल करने पर वह इसे हंसकर टाल देते हैं।

