- चर्चा में आस्कर अवार्ड: पोलियो पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘द फाइनल इंच’ रही थी टॉप 4 में
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: इस समय आस्कर पुरस्कारों के माध्यम से विश्व भर में क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘ओपेनहाइमर’ ने धूम मचा रखी है। सोशल मीडिया पर भी वो खूब ट्रेंड कर रही है। सात अवार्ड अपने नाम करने वाली ‘ओपेनहाइमर’ फिल्म की चर्चा बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक है। इन चर्चाओं के बीच आईए हम आपको मेरठ की उन संकरी गलियों के उस किरदार से मिलवाते हैं जिसके बूते एक बार तो मेरठ भी आॅस्कर की दौड़ में शामिल हो गया था। यह बात अप्रैल 2007 की है जब दुनिया पोलियो वायरस से जंग लड़ रही थी।
मेरठ पोलियो के लिहाज से ‘हॉट’ था और इसका गढ़ हुआ करता था। डब्ल्यूएचओ सहित पोलियो इरेडिकेशन (उन्मूलन) में लगीं विभिन्न इंटरनेशनल एजेंसियों की नजर हमेशा मेरठ पर रहती थी। मेरठ से पोलियो को खत्म करने के लिए जारी जद्दोजहद को अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने समझा और फिर इनकी कोशिशों को दुनिया के सामने लाने के लिए एक डॉक्यूमेंट्री बना डाली। इस डॉक्यूमेंट्री में मेरठ के ढवाई नगर निवासी गुलजार सैफी और घंटाघर (कोटला) निवासी यूनिसेफ की एक कार्यकर्ता (सीएमसी) मुंजरिन के जरिए पोलियो उन्मूलन के लिए जारी जद्दोजहद को दुनिया के सामने पेश किया।

मेरठ में फिल्मांकन के लिए वर्मिलियंस फिल्म्स के बैनर तले अमेरिकी निर्देशक आयरिन टेलर ब्रॉडस्काई की पूरी टीम मेरठ पहुंच गई। ‘द फाइनल इंच’ नाम से पोलियो उन्मूलन पर डॉक्यूमेंट्री बनी। किसी ने सोचा भी न था कि यूनिसेफ और गूगल वेब सेवा के सहयोग से बनी यह डॉक्यूमेंट्री आॅस्कर पुरस्कार के लिए नॉमिनेट हो जाएगी और टॉप 4 तक पहुंच जाएगी। दरअसल जिस गुलजार सैफी ने इस फिल्म में किरदार निभाया वो खुद पोलियो का शिकार हैं
और एक पैरों से माजूर (अपंग) हैं। इसके बावजूद पोलियो उन्मूलन के प्रति उनकी दीवानगी कम न थी। उनकी मेहनत ने उन्हें रातो रात स्टार बना डाला। गुलजार की फिल्म और मेहनत के जज्बे को पूरे अमेरिका ने देखा और सराहा। उस समय आॅस्कर अवार्ड के लिए नॉमिनेट हो चुकी फिल्म ‘द फाइनल इंच’ ने मेरठ को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाई थी। आॅस्कर में नॉमिनेट होने के बाद ढवाई नगर की जिन संकरी गली से लोग निकलने से बचते थे वही गली अब देश-दुनिया के लिए सुर्खियां बन चुकी थी।

