- लिसाड़ी गांव और नूर नगर में सपा के पक्ष में मतदान
- सीधे मुकाबले में सपा को टक्कर दे सकी सिर्फ भाजपा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव की दलित-मुस्लिम गठजोड़ की नीति का साफ असर आज हुए मतदान में देखने को मिला। दलितों के गढ़ में भी साइकिल ने अपनी जमकर धमक दिखाई। पहली बार ऐसा हुआ है जब बसपा का कैडर वोट अपनी सुप्रीमो के खिलाफ एक दूसरी सियासी जमात के पक्ष में मतदान करने गया है। इसके पीछे खुद दलित मतदाताओं ने तर्क दिया कि जब हमारे ही समाज की हमारी बहन मैदान में है, तो हमें बाहर जाने की जरूरत ही क्या है।
दलितों के खास गढ़ में भी सपा की साइकिल तेजी से दौड़ी। पूरे लोकसभा की सभी पांचो विधान सभा सीटों पर खुद मौके पर जायजा लिया तो कहीं सपा भाजपा को टक्कर देती नजर आई और कहीं सपा और बसपा में मुकाबला नजर आया। दलितों के वोटों का बिखराव न होने का सीधा नुकसान भाजपा को होता नजर आ रहा है।
मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें (किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ सिटी, मेरठ दक्षिण और हापुड़) आती हैं। मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो शुरूआत से लेकर छह बार वर्ष 1952, 1957, 1962, 1971, 1980 व 1984 में कांग्रेस का कब्जा रहा। जबकि पांच बार वर्ष 1996, 1998, 2009, 2014 तथा 2019 में भाजपा का कब्जा रहा। इनके अलावा 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, 1977 में जनता पार्टी, 1989 में जनता दल तथा वर्ष 2004 में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशियों ने भी जीत हासिल की थी।

हिंसा के चलते वर्ष Þ1991 का चुनाव रद्द हो गया था। अब बात करें वर्ष वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो बेहद कड़ा मुकाबला हुआ था। भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल ने 5 लाख 86 हजार 184 वोट हासिल किए थे, वहीं समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने के बाद बहुजन समाज पार्टी के हाजी याकूब कुरेशी को 5 लाख 81 हजार 455 बोट मिले। दोनों के बीच अंत तक कड़ा मुकाबला रहा और जीत आखिरकार राजेंद्र अग्रवाल के खाते में गई। हालांकि भाजपा के राजेंद्र आवाल ने महज 4,729 मतों के अंतर से चुनाव जीता। जबकि कांग्रेस के हरेंद्र अग्रवाल तीसरे नंबर पर रहे। वर्ष 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी सीधे चुनावी मैदान में नहीं थी।
इसलिए दलितों के साथ मुसलमानों के सीधे जुड़ने से हाजी याकूब पूरी तरह फाइट में रहे। मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट का इतिहास रहा है कि यहां मुस्लिमों के साथ दलितों के जुड़ने से प्रत्याशी मजबूत स्थिति में आ जाता है। समाजवादी पार्टी ने इस बार मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था। जबकि मुस्लिम इस बार कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने का पूरी तरह इरादा कर चुके थे। कांग्रेस के प्रत्याशी के न होने से मुस्लिमों के पास समाजवादी पार्टी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। बस समाजवादी पार्टी में अंदरूनी तौर पर कई दिनों से इस बात का मंथन चल रहा था कि दलित वोट एकतरफा मिल जायें तो समाजवादी पार्टी गठबंधन प्रत्याशी की जीत की राह आसान हो जायेगी, लेकिन आज हुए चुनाव में सारी ही स्थिति पूरी तरह से साफ हो गई।
समाजवादी पार्टी गठबंधन इस बात से फिक्रमंद था कि दलित वोट न कटें। और हुआ भी ऐसा ही। दलितों के बड़े गढ़ में माने जाने वाले मेरठ शहर विधान सभा के अन्तर्गत आने वाले लिसाड़ी और नूर नगर गांव में दलितों व मुस्लिमों ने एकतरफा मतदान किया। जबकि ब्रह्मपुरी और गणेशपुरी में दलित समाज ने बसपा की जगह खुलकर सपा गठबंधन को वोटें दीं। शहर के सभी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में साइकिल ने दौड़ लगाई। हापुड़ में भी समाजवादी पार्टी का सीधा मुकाबला भाजपा प्रत्याशी से हुआ। यह पहली बार हुआ कि हापुड़ के वैश्य समाज ने सपा गठबंधन के पक्ष में मतदान किया। भाजपा के कैडर वोट माने जाने वाले वैश्य समाज के वोटरों ने बगावत अपनाई।
उनका विरोध इस बात को लेकर रहा कि भाजपा ने लोकल दावेदारों को नजरअंदाज क्यों किया? अब हमारा नंबर है कि हम इस पैराशूट को हवाई जहाज में बैठा दें। किठौर विधान सभा में भी सपा गठबंधन और बसपा सीधे फाइट में रही। लेकिन मुस्लिमों का रूझान पूरी तरह से सपा गठबंधन के लिए हुआ। किठौर के कई गांवो में खुलकर सपा को न सिर्फ वोटें डाली जा रही थीं। बल्कि यहां भाजपा को लेकर कड़ी नाराजगी भी थी। कुल मिलाकर आज के मतदान के चुनावी नतीजे पाकर समाजवादी पार्टी के सभी नेता फील गुड महसूस कर रहे हैं।

मुस्लिमों में नहीं चला याकूब का जादू
बसपा के पक्ष में पूर्व राज्यमंत्री याकूब कुरैशी ने जिस तरह से धुआंधार प्रचार किया, उससे लग रहा था कि मुस्लिम वोट शायद बंट जाएंगे। लेकिन मतदान के दिन जो रुझान मिले है, वो चौकाने वाले रहे। मुस्लिमों पर याकूब का इस बार जादू नहीं चल सका। मुस्लिम क्षेत्र में वोटर एक तरफा साइकिल पर सवारी करते नजर आए। इसको लेकर याकूब कुरैशी से मीडिया के लोगों ने पूछा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जिस तरह से याकूब कुरैशी के अचानक बसपा प्रत्याशी देवव्रत त्यागी के पक्ष में आकर चुनाव प्रचार किया तथा सपा प्रत्याशी सुनीता वर्मा के पति पूर्व विधायक योगेश वर्मा को भी अपने निशाने पर ले लिया, तब ये माना जा रहा था कि याकूब की इस भूमिका के बाद मुस्लिमों में निश्चित रूप से बटवारा हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
खुद याकूब कुरैशी के मोहल्ले के मुस्लिम भी सपा की साइकिल से अलग नहीं जा सके। बसपा के लिए ये बड़ा झटका हैं। बसपा से मुस्लिमों ने किनारा ही किया। इसकी वजह जो भी हो, लेकिन सपा की साइकिल को मुस्लिमों ने बूथ पर खूब दौड़ाया, जिसके चलते भाजपा की टेंशन बढ़ गयी हैं। दरअसल, मुस्लिम पहले ही सपा को वोट देने का मन बना चुके थे। वोट प्रतिशत भी मुस्लिम क्षेत्रों का ज्यादा रहा। हालांकि 2019 का लोकसभा चुनाव याकूब कुरैशी ने मेरठ से बसपा के टिकट पर लड़ा था। तब याकूब मात्र चार हजार मतों के अंतर से पराजित हो गए थे। 2019 जैसा माहौल याकूब बसपा के पक्ष में नहीं बना सके। वजह जो भी रही हो, लेकिन याकूब कुरैशी की अपील को मुस्लिमों ने पूरी तरह से नकार दिया तथा बसपा की बजाय सपा को वोट किया।
सुनीता वर्मा और योगेश वर्मा ने डाला वोट
मोदीपुरम: मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट पर सपा गठबंधन प्रत्याशी सुनीता वर्मा और उनके पति पूर्व विधायक योगेश वर्मा ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मताधिकार का प्रयोग करने के दौरान उन्होंने एक व्यक्ति को पोलिंग पार्टी के सदस्यों को मतदान के दौरान चाय-नाश्ता देते हुए देखा और हंगामा कर दिया। पल्लवपुरम फेज-वन में बने मतदान केंद्र पर शुक्रवार को दूसरे चरण के मतदान में सपा गठबंधन प्रत्याशी सुनीता वर्मा अपने पति पूर्व विधायक योगेश वर्मा के साथ मतदान करने पहुंची। सुनीता वर्मा ने बताया कि उन्होंने मतदान केंद्र पर पहुंचते ही देखा कि एक व्यक्ति मतदान केंद्र पर केतली लेकर घूम रहा था
और पोलिंग पार्टियों के सदस्यों को चाय-नाश्ता करा था, जबकि उसके पास मतदान केंद्र में जाने के लिए कोई पास नहीं था। पूर्व विधायक योगेश वर्मा ने आरोप लगाया कि यह भाजपा की चाल है, जिन केंद्रों पर उनका मतदान प्रतिशत अधिक है, वहां इस तरह चाय-नाश्ता परोसकर भाजपा मतदान प्रतिशत कम कराना चाहती है। उन्होंने इसको लेकर मतदान केंद्र पर हंगामा किया और उक्त व्यक्ति को पकड़ने का प्रयास किया। लेकिन, वह भाग निकला। सुनीता वर्मा ने मामले की शिकायत जिलाधिकारी दीपक मीणा से की है।

