
उषा जैन ‘शीरीं’
मामूली तकलीफों को तूल देने के लिए औरतें यूं ही बदनाम नहीं हैं। कई औरतों को एक तरह से ‘डॉक्टर एडिक्शन’ हो जाता है। कई के लिए जहां यह टाइम पास करने और बोरियत दूर करने का साधन है वहीं कई के लिए सैर तफरीह की जगह जहां वे नई साड़ी का मुहूर्त कर सकती हैं। उनके पास डॉक्टर को बताने के लिए हमेशा तकलीफों के पुलिंदे होते हैं। पीठदर्द, जोड़ों की जकड़न, तनाव, डिप्रेशन, हाई ब्लड प्रेशर, भूख न लगना, कमजोरी या और कुछ नहीं तो थकान और मामूली सा सिरदर्द ही उनकी भयंकर चिंता के कारण बन जाते हैं।
देखा जाए तो हर स्त्री को कहने के लिये ही सही, कुछ न कुछ तकलीफ जरूर होगी। आपको ढूंढने पर भी कोई ऐसी गृहिणी नहीं मिलेगी जो यह कहे कि उसके साथ सब कुछ ठीक ठाक है और यह कि वह मस्त है। और कुछ नहीं तो मौसम ही तकलीफदेह बन जाता है। यह सब होता है विवाहोपरांत, मानो ये दोनों ही बातें हमसफर हों। विवाहपूर्व वे एक चिंतारहित जीवन जीती है। चिंता फिक्र करने को घर में बड़े होते हैं। अपनी देहयष्टि सजाने संवारने, स्लिम ट्रिम रखने का उसमें पूरा उत्साह होता है। उसे तली हुई चीजों से परहेज रहता है। दरअसल इस उम्र में खाने का ज्यादा शौक नहीं होता और ‘डाइट’ भी बहुत कम होती है।
विवाह के बाद मिलने वाली सुरक्षा उन्हें अपने प्रति थोड़ा लापरवाह बना देती है। शादी तो हो ही गई, अब मोटापे की क्या चिंता। फिर मातृत्व धारण करने पर भी कुछ मामूली तकलीफें तो होती ही हैं, उन्हें चाहे चुपचाप सहा जाए या सारे घर को सर पर उठाया जाये , नाज नखरे उठा कर, चोंचलेबाजी करवा और ढेरों दवाइयां निगल के। यह बात सिर्फ ऊंचे तबके की औरतों और गृहणियों पर ही लागू नहीं होती। गरीब तबके की औरतें भी जरा-जरा सी तकलीफ में डॉक्टर के पास दौड़ती नहीं अघाती। मिसेज नाथ ने जुकाम के लिए अपनी महरी को आयुर्वेदिक दवाई दी, विक्स लगाने को दी तो उसने उन्हें न लेकर डॉक्टर को पचास रुपए देकर दवा लेना ज्यादा मुनासिब समझा।
अहम बात है डाइट कंट्रोल जिसके प्रति गृहणियां अक्सर लापरवाह हो जाती हैं। बचा खुचा निपटाने का चक्कर और ठंडा बासी खाना फेंकने से कतराना उन्हें ओवरइटिंग की ओर धकेलता है। फिर डायटिंग का दौर कभी-कभी उन्हें और बीमार बना देता है। हैल्थ क्लब सिर्फ व्यापार के सेंटर ही साबित होते हैं। वे उनकी कुछ भी मदद नहीं कर पाते हैं।
कुछ फैशन, कुछ शीघ्र आराम की ललक और तत्कालिक सुविधा के प्रति रूझान अक्सर औरतों लड़कियों के लिए अनावश्यक दवाई खाने का कारण बन जाता है। कोई काम, फंक्शन, प्रोग्राम आदि में शामिल होना हो और मासिक की तारीख हो, उन्हें पिल्स याद आ जाती हैं चाहे उन्हें खाने से सेहत पर विपरीत असर क्यों न पड़ता हो।
इसी तरह अनचाहा गर्भ धारण कर फिर उसे नष्ट करने की प्रक्रि या का भी औरत की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। यह मुसीबत उनकी अपनी बुलाई होती है। इससे बचा जा सकता है। इसी प्रकार छोटी-मोटी मानसिक तकलीफों से भी स्वयं निपटा जा सकता है। कोई भी मुसीबत आखिर जिन्दगी से तो बड़ी नहीं, यही सोचकर मन को शांत किया जा सकता है और तब उससे निपटने का निदान ढूंढा जा सकता है।
अक्सर एक उम्र के बाद जब बच्चे बड़े होकर अपनी जिदंगी जीने लगते हैं, तब अपनी मां के प्रति उनकी उदासीनता उसका दिल तोड़ देती है। नतीजन वह क्षुब्ध होकर चिड़चिड़ी होने लगती है। पति भी उसे समझ नहीं पाते, इसीलिए शायद उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ही हर समय बीमारी का राग अलापना शुरू कर देती है। इस तरह वह केवल परिवार को बोर ही करती हैं। यह एक दुष्चक्र बन जाता है।
आज का यह सच बहुत कड़वा है कि मां बाप के अहसानों को संतान उनका फर्ज कहकर अपने कर्तव्यों से छुट्टी पा लेती है। इसे स्वीकार कर लेने में ही औरत की भलाई है। उसे अपने जीवन की लड़ाई अपने बलबूते पर ही लड़नी है। अपना अच्छा सा दोस्ती का दायरा बनाएं। रूचियां पालें। सही खानपान और नियमित व्यायाम के साथ बाहर छुट्टी मनाने जाएं। मनोरंजन को महत्त्व दें। अवसाद से यूं निपटा जा सकता है। अपने को व्यस्त रखेंगी तो छोटी-मोटी तकलीफें स्वयं ही छूमंतर हो जाएंगी।


