- 7 सितम्बर अनंत चतुर्दशी पर गणपति बप्पा के अलग-अलग स्वरूपों का घर-घर में 11 दिनों के लिए आगमन होगा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी, यह कहावत भारत की विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों तथा त्योहारों का वर्णन करती है। भारत विविधताओं का देश है। यहां पर एक प्रदेश का त्योहार दूसरे प्रदेश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। गणपति बप्पा के आगमन में कुछ ही दिन शेष है। इस बार 7 सितम्बर अनंत चतुर्दशी पर गणपति बप्पा के अलग-अलग स्वरूपों का घर-घर में 11 दिनों के लिए आगमन होगा।
दरअसल, गणेशोत्सव की शुरुआत महाराष्ट्र की राजधानी पुणे से हुई थी। गणेश चतुर्थी का इतिहास मराठा साम्राज्य के सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ा है। मान्यता है कि भारत में मुगल शासन के दौरान अपनी सनातन संस्कृति को बचाने के लिए छत्रपति शिवाजी ने मां जीजाबाई के साथ मिलकर गणेश चतुर्थी यानी गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी।
इसी परंपरा की तर्ज पर आज यह त्योहार भगवान गणेश को बड़े-बड़े पंडालों, घरों, चौपलों, मंदिरों में विराजमान करके मनाया जाता है। गणेश उत्सव की रौनक बाजारों में भी दिखाई देने लगी है।
इस बार राम मंदिर, मोर, लाल बाग का राजा, कमल का फूल, मूषक, डबल बग्गी, बजरंगबली, शिवलोक, नंदी, शेर आदि पर गणपति महाराज विराजमान होकर आएंगे। दुकानदार अश्विनी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार मिट्टी कला बोर्ड द्वारा विशेष तौर पर प्रजापति समाज द्वारा गणपति लखनऊ से तैयार होकर आते हैं व मेरठ शहर सहित बुलंदशहर, कांधला, मुजफ्फरनगर, कैराना, खतौली व सहारनपुर तक आॅर्डर पर भेजे जा रहे हैं। इस बार 5 इंच से लेकर 6 पॉइंट 5 फीट तक की गणपति की मूर्ति बाजार में उपलब्ध है। जिनकी कीमत 320 रुपये से शुरू होकर 7000 रुपये तक है। सारे गणपतियों को इको फ्रेंडली तरह से तैयार किया गया है व आॅर्गेनिक जीवंत रंग भरे गए हैं।

