Monday, May 4, 2026
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गंगा की देसी मछलियां खतरे में

Samvad 47

PANKAJ CHATURVEDIआस्था के केंद्र बनारस में गंगा और उससे मिलने वाली सहायक धाराओं-वरुणा और असि में पारंपरिक देशी मछलियों का मरना, उनकी संख्या कम होना और इस इलाके में यदा कदा ऐसी विदेशी मछलियों का मिलना जो स्थानीय पर्यावरण को खतरा है, दर्शाता है कि नमामि गंगे परियोजना को अभी जलचरों के मामले में कागजों से ऊपर उठा कर बहुत कुछ करना है। मछली और जलचर किसी भी जल धारा का प्राण और मानक होते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणी विभाग के एक ताजा शोध में बताया गया कि जानलेवा रसायनों के कारण गंगा, वरुणा और असि नदी में सिंघी और मांगुर समेत कई देसी प्रजातियां विलुप्त हो गर्इं हैं। यह बात बहुत गंभीर है कि मछलियों की प्रजनन क्षमता 80 प्रतिशत तक घट गई है। शोध बताता है कि वैसे तो जो मछली जितनी अधिक वजन की होती है, उसके अंडे उतने ही अधिक होते हैं। एक मछली औसतन तीन से पांच लाख तक अंडे देती है, लेकिन गंगा में अब यह संख्या घाट कर 50 से 70 हजार हो आगी है।

अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण पत्रिका ‘स्प्रिंगर’ और पुणे से प्रकाशित होने वाली भारतीय शोध पत्रिका ‘डायमेंशन आफ लाइफ साइंस एंड सस्टेनेबल डेवलेपमेंट’ के नवीनतम अंक में प्रकाशित शोध पत्र बताता है कि रसायन दवाओं, माइक्रो प्लास्टिक, डिटर्जेंट, कास्मेटिक उत्पाद, पेंट, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक खादों में मिलने वाले कि एल्काइल फिनोल और टर्ट-ब्यूटाइल फिनोल समेत कई विषाक्त रसायनों की वजह से गंगा और उसकी सहायक नदियों की मछलियों के अंडे देने की दर में भयानक गिरावट आई है। बीएचयू के प्राणी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर राधा चौबे, सहायक प्रोफेसर डा. गीता गौतम का शोध बताता है कि रसायनों के कारण मछलियों की भ्रूण में मौत हो रही है। यही नहीं, मछलियों में विभिन्न तरीके के रोग भी लग रहे हैं, जिनमें कशेरुक विकृति, पेट और दुम के क्षेत्र में रीढ़ की विकृति, अविकसित सिर के साथ और लिवर में भी समस्या पाई गई है। मछलियों की पूंछ छोटी होना और पीछे की तरफ मुड़ जाना जैसे विकार व्यापक हैं। बढ़ते प्रदूषण के चलते अंडों का समय से पहले नष्ट हो जाने से मछलियों की आबादी तेजी से घट रही है। चिंता की बात यह भी है कि जानलेवा रसायनों ग्रस्त मछलियां न नदी के लिए लाभदायक हैं और न ही उनका सेवन करने वाले इंसान के लिए।

भारत की सबसे बड़ी नदी और दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी नदी गंगा भारत के अस्तित्व, आस्था और जैव विविधता की पहचान है। नदी केवल जल की धारा नहीं होती, उसका अपना तंत्र होता है, जिसमें उसके जलचर सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। गंगा-जल की पवित्रता को बरकरार रखने में उसके जल में लाखों साल से पाई जाने वाली मछलियों-कछुओं की अहम भूमिका है। जहां सरकार इसकी जल-धारा को स्वच्छ बनाए रखने के लिए हजारों करोड़ की परियोजना का क्रियान्वयन कर रही है वहीं यह बहुत भी चेतावनी है कि गंगा में मछली की विविधता को खतरा पैदा हो रहा है और 29 से अधिक प्रजातियों को खतरे की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। जान लें इसमें 143 किस्म की मछलियां पाई जाती हैं।

हालांकि अप्रैल 2007 से मार्च 2009 तक गंगा नदी में किए गए एक अध्ययन में 10 प्रजाति की विदेशी मछलियां मिली थीं। अंधाधुंध और अवैध मछली पकड़ने, प्रदूषण, जल अमूर्तता, गाद और विदेशी प्रजातियों के चलते मछलियों की पारंपरिक प्रजातियों पर खतरा पैदा हो गया है। बीते कुछ सालों में कई बार बनारस से कोलकाता तक ऐसी विचित्र मछली मिलती रही है, जिसका मूल निवास हजारों किलोमीटर दूर दक्षिणी अमेरिका में बहने वाली अमेजान नदी है। चूंकि गंगा का जल तंत्र किसी भी तरह से अमेजान से संबद्ध है, नहीं तो इस सुंदर सी मछली के मिलने पर आश्चर्य से ज्यादा चिंता होना लाजिमी है। सकर माउथ कैटफिश नामक यह मछली पूरी तरह मांसाहारी है और जाहिर है कि यह इस जल-क्षेत्र के नैसर्गिक जल-जंतुओं का भक्षण करती है। इसका स्वाद होता नहीं, अत: ना तो इसे इंसान खाता है और ना ही बड़े जल-जीव, सो इसके तेजी से विस्तार की संभावना होती है। यह नदी के पूरे पर्यावरणीय तंत्र के लिए इस तरह हानिकारक है कि नमामि गंगे परियोजना पर व्यय हजारों करोड़ इससे बेनतीजा हो सकते हैं।

गंगा और इसकी सहायक नदियों में पिछले कई वर्षों के दौरान थाईलैंड, चीन व म्यांमार से लाए बीजों से मछली की पैदावार बढ़ाई जा रही है। ये मछलियां कम समय में बड़े आकार में आ जाती हैं और मछली-पालक अधिक मुनाफे के फेर में इन्हें पालता है। हकीकत में ये मछलियां स्थानीय मछलियों का चारा हड़प करने के साथ ही छोटी मछलियों को भी अपना शिकार बना लेती हैं। इससे कतला, रोहू और नैन जैसी देसी प्रजाति की मछलियों के अस्तित्व के लिए खतरा खड़ा हो गया है। किसी भी नदी से उसकी मूल निवासी जलचरों के समाप्त होने का असर उसके समूचे पारिस्थितिकी तंत्र पर इतना भयानक होता है कि जल की गुणवत्ता, प्रवाह आदि नष्ट हो सकते हैं। मछली की विदेशी प्रजाति खासकर तिलैपिया और थाई मांगुर ने गंगा नदी में पाई जाने वाली प्रमुख देसी मछलियों की प्रजातियों कतला, रोहू और नैन के साथ ही पड़लिन, टेंगरा, सिंघी और मांगुर आदि का अस्तित्व खतरे में डाल दिया है।

गंगा के लिए खतरा बन रही विदेशी मछलियों की आवक का बड़ा जरिया आस्था भी है। विदित हो हरिद्वार में मछलियां नदी में छोड़ने को पुण्य कमाने का जरिया माना जाता है। यहां कई लोग कम दाम व सुंदर दिखने के कारण विदेशी मछलियों को बेचते हैं। इस तरह पुण्य कमाने के लिए नदी में छोड़ी जाने वाली यह मछलियां स्थानीय मछलियों और उसके साथ गंगा के लिए खतरनाक हो जाती हैं। गंगा में देसी मछलियों की संख्या करीब 20 से 25 प्रतिशत तक हो गई है जिसकी वजह ये विदेशी मछलियां हैं।

वैसे गंगा में सकर माउथ कैट फिश जैसी मछलियां मिलने का मूल कारण घरों में सजावट के लिए पाली गई मछलियां हैं। चूंकि ये मछलियां दिखने में सुंदर होती हैं साम सजावटी मछली के व्यापारी इन्हें अवैध रूप से पालते हैं। कई तालाब, खुली छोड़ दी गई खदानों व जोहड़ों में ऐसे मछलियों के दाने विकसित किए जाते हैं और फिर घरेलू एक्वैरियम टैंक तक आते हैं। बाढ़, तेज बरसात की दशा में ये मछलियां अपने दायरों से कूद कर नदी-जल धारा में मिल जाती हैं, वहीं घरों में ये तेजी से बढ़ती हैं व कुछ ही दिनों में घरेलू एक्वैरियम टैंक इन्हें छोटा पड़ने लगता हैं। ऐसे में इन्हें नदी-तालाब में छोड़ दिया जाता हैं। थोड़ी दिनों में वे धीरे-धीरे पारिस्थितिक तंत्र घुसपैठ कर स्थानीय जैव विविधता और अर्थव्यवस्था को खत्म करना शुरू कर देती हैं। चिंता की बात यह है कि अभी तक किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में ऐसी आक्रामक सजावटी और व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों के अवैध पालन, प्रजनन और व्यापार पर कोई मजबूत नीति या कानून नहीं है। इस तरह की मछलियां रासायनिक प्रदूषण को झेल लेती हैं, जबकि देशी मछलियों की प्रजातियां इससे आहत हैं। मछलियां, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के जैव-संकेतक हैं और देशी मछली का गंगा से इस तरह लुप्त होना नदी के लिए खतरे की घंटी है।

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