
वर्तमान समय में तमाम विकसित अर्थव्यवस्थाएं सुस्ती के दौर से गुजर रही हैं। वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर जारी रपटें बताती हैं कि वैश्विक आर्थिक क्षितिज पर मंदी के बादल मंडरा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व में अशान्ति ने वैश्विक आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय स्थिरता को धक्का पहुंचाया है। आईएमएफ ने वैश्विक आर्थिक संवृद्धि को स्थिर लेकिन निराशाजनक बताया है। ऐसे माहौल के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था आशाजनक दौर से गुजर रही है। कोविड महामारी के बाद के तीन वर्षों में लगातार आर्थिक वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2023-24 में तो यह दर 8.2 प्रतिशत तक जा पहुंची थी। मौजूदा वित्त-वर्ष की पहली तिमाही में भी यह दर 7.2 प्रतिशत थी। अनुमान था कि पूरे वर्ष के लिए यह दर 7 प्रतिशत के थोड़ा ऊपर ठहरेगी। लेकिन गत शुक्रवार को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों ने चौंका दिया। इस तिमाही जीडीपी ने 5.4 फीसदी की वृद्धि दर प्राप्त किया। यह पिछली सात तिमाहियों का सबसे निम्नतम स्तर है। जारी आंकड़ों ने विशेषज्ञों को अपने अनुमान पर फिर से विचार करने के लिए बाध्य कर दिया। अनुमान था कि इस तिमाही में वृद्धि दर में थोड़ी कमी जरूर आएगी, लेकिन इतनी कमी अप्रत्याशित थी।
अर्थव्यवस्था की रफ़्तार पकड़ती गाड़ी में झटके लगने का सबसे बड़ा कारण है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का कमजोर पड़ना। आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही में विनिर्माण की वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत पर ठहर गई। जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में इस क्षेत्र में 14.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। खनन और उत्खनन क्षेत्र में कमी दर्ज की गई जो कि ऋणात्मक 0.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष के लिए यह आंकड़ा 11.1 प्रतिशत का था। लगभग ऐसा ही हाल कृषि क्षेत्र का भी रहा। कृषि में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो पिछली चार तिमाहियों में सबसे न्यूनतम स्तर है। वहीं वित्तीय सेवाओं, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर रहा। ज्यादा बेहतर प्रदर्शन लोक प्रशासन, रक्षा और दूसरी सेवाओं में रहा, इस सेक्टर में 9.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि दर्ज की गई। गत वर्ष इसी अवधि में इस क्षेत्रने 7.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की थी।
अर्थव्यवस्था में इस वक़्ती सुस्ती के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला शहरी क्षेत्र में खपत का कमजोर पड़ना, और दूसरा सार्वजनिक पूंजीगत व्यय में नरमी आना। खपत या मांग अर्थव्यवस्था के पहिये को गति देता है। जब खपत होती है तो उत्पादन होता है। उत्पादन बढ़ने से रोजगार बढ़ता है और नतीजे में आय बढ़ती है। खपत या मांग, उत्पादन, रोजगार और आय-सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इधर कई तिमाहियों से खपत में नरमी देखी गई थी। पिछले दिनों नेस्ले इंडिया के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक सुरेश नारायणन ने कहा था कि शहरी इलाकों में रहने वाले मध्यवर्ग ने अपने खर्चों में कटौती की है। वहीं बढ़ती खाद्य मुद्रास्फीति ने भी उपभोक्ता खर्च पर असर डाला है। खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति अक्टूबर में बढ़कर 10.87 के ऊंचे स्तर तक पहुंचगई, जिससे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कमजोर हो गई। गौरतलब है कि देश के जीडीपी में लगभग 60 प्रतिशत का योगदान निजी खपत से आता है। इसलिए खपत में कमी के नतीजे में जीडीपी कि रफ़्तार सुस्त पड़गई । पहली तिमाही में आम चुनाव थे तो जाहिर है कि इस तिमाही में सरकार नेपूंजीगत व्यय वअन्य खर्चों से हाथ रोके। जिसका असर दूसरी तिमाही पर जाहिर हुआ। सरकार के कुल कैपिटल एक्पेंडीचर में 15.4 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। अर्थव्यवस्था की रफ़्तार में वक़्ती कमी या बढ़ोत्तरी होना सामान्य है। थोड़ा-बहुत उतार-चढ़ाव होता रहता है। अगर गिरावट लगातार बनी रही तो चिंताजनक होता है। भारतीय अर्थव्यवस्था विस्तार लेने की स्थिति में है। पिछले तीन वर्षों में 8 प्रतिशत वृद्धि दर का रास्ता तय किया गया।
विनिर्माण ने झटका दिया तो वहीं से वृद्धि की उम्मीदें भी हैं। इसके दो कारण हैं। पहला, तमाम रेटिंग एजेंसियां इस आशाजनक माहौल की गवाही दे रही हैं। एस एण्ड पी ग्लोबल के अनुसार भारत का परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स पिछले चार महीनों से 56 से 60 के बीच बना हुआ है। 50 से ऊपर का इंडेक्स बताता है कि विनिर्माण के क्षेत्र में आशा का माहौल है। दूसरे यह कि, पहली तिमाही में वृद्धि दर का स्तर ऊंचा था। विनिर्माण में सुस्ती की एक वजह बेस इफेक्ट यानी आधार प्रभाव भी है। अब जब आधार कम हो गया है तो इसमें वृद्धि की संभावना अधिक बढ़ गई है। गौरतलब है कि इस साल मॉनसूनी बारिश अच्छी हुई है। खरीफ फसल की बुआई पिछले साल की तुलना में 14.10 प्रतिशत बढ़ी है। इसलिए अगली दो तिमाहियों में कृषि क्षेत्र की संवृद्धि अच्छी रह सकती है। वहीं फसल अच्छी होने पर खाद्य कीमतों पर दबाव कम होगा और मुद्रास्फीति में कमी की आशा है। क्रय शक्ति बढ़ेगी और मांग में इजाफा होगा। कृषि क्षेत्र रिकवरी की राह पर बढ़ेगा। सरकार की आकांक्षा है कि 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र बने। इसके लिए मुल्क को उच्च आय वाला देश बनाने का लक्ष्य रखा गया है। यह तभी मुमकिन होगा जब 8 प्रतिशत की औसत से जीडीपी वृद्धि हासिल करे। इसके लिए अर्थव्यवस्था में निवेश दरकार है। सरकार को पूंजीगत व्यय बढ़ाना होगा साथ ही निजी पूँजी निवेश को भी बढ़ावा देना होगा। आगामी वर्ष में वैश्विक वातावरण अनिश्चित रहने की संभावना है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार टैरिफ नीतियां लेकर आएगी जिससे वाह्य सेक्टर का प्रभावित होगा।


