प्रदीप उपाध्याय
आजकल की दुनिया बस परिणाम देखती है, प्रक्रिया में किसके पसीने छूटे, किसकी पेंसिल टूटी, किसका पेन चोरी हुआ — यह सब कौन देखता है! जब रिजल्ट आता है और बच्चा स्कोर शत-प्रतिशत ला देता है, तो सब रिश्तेदार सत्ता पक्ष की तरह वाह-वाह करने आ जाते हैं, जैसे अंक नहीं, मंगलयान उतारा हो! या बच्चे ने चांद पर अपना पहला कदम रख दिया हो! घर में लड्डू बंटते हैं, बुआ बोलेगी ‘मेरे खानदान की परंपरा है’, चाचा बोलेंगे-‘मेरे डीएनए का असर है’ और पड़ोसी बोलेंगे-‘कहीं ट्यूशन वाला बहुत महंगा तो नहीं था?’ उधर जलने वाले विपक्षी दलों की तरह धार लगाए बैठे मिलते हैं और कमेंट करने लगते हैं कि खाया-पिया कुछ नहीं,ग्लास फोड़ा चार आने! वे दूसरों के कहे पर हमेशा की तरह कान लगाए जो बैठे रहते हैं। यार लोग भी ट्रंप की माफिक चिल्लाने से बाज नहीं आते, कहते हैं कि मैंने पास करवाया।
मां सगर्व कहती हैं-देखो अपने बेटे को, हर बार की तरह टॉप किया है! पिता का दर्द कौन समझ सकता है, बेटे की कोचिंग और पढ़ाई के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं! मां को भी नहीं समझा सकते! उधर बेटे की आधी जिंदगी पेंसिल तेज करने में और आधी ओएमआर शीट ढूंढने में निकल जाती है! परीक्षा के दिन जो लड़का उसकी बगल में बैठा था, उसकी भी तीन पेंसिल टूटीं थीं, दो बार रबड़ गिरा, और एक बार तो पानी की बोतल भी ढक्कन खोलकर फैल गई—लेकिन फिर भी वह लड़ा, डटा, और अच्छा खासा पर्सेंटेज ले आया। पर किसी ने पूछा क्या, बेटा, उस दिन पेन कौन सा खोया था? नहीं, सब पूछते हैं-बस इतना ही पर्सेंटेज क्यों? लेकिन तब कोई ये नहीं बोला-बेटा, परीक्षा में जो तेरी पेंसिल तीन बार टूटी थी, वो कैसे संभाली?
या जब पेपर के बीच में पेन खो गया था, तो किसके पेन से लिखना पड़ा, और वो भी ऐसे समय जब परीक्षक आपको ऐसे घूरता है जैसे आप चीन से पेपर लीक करवाने आए हों! यानी की चाइना से आप गठजोड़ करके बैठे हैं। अजीब दुनिया है—यहां अगर आपने संघर्ष किया और परिणाम नहीं आया, तो आप ‘लापरवाह’ हैं। और अगर संघर्ष छिपा रहा और अंक आ गए, तो आप ‘आदर्श’ हैं। परीक्षा में बच्चे का रोल नहीं, रोल नंबर बोलता है! यह तो वही बात हो गई कि नाचे-कुदे बांदरिया,खीर खाए फकीर!
लोग रिजल्ट कार्ड को ऐसे पढ़ते हैं जैसे बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का चार्ट हो— बस ऊपर-नीचे की संख्या देखी जाती है, न तो बैकग्राउंड चेक होता है, न उस संख्या के पीछे छुपी बेचैनी। इससे एक बात समझ में आती है कि ताली नंबर को मिलती है, तकलीफ को नहीं! अब समझ में नहीं आ रहा है कि बच्चे की सफलता पर अपनों की खुशी के बीच सत्ता पक्ष की तरह गौरवान्वित महसूस करें या विपक्षियों की तरह दूसरे जो ताने दे रहे हैं, उनका रंज मनाएं! उनकी बातों से तो यही लगता है कि मार्कशीट में संघर्ष नहीं दिखता, बस नंबर चमकते हैं, जैसे किताब से ज्यादा किस्मत पढ़ी गई हो! पेन गिरा, पेंसिल टूटी, फिर भी बच्चा टॉपर बना लेकिन समाज बोले, पेपर आसान रहा होगा!

