भगवान बुद्ध की एक भिक्षुणी शिष्या थी। उसका नाम था पटाचारा। किसी युवा से उसका मन लग गया। मां-बाप के न चाहने पर भी उसने उसके साथ शादी कर ली। कालचक्र घुमता गया। वह दो बच्चों की माता हुई। काफी वर्ष गुजरने पर पटाचारा अपने पति और दो बेटों के साथ चली श्रावस्ती नगरी की ओर। यात्रा करते करते ये लोग घने जंगल से गुजर रहे थे। रात्रि में पति ने शयन किया और सांप ने उसे काटा। पति मर गया। पटाचारा के सिर पर मानो एक दु:ख का पहाड़ गिर पड़ा। इतना ही नहीं, रात्रि को तो पति की मृत्यु देख रही है और प्रभात में पुत्र को किसी हिंसक प्राणी ने झपट लिया। वह मौत के घाट उतर गया। अब वह एकलौते बेटे को देख कर मुश्किल से संभल रही है। प्यास के मारे दूसरा बेटा पानी खोजने गया। वह झाड़ियों में उलझ गया और खो गया। अब अकेली नारी पटाचारा अपने को जैसे तैसे संभालती हुई, रास्ता काटती हुई, कंकडों पत्थरों पर पैर जमाती हुई, दिल को थामती हुई, मन को समझाती हुई मांं-बाप के दीदार के लिए भागी जा रही है। वह अबला श्रावस्ती नगरी में पहुंचती है तो खबर सुनती है कि जोरों की आंधी चली उसमें उसका मकान गिर गया और बूढे मां-बाप उसके नीचे दबकर मर गए। वह बुद्ध के पास लौट गई। पटाचारा ऐसी भिक्षुणी बनी कि उसने एक बार महिलाओं के बीच प्रवचन किया और उसी एक प्रवचन से प्रभावित होकर पांच सौ महिलाएं साध्वी हो गर्इं। कहां तो जीवन की इतनी भीषण दु:खद अवस्था और कहां बुद्ध का मिलना और वह ऐसी भिक्षुणी हो गई कि पांच सौ महिलाएं एक साथ भिक्षुणी बन पड़ी।

