जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: नेपाल में हालिया जनआंदोलन की ताकत से बनी नई अंतरिम सरकार एक नए राजनीतिक संकट की ओर बढ़ रही है। Gen Z प्रदर्शनकारियों की पसंद रहीं सुशीला कार्की, जिन्हें दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री चुना गया, अब उन्हीं के विरोध का सामना कर रही हैं। कारण है कैबिनेट गठन में युवा चेहरों की अनदेखी, और शहीद आंदोलनकारियों के परिवारों से दूरी।
नाराजगी का केंद्र बनीं कार्की
जनांदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठन ‘हामी नेपाल’ के नेता सुदन गुरुंग ने रविवार शाम प्रधानमंत्री निवास के बाहर प्रदर्शन का नेतृत्व किया। दो दिन पहले तक जिनके पैर छूते नजर आ रहे थे, आज वही सुदन गुरुंग गुस्से में बोले “जिसे पीएम की कुर्सी पर बिठाया है, उसे उतार भी सकते हैं।” गुरुंग का कहना है कि आंदोलन की सफलता के बाद बनी सरकार में युवाओं को हाशिए पर डाल दिया गया है, जबकि लड़ाई उन्हीं ने लड़ी थी।
जानें आखिर क्या है विवाद?
कैबिनेट में बुजुर्ग और पुराने चेहरों का वर्चस्व
युवाओं को नेतृत्व की जिम्मेदारी नहीं दी गई
शहीदों के परिवारों से अब तक पीएम ने नहीं की मुलाकात
राजनीतिक पारदर्शिता की जगह दिख रहा है ‘पुराना सिस्टम’
कार्की खुद युवा आंदोलनों की उपज
सुशीला कार्की खुद युवा आंदोलनों की उपज हैं। वे पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं और हालिया जनांदोलन में उन्होंने संविधान और न्याय के पक्ष में मजबूत आवाज उठाई थी। इसी कारण उन्हें सर्वसम्मति से अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया। लेकिन अब लगता है कि सत्ता की पहली परीक्षा में वे अपनी ही समर्थक पीढ़ी का भरोसा खोती जा रही हैं।
बता दें कि, यह आंदोलनकारी राजनीति और सत्ता की हकीकत के बीच का टकराव है। अगर कार्की युवा नाराजगी को नहीं समझ पाईं, तो उनकी सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगी। वहीं, प्रदर्शनकारियों के लिए भी यह पहली बार है जब सत्ता में भागीदारी का अनुभव हो रहा है।

