जनवाणी ब्यूरो |
यूपी: परमार्थ निकेतन में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का आज भव्य समापन हुआ, जिसमें पूजा स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य और आशीर्वाद से एक दिव्य और आध्यात्मिक वातावरण बना। कथा व्यास श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी के मुख से प्रवाहित हो रही इस भागवत ज्ञान गंगा ने आयोजक माहेश्वरी परिवार और श्रोताओं के हृदय, चिंतन तथा जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने उद्बोधन में कहा, “हमारे शास्त्रों में हमारी संस्कृति समाहित है। भागवत कथा केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह हमें हमारी पहचान, उद्देश्य और दिशा प्रदान करती है।” उन्होंने आगे कहा कि श्रीमद् भागवत भारतीय संस्कृति का दर्पण है, जिसमें भक्ति, ज्ञान, कर्म, करुणा और सेवा का अद्भुत समन्वय है।
स्वामी जी ने यह भी बताया कि आज के समय में जब समाज तनाव, हिंसा, असहिष्णुता और मूल्यहीनता से जूझ रहा है, तब कथाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है। “कथाएँ सिर्फ अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य का मार्गदर्शन हैं,” उन्होंने कहा। स्वामी जी ने यह भी बताया कि कथा हमें न केवल मनोरंजन या ज्ञान देती है, बल्कि हमारे जीवन को दिशा देती है और समाज को जोड़ने का कार्य करती है।
उन्होंने कहा, “कथाएँ हमें संस्कार देती हैं, संस्कार से चरित्र बनता है और चरित्र से राष्ट्र का निर्माण होता है।” स्वामी जी ने समाज में हरित कथाओं और पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए सिंगल यूज़ प्लास्टिक फ्री भंडारे आयोजित करने का भी संदेश दिया।
कथा व्यास श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी ने अपनी सरल और हृदयस्पर्शी वाणी में श्री कृष्ण की लीलाओं के माध्यम से जीवन के गूढ़ सत्य से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि भागवत कथा हमें ‘स्व’ से जोड़ती है, जो हमें आत्मा और चेतना के महत्व को समझने में मदद करती है। इसके साथ ही यह कथा हमें ‘समाज’ और ‘समष्टि’ से जोड़ती है, जो कर्तव्य, संवेदनशीलता और सेवा भाव के माध्यम से पूरी सृष्टि के साथ सामंजस्य और सह-अस्तित्व का बोध कराती है।
कथा के समापन के अवसर पर परमार्थ गंगा तट पर भावनाओं, कृतज्ञता और करुणा का वातावरण बना। श्रद्धालुओं की आंखों में भावनाएँ, हृदय में संतोष और जीवन में नई ऊर्जा का संचार स्पष्ट रूप से देखा गया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कथा व्यास श्री मृदुल कृष्ण शास्त्री जी और कथा आयोजक माहेश्वरी परिवार को रूद्राक्ष का दिव्य पौधा भेंट किया और सभी से अपने पर्वों, त्यौहारों, जन्मदिवस, विवाहदिवस व उत्सवों पर पौधा रोपण का संकल्प लिया।
समापन के साथ यह श्रीमद् भागवत कथा यह संदेश छोड़ गई कि कथाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी युगों पहले थीं, क्योंकि मानव का संघर्ष, प्रश्न और समाधान आज भी वही हैं। जब तक मानव है, तब तक कथा है, और जब तक कथा है, तब तक जीवन में प्रकाश, जागृति और आशा बनी रहेगी।

