Tuesday, April 28, 2026
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घंटाघर पर फालतू लोगों की फालतू बातें

‘नलों से आने वाला पानी ही जहरीला था,तभी तो इतने लोग मरे और बीमार हुए, ’ घंटाघर पर बैठे एक फालतू आदमी ने जिरह छेड़ी।

‘अरे क्या वाहियात सी बात कर रहे हो। पानी अगर जहरीला होता तो क्या इतने कम लोग मरते! व्यवस्था इतनी भी असंवेदनशील नहीं है। वैसे संवेदनशीलता शरीर की होती है, व्यवस्था की नहीं,’ दूसरे फालतू आदमी ने तर्क पेला।

‘अरे नहीं भाई व्यवस्था की संवेदनशीलता घटना के बाद जागृत होती है। दूसरी बात यह भी है कि किसी -किसी की इम्यूनिटी बहुत स्ट्रांग होती है। ऐसे लोग पत्थर-दग्गड़ तक हजम कर जाते हैं। उनका बाल भी बांका नहीं होता। कमजोर इम्यूनिटी वाले झट टें बोल जाते हैं।’ तीसरे फालतू आदमी ने टांग अड़ाई।

‘लेकिन यार,ये पानी गंदा क्यों हो जाता है! इतने इंजीनियर, इतने विभाग! फिर भी? ये बड़े-बड़े इंजीनियर क्या झक्क मारते हैं। फोकट की तनख्वाह लेते हैं!’चौथे फालतू आदमी ने गुटखे की पिचकारी घंटाघर की दीवार पर मारते हुए अपने गुस्से का इजहार किया।

‘बेचारे इंजीनियर क्या करें। इंजीनियरों को दोष देना आसान है, गड़बड़ करते हैं ठेकेदार और बलि के बकरे बनते हैं इंजीनियर। ठेकेदार पैसा बचाने के लिए पानी की लाइन और सीवरेज की लाइन में दूरी नहीं रख पाते हैं।और वैसे भी आजकल पाइप ही हल्की क्वालिटी के आने लगे हैं।कभी सीवरेज के पाइप फटकर पानी की लाइन में घुस जाते हैं तो कभी पानी की लाइन सीवरेज की लाइन के गले मिल जाती है। इंजीनियरों को यह थोड़े ही मालूम रहता है कि कौन सी लाइन कहां से गई है!’ पहला फालतू उसकी बात से असहमति व्यक्त करते हुए उवाचा।

‘कैसी बात कर रहा है भाई! क्या तूने भी औरों की तरह कमीशन खाया हुआ है जो त्रुटिकतार्ओं के पक्ष में बोल रहा है!’ ठेकेदार बेचारा क्या करें।कमीशन में कितनी प्रतिशत राशि बंट जाती है,तुझे जानकारी भी है? चौथे फालतू से रहा नहीं गया। इसी बीच नगर निगम का एक टैंकर घंटाघर के पास से गुजरा। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था ‘शुद्ध पेयजल आपूर्ति’। टैंकर से पानी टपक रहा था।पानी बहकर नाली में जा रहा था। नाली से वही पानी पाइप की ओर लौट रहा था। घंटाघर की सीढ़ियों पर बैठे पहले फालतू ने परिदृश्य देखकर कहा,‘ देखा, री-सायक्लिंग का जमाना है। स्मार्ट सिटी है।’

‘चलो चलें,’ चौथा फालतू उठते हुए बोला,‘घर चलकर चाय पीते हैं।’

‘पानी उबाल लेना,’तीसरे फालतू ने औपचारिक सावधानी जोड़ी।

‘अरे रहने दो,’ दूसरा हंसा,‘हमारी आदत पड़ चुकी है जहर पीने की।’

चारों फालतू आदमी अपने-अपने घरों की ओर चल दिए। घंटाघर वहीं खड़ा रहा। व्यवस्था ने राहत की सांस ली, क्योंकि समस्या पानी में नहीं थी, सवाल पूछने वालों में थी और इस तरह व्यवस्था निश्चिंत रही कि जब तक हर मौत को ‘दुर्भाग्य’ कहा जा सकता है, तब तक कोई अपराध नहीं बनता।

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