जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: निजी क्षेत्र के आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ शाखा में 590 करोड़ रुपये की बड़ी धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। इस घटना ने बैंक की साख को झटका दिया है और शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मामला हरियाणा सरकार से जुड़े खातों तक सीमित बताया जा रहा है, लेकिन इसके असर व्यापक दिख रहे हैं।
कैसे हुआ खुलासा?
18 फरवरी 2026 को हरियाणा सरकार की संस्थाओं ने अपने खातों के बैलेंस में गड़बड़ी पकड़ी। जांच में सामने आया कि शाखा के कुछ कर्मचारियों ने बाहरी लोगों के साथ मिलीभगत कर फर्जी चेक और जाली प्राधिकरण पत्रों के जरिए करोड़ों रुपये अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए।
बैंक ने चार अधिकारियों को निलंबित कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। स्वतंत्र फोरेंसिक जांच के लिए KPMG को नियुक्त किया गया है।
घटना के बाद हरियाणा सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और AU Small Finance Bank को डी-एम्पैनल कर दिया है और सरकारी विभागों को अपने खाते बंद करने के निर्देश दिए हैं।
शेयर बाजार में भारी गिरावट
घोटाले की खबर सामने आते ही सोमवार को बैंक के शेयरों में 20% तक की गिरावट दर्ज की गई, जो मार्च 2020 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है। इस गिरावट से निवेशकों को करीब 14,438 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
धोखाधड़ी की राशि (590 करोड़ रुपये) बैंक के तीसरी तिमाही के 503 करोड़ रुपये के शुद्ध लाभ से भी अधिक है।
CEO वी. वैद्यनाथन की सफाई
बैंक के एमडी और सीईओ V. Vaidyanathan ने इसे ‘सिस्टमिक फेल्योर’ मानने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि यह एक शाखा और एक विशेष ग्राहक समूह तक सीमित घटना है।
सीईओ के मुताबिक, बैंक में ‘मेकर-चेकर-ऑथराइजर’ जैसे नियंत्रण मौजूद हैं, लेकिन कर्मचारियों और बाहरी लोगों की आपराधिक मिलीभगत से नियमों को दरकिनार किया गया। उन्होंने भरोसा दिलाया कि बैंक के पास पर्याप्त पूंजी है और 590 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रभाव प्रबंधनीय है। साथ ही, संदिग्ध खातों में मौजूद रकम को फ्रीज कराने के लिए अन्य बैंकों से संपर्क किया गया है।
RBI की नजर
पूरे मामले पर Reserve Bank of India नजर बनाए हुए है। आरबीआई गवर्नर Sanjay Malhotra ने कहा है कि इस घटना से कोई ‘प्रणालीगत जोखिम’ नहीं है और यह धोखाधड़ी केवल हरियाणा सरकार के विशिष्ट खातों तक सीमित है। अन्य ग्राहकों की रकम सुरक्षित है।
आगे क्या?
यह मामला बैंकिंग सेक्टर में शाखा-स्तरीय निगरानी और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर सवाल खड़े करता है। हालांकि बैंक प्रबंधन और आरबीआई ने इसे सीमित घटना बताया है, लेकिन सरकारी फंड प्रबंधन को लेकर बैंक की साख को नुकसान हुआ है। अब बाजार की नजर फोरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट और 590 करोड़ रुपये की रिकवरी पर टिकी हुई है।

