Friday, April 24, 2026
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केंद्र के साए में बंगाल के चुनाव

04 10

1952 से ही भारत में एक सुगठित चुनाव प्रणाली कायम की हुई थी, जिसमें संसद और विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग और राज्य सरकार की भूमिका रखी गई थी। केंद्र या केंद्र सरकार का इसमें कोई रोल नहीं रखा गया था। चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम तथा चुनाव व्यवस्था को नियंत्रित करता था और राज्य सरकारें इस हेतु संसाधन उपलब्ध कराती थीं। चुनाव प्रक्रिया के दौरान राज्य का प्रशासनिक अमला चुनाव आयोग के नियंत्रण में रहता था और चुनाव कार्य हेतु किसे कहां तैनात किया जाएगा यह राज्य सरकार के साथ समन्वय करके चुनाव आयोग निर्णय लेता था। आम तौर पर राज्य की पुलिस इस कार्य में लगाई जाती थी। केंद्रीय बल केवल गिनी-चुनी जगहों पर ही जहां की पूर्व में हिंसा का इतिहास रहा है वहां तैनात किए जाते थे। निष्पक्षता हेतु चुनाव आयोग कुछ अधिकारियों का अस्थाई स्थानांतरण भी कर देता था लेकिन यह बहुत ही सीमित रूप से होता था।

अभी के बंगाल विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार ने लंबे समय से चली आ रहीं ये सारी संवैधानिक, प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्थाएं पूरी तरह से बदल दी हैं और राज्य सरकार एवं राज्य पुलिस का रोल लगभग समाप्त कर दिया है। इसकी शुरुआत एसआईआर से हुई जहां वोटर लिस्ट पुननिरीक्षण प्रक्रिया में बीएलओ तथा ईओ के ऊपर अन्य प्रदेशों से लाए गए अधिकारी पर्यवेक्षक के नाम से बैठा दिए गए और मतदाता सूची की समीक्षा का अंतिम अधिकार उन्हें सौंप दिया गया। परिणाम स्वरूप लगभग नब्बे लाख वोटर्स को संदिग्ध मान कर उनमें से तीस लाख वोटर्स के नाम तत्काल विलोपित कर दिए गए और साठ लाख को जांच के घेरे में रख कर मतदाता सूची से बाहर रख दिया गया। यह एक बहुत बड़ी संख्या थी, जो क्लोज फाइट में परिणामों को बड़ी आसानी से प्रभावित कर सकती थी। इसके विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में गई और बहुत दिन लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने हटाए गए लोगों की सूची की जांच करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को लगाने के आदेश दिए। अब इन न्यायिक अधिकारियों ने जांच करने और प्रभावितों से दस्तावेज हासिल करने में बहुत समय लगा दिया जो स्वाभाविक भी था।

इसी बीच चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया और मतदाता सूची सील्ड हो गई। अब इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता था। तब तक न्यायिक अधिकारियों की स्क्रूटिनी में तैंतीस लाख नामों को मान्य कर दिया गया था लेकिन सत्ताइस लाख नाम अभी भी बाहर रह गए। तृणमूल कांग्रेस फिर से एक बार सुप्रीम कोर्ट गई और इन सत्ताइस लाख लोगों को न्याय दिलाने का अनुरोध किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए अब बनाए गए विभिन्न ट्रिब्यूनल्स के पास केस टू केस अपील करने को कहा जो कि चुनाव तारीख के नजदीक आ जाने के कारण कोई अर्थ नहीं रखता है। परिणाम यह हुआ कि इस चुनाव में लगभग सत्ताइस लाख वैध मतदाता जो केवल मामूली तकनीकी त्रुटियों की वजह से बाहर कर दिए गए हैं, हिस्सा नहीं ले पाएंगे जो किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है।

बंगाल के इन चुनावों में चुनाव आयोग ने पूरे राज्य की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया जब उसने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक सहित लगभग छ: सौ बड़े अधिकारियों को पारदर्शिता और निष्पक्षता के नाम पर बदल दिया। प्रदेश की पुलिस के ऊपर उसने केंद्रीय सुरक्षा बलों को भारी मात्रा में चुनावी ड्यूटी पर लगा कर मतदाताओं में भय और असमंजस का माहौल बना दिया। कहीं कहीं सेना को भी फ़्लैग मार्च के लिए तैयार स्थिति में रखा गया है। ऐसा वातावरण बना दिया गया है, जहां लगता है चुनाव नहीं कोई जंग हो रही हो। निश्चित रूप से यह सब केंद्र सरकार की सहमति से ही चुनाव आयोग कर रहा है क्योंकि राज्य सरकार को तो इस चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर ही कर दिया गया है।

यह भी हकीकत है कि बंगाल में चुनावों में भारी हिंसा का इतिहास रहा है और चुनाव आयोग दावा कर रहा है कि वह इस की गंभीरता को देखते हुए ही ये सारी व्यवस्थाएं कर रहा है। लेकिन मतदान केंद्रों पर सेना या अर्द्धसैनिक बलों को तैनात करना कहीं से भी उचित नहीं होता है। हां संवेदनशील स्थानों पर इनकी गश्त कराई जा सकती है। यह भी एक गंभीर स्थिति है कि चुनाव आयोग की गफलत या जानबूझकर बनाई गई योजना से लाखों वैध मतदाता इस चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।

बंगाल चुनाव न्यायपालिका एवं चुनाव आयोग के लिए एक कसौटी बन गया है ईमानदार, पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए। यदि वे सफल हुए तो इससे लोकतंत्र अधिक मजबूत होकर उभरेगा लेकिन यदि दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो पाया तो यह भारतीय लोकतंत्र एवं संविधान के लिए अशुभ प्रकरण माना जाएगा। लोकतंत्र पर आंच नहीं आने देनी चाहिए।

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