आनंद कु. अनंत
ग्रीष्म के आगमन के साथ ही बाजार में तरह-तरह के शीतल पेय पदार्थों का आना शुरू हो जाता है, जिनमें-पेप्सी, लिमका, कोका कोला, नींबू पानी, जीरा-जल, पोदीना, आदि कई प्रकार के शीतल पेयों से बाजार भरा होता है तथा गर्मी की तपश से बचने के लिए आबाल वृद्ध-नारी इनका प्रयोग कर राहत पाते हैं।
फेनिल पेय अर्थात झागदार पेय को बनाने का प्रयास प्राचीन काल से ही वैज्ञानिकों द्वारा होता रहा है। उनका यह प्रयास था कि प्राकृतिक स्रोतों से ऐसे स्वास्थ्यवर्द्धक झागदार पेय का निर्माण किया जाय जो नशारहित हो। ‘फांन-हेल्मांण्ट’ नामक वैज्ञानिक ने सबसे पहले पता लगाया कि ‘कार्बन डाइआक्साइड गैस’ के माध्यम से जल को फेनिल बनाया जा सकता है।
इस प्रकार के जल को वायुक्त (फेनिल) जल का नाम दिया ‘ग्रेवियेल केनेल’ ने। ‘जोसेफ ब्लैक’ नामक रसायनिक चिकित्सक ने सर्वप्रथम प्राकृतिक स्रोत के गैस अंश के लिए ‘स्थिर वायु’ शब्द का प्रयोग किया। इस अनुसंधान के बाद प्राकृतिक स्रोतों के विशेष गुणयुक्त जल का कृत्रिम रूप से निर्माण प्रारंभ किया गया।
1772 में अंग्रेज वैज्ञानिक प्रीस्टले ने ‘स्थिर वायु द्वारा जल प्राप्त करने की क्रिया’ नामक लेख प्रकाशित किया जिसके आधार पर लंदन की रायल सोसायटी ने उन्हें ‘कौपली मेडल’ द्वारा सम्मानित किया। स्वीडन के वैज्ञानिक ‘प्रीस्टले शोले’ तथा फ्रांस के वैज्ञानिक ‘लवाज्ये’ के सतत प्रयासों से पता चला कि प्रीस्टले की स्थिर वायु कार्बन एवं आॅक्सीजन संयोजित गैस है। ऐसा पता लगते ही ‘जौन मेरविन नूथ’ नामक अंग्रेज वैज्ञानिक ने 1775 में फेनिल पेय के अल्प मात्रा में निर्माण के लिए एक विशेष उपकरण बनाने में सफलता प्राप्त की। इस उपकरण में ‘जीन हयासीथ डे मैगलेन’ के प्रयासों के कारण 1777 में विशेष सुधार संभव हुआ और 1781-83 के बीच हेनरी नामक अंग्रेज वैज्ञानिक ने व्यावसायिक आधार पर इसका उत्पादन प्रारंभ करने की मशीनों की योजना की रूपरेखा बनायी।
इसके बाद यूरोप तथा इंग्लैण्ड के अनेक नगरों में 1789 से 1821 के बीच व्यापारिक स्तर पर इसका उत्पादन प्रारंभ हुआ। अमेरिका में सर्वप्रथम 1807 में ‘फेनिल पेय’ को बोतलों में भरने का कारखाना ‘कनेक्टिकट न्यू हेवेन’ नगर में प्रारंभ किया गया। इस प्रकार एक अन्य कारखाना हार्किस द्वारा ‘फिलाडेल्फिया’ में 1809 में प्रारंभ किया गया। इसके बाद आज दुनिया भर में सैकड़ों कारखाने इसके उत्पादन में स्थापित हो चुके हैं, जो विश्व के करोड़ों लोगों को अनेक ब्रांडों में शीतल पेय पदार्थ उपलब्ध करा रहे हैं।
फेनिल पेय (झागदार पेय पदार्थ) जिसे कार्बोनेटेड जल भी कहा जाता है, वस्तुत: नशारहित शीतल पेय होता है जिसे बनाने के लिए विभिन्न दाब पर कार्बोनिक गैस या कार्बन डाइआक्साइड से कृत्रिम रूप में सन्तृप्त किया जाता है। सामान्यत: पेय पदार्थों को लवण, शर्करा, तथा स्वादसार (विभिन्न स्वादवाला) एवं सुगन्धसार पदार्थों की निश्चित मात्रा को मिश्रित करके बनाया जाता है।
फेनिल पेय का प्रयोग ग्रीष्म ऋतु में औषधि एवं सामान्य पेय दोनों ही रूप में किया जाता है। ग्रीष्म में प्राय: पेट की शिकायतें अधिक मिलती हैं। ऐसे में राहत पाने के लिए शीतल पेयों का प्रयोग किया जाता है। फेनिल पेयों को दो वर्गों में बांटा गया है। एक वर्ग में फेनिल पेय को सामान्य फेनिल पेय कहते हैं। इसमें सामान्यत: कार्बोनिक अम्ल, गैस युक्त जल तथा अल्प मात्रा में नमक एवं अन्य खनिज लवणों का सम्मिश्रण होता है। इस वर्ग के फेनिल पेय को सामान्य भाषा में सोडा जल (सोडा वाटर) कहा जाता है।
दूसरे वर्ग में फेनिल पेय को सामान्य भाषा में लेमनेड जल या मीठा पानी (मृदुपेय) कहा जाता है। इसमें कार्बोनेटेड जल के अतिरिक्त इसे सुगन्धित और स्वादिष्ट बनाया जाता है। इसमें अल्प मात्रा में शर्करा या सैकरीन घुला होता है। इसके अलावा इस वर्ग के फेनिल पेय में प्राकृतिक स्वाद, उत्पन्न करने के लिए फल, पुष्प, कंदमूल एवं पत्तियों के रसों या सारों को भी मिलाया जाता है। आज के समय में कृत्रिम स्वादसार कारकों का उपयोग अधिक होने लगा है। फेनिल पेय को बोतलों में बंद करते समय 100 से 120 पाउण्ड के दाब का उपयोग किया जाता है जिससे बोतल के अंदर 45 से 55 पाउण्ड का दाब उत्पन्न होता है। इस प्रकार के फेनिल पेय की बोतलों के खोलने पर गैस की दाब के कारण बुदबुदन प्रारंभ हो जाता है और पेय से कार्बन डाइआक्साइड गैस की अधिकांश मात्रा (जल में कुछ खुली मात्रा को छोड़कर) निकल जाती है। इस क्रिया में अधिक समय नहीं लगता है।
इस क्रिया को उत्पन्न करने के लिए ‘सैपोनिन’ नामक वानस्पतिक उत्पादन का प्रयोग किया जाता है। यह पदार्थ वनस्पति तथा पेड़-पौधों की छाल से निकाला जाता है। ग्रीष्म ऋतु में सैपोनिन युक्त शीतल पेय के प्रयोग से तन-मन दोनों ही चुस्त-दुरूस्त बने रहते हैं।

