जनवाणी संवाददाता |
मोदीपुरम: सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि के वैज्ञानिक प्रोफेसर आरएस सेंगर का कहना है कि भारत में बढ़ती आबादी के पोषण के लिए कृषि उत्पादों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भुखमरी की समस्या को निपटने के लिए अधिक खाद्यान्न उत्पादन के लिए कीटनाशकों का प्रयोग लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत में सर्वप्रथम कीटनाशक का प्रभाव 1958 में केरल में देखा गया था।
कीटनाशक का प्रयोग कीटों को नष्ट करने पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए किया जाता है। मुक्ता हरवी साइट फफूंदी नासी कीटाणु राशि आते है। कीटनाशक का दीर्घकालिक और अल्पकालिक प्रभाव कृषि पशुओं और मनुष्य के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ता है।
अनेक अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि कीटनाशकों का प्रभाव संपूर्ण विश्व में हुआ है। डा. सेंगर के अनुसार कीटनाशक का प्रभाव आने वाली नई पीढ़ी पर भी पड़ता है। सामान्य से अधिक कीटनाशक का प्रयोग से पर्यावरण संतुलन पर खतरा बढ़ता जा रहा है।
भारत में क्षेत्र परिषद कीटनाशक का प्रयोग होता है। विश्व में यह 44% है। कीटनाशकों के विश्व भारत में प्रयोग के परिषद की मात्रा को देखा जाए तो हम पाते हैं कि अब भारत में भी काफी मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग किया जाने लगा है। मृदा की गुणवत्ता को बनाए रखने में सुख जीवो का अत्यंत महत्व है।
कीटनाशकों से ज्यादा प्रयोग से शुभ श्री भी नष्ट होने लगते है। मृदा में कितना सी प्रयोग के कारण खनिज तत्वों की कमी विशालता का बंदा आवश्यक जीवाणुओं का सफाया व उर्वरा शक्ति की कमी जैसी समस्याएं आती है।
पेस्टिसाइड का कृषि पर प्रभाव
डा. सेंगर ने पेस्टीसाइड के प्रभाव की जानकारी देते हुए बताया कि पेस्टिसाइड्स योग के पश्चात मुख्य रूप से जल भोज सामग्री सब्जियों वह वायु के माध्यम से फैलता है। मनुष्य में यह मुख्य रूप से तीन मार्ग स्वास मुख व त्वचा के माध्यम से प्रवेश करता है विकासशील देशों में सीधे संपर्क के द्वारा भी संक्रमण देखा गया है।
जानवरों में कीटनाशक कटे हुए त्वचा वासवास के माध्यम से प्रवेश करता है भूमिगत जल भी कीटनाशक से प्रभावित होता है योग में होने वाले कीट नासिका केवल पांच से 10 प्रतिशत भाग ही प्रभावी होता है बल्कि जल व वायु द्वारा पर्यावरण में फैल जाता है पर्यावरणीय कितना सी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जब तंत्र को प्रभावित करता है वर्तमान में किसानों द्वारा उपयोग में लाने वाले बर्तन भी मानक स्तर से काफी नीचे देखे गए हैं।
इस कारण कीटनाशकों की कुछ मात्रा सीधे पर्यावरण में फैल रही है, अधिक मात्रा में पेस्टिसाइड प्रयोग से कीटों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है जिससे कीटनाशक प्रभावहीन होने लगते हैं कीटनाशक प्रयोग से दलहन फसलों में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण क्षमता कम हो जाती है।
राइजोबियम जीवाणु और नाइट्रोजन के बीच संकेत स्थान तरण सही ढंग से नहीं होने के कारण यह समस्या आती है क्लो या पैरा लीड के प्रयोग से आलू के उत्पादन में कमी आती है। मृदा में पाए जाने वाले एंजाइम पुरवा शक्ति को बढ़ाते हैं पेस्टिसाइड के प्रयोग से एंजाइम की सक्रियता कम होने लगती है।
एंजाइम सरिता मृदा की गुणवत्ता मापन हेतु इकाई के रूप में कार्य करता है ज्यादातर लोगों में पाया गया है कि यदि लगातार की टांग 79 व फफूंदी नाशक का प्रयोग किया जाता है तो इसका वातावरण के साथ-साथ फसल उत्पादन पर भी बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़ता है।

