जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: कृषि कानून के खिलाफ सपा व रालोद ने संयुक्त महापंचायत की। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी, इसका पहले ही ऐलान किया जा चुका हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में तो गठबंधन की गांठ लग गई, लेकिन पंचायत चुनाव में सपा व रालोद आमने-सामने क्यों हैं? क्या गठबंधन भी शर्तों के आधार पर किया जा रहा है।
सपा-रालोद का गठबंधन सिर्फ विधानसभा चुनाव के लिए है, बाकी पंचायत चुनाव में क्यों नहीं? सपा-रालोद के प्रत्याशी इस चुनाव में आमने-सामने हैं। ऐसे में दोनों ही पार्टियों को भारी नुकसान होगा। ऐसा राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है। दरअसल, जनता के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई थी कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भी सपा-रालोद गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ।
सपा व रालोद ने अपने अलग-अलग प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतार दिया है। जिला पंचायत सदस्य पद के लिए दोनों ही पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशियों को समर्थन का ऐलान किया है। भाजपा के खिलाफ सपा-रालोद दोनों ही पार्टियों ने दम भर रखा है।
कृषि कानून के खिलाफ वेस्ट यूपी के किसान भी एकजुट थे, लेकिन पंचायत चुनाव में जब सपा-रालोद ही एक-दूसरे के सामने डटे हैं, तो ऐसे में भाजपा भी पंचायत चुनाव में निश्चित रूप से पैर जमा लेगी। क्योंकि भाजपा के लिए पंचायत चुनाव किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन जिस तरह की राजनीति पंचायत चुनाव को लेकर आरंभ हुई हैं, उसके बाद से सपा-रालोद के नेता एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चाबंदी कर वोट मांग रहे हैं।
वोटर भी नहीं समझा पाए है कि आखिर सपा-रालोद का गठबंधन कैसा हैं, जो आमने-सामने चुनाव लड़ रहे हैं? सपा-रालोद के शीर्ष नेताओं के बीच लगता है पंचायत चुनाव को लेकर गठबंधन जारी रखने के लिए आम सहमति नहीं बनी हैं, जिसके चलते ही ऐसे हालात पैदा हो गए है कि वोटरों का कई जगह बिखराव होना तय है। इसका लाभ सीधे भाजपा को मिलेगा।
यही वजह है कि पूरी रणनीति के तहत प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह समेत तमाम भाजपा नेताओं को पंचायत चुनाव में फोकस करने के लिए लगा दिया गया है। भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष मोहित बेनीवाल, प्रदेश के सह संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह समेत पूरा संगठन वेस्ट यूपी में झोंक दिया गया है। क्योंकि वेस्ट यूपी से ही कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन चल रहा है।
ऐसे में भाजपा ने जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव पर पूरा फोकस कर दिया है। भाजपा भले ही पंचायत चुनाव को लेकर फूंक-फूंककर कदम रख रही हो, लेकिन सपा व रालोद नेता पंचायत चुनाव के मैदान में एक-दूसरे के सामने डट गए हैं। पंचायत चुनाव 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव का एक तरह से रिहर्सल है।
इस रिहर्सल में कौन किसे मात देता है यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं, मगर इतना अवश्य है कि सपा-रालोद के अलग-अलग चुनाव लड़ने से भाजपा के लिए जो पंचायत चुनाव बड़ी चुनौती माना जा रहा था, वो मुश्किल राहें आसान हो सकती है।
रालोद में टिकट वितरण को लेकर हो रही फजीहत
जिला पंचायत सदस्य पद के लिए रालोद में टिकट वितरण को लेकर उंगली उठ रही है। फजीहत तब हो गई, जब रालोद के घोषित प्रत्याशियों के खिलाफ पार्टी के ही नेताओं ने चुनाव मैदान में ताल ठोंकने का ऐलान कर दिया है। वार्ड-13 में कुछ वैसे ही हालात पैदा हो गए हैं। प्रदीप हुड्डा के पैतृक गांव बहादुरपुर गांव में मंगलवार को हुई पंचायत में रालोद के घोषित प्रत्याशी को लेकर गहमा-गहमी रही।
अंत में निर्णय यह हुआ कि प्रदीप हुड्डा की पत्नी सपना हुड्डा को पंचायत चुनाव लड़ाएगी। इस पर सहमति की मुहर लगा दी। इस तरह से रालोद में बगावत हो गई है। एक ही पार्टी के दो-दो प्रत्याशी चुनाव मैदान में ताल ठोंकेंगे। कई दिनों से वार्ड 13 को लेकर जद्दोजहद चल रही थी।
रालोद ने अनिकेत को प्रत्याशी घोषित किया, जिसके खिलाफ हाल ही में रालोद का दामन थामने वाले प्रदीप हुड्डा ने पंचायत के निर्णय के बाद चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। एक तरह से वार्ड 13 में रालोद की राह बागियों की वजह से आसान नहीं रहेगी। पंचायत रालोद के स्थानीय नेताओं के खिलाफ एकजुट हो गई है। प्रदीप हुड्डा की पत्नी सपना हुड्डा गुरुवार को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल करेंगे।

