- जिंदगी और मौत से जूझ रहे कैंसर मरीजों को मेडिकल में नहीं मिल पा रहा इलाज, धक्के खा रहे तीमारदार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: जिंदगी और मौत की जंग लड़ने वाले कैंसर मरीजों को मेडिकल चिकित्सालय में इलाज नहीं मिल पा रहा है। जिसका कारण है अस्पताल में साल 2015 से खराब पड़ी रेडियोथेरेपी मशीन। छह वर्षों से खराब पड़ी रेडियोथेरेपी मशीन बंद कमरे में जंग खा रही है। वहीं, मेडिकल प्रबंधन को न तो मशीन की देखरेख की परवाह है और न ही इसको ठीक कराने की जिम्मेदारी।
वहीं, मेडिकल कालेज में बजट का अभाव होने के चलते रेडियोथेरेपी मशीन को सालों से ठीक नहीं कराया गया है। जिसके कारण यहां आने वाले कैंसर मरीजों को इलाज के लिए अन्य स्थानों पर भेजा जा रहा है। वहीं, गरीब पीड़ित कैंसर मरीज इलाज के लिए परेशान हैं। मेरठ एवं आसपास के क्षेत्र के बड़ी संख्या में ऐसे कैंसर मरीज हैं, जो मेडिकल चिकित्सालय पर निर्भर हैं।
वहीं, मेडिकल में वर्षों से खराब पड़ी मशीनों एवं दवाओं की कमी के चलते मरीज काफी परेशान हैं। वहीं, मेडिकल चिकित्सालय में आने वाले गरीब मरीजों का कहना है कि अस्पताल में बड़ी उम्मीद से इलाज के लिए इतनी दूर से आते हैं ताकि कम खर्च पर अच्छा इलाज मिल सके। लेकिन यहां आकर भी निराशा ही हाथ लगती है। कभी मेडिकल में मशीन खराब होने के कारण समय से इलाज नहीं मिल पाता तो फिर कभी बाहर से महंगी दवाइयां लाने का रास्ता दिखा दिया जाता है।
मरीजों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में अधिकतर गरीब परिवार के लोग ही आते हैं। ऐसे में जब सही उपचार नहीं मिल पाता तो सिर्फ मायूस होकर वापस लौटने में तकलीफ होती है। कैंसर के इलाज में लाखों रुपये का खर्चा आता है। ऐसे में गरीब और मजदूर इंसान इलाज के लिए लाखों रुपये कहां से लाए? मरीजों का कहना है कि यही वजह है कि लाखों लोगों को जिंदगी और मौैत की जंग से लड़ते हुए इलाज के अभाव में अपनी जान गंवानी पड़ती है।
गरीब कैंसर मरीजों को नहीं मिल रहा इलाज
जिले के मेडिकल चिकित्सालय में कैंसर के कई 100 गरीब मरीज इलाज के लिए आते हैं। जिन्हें कम खर्च पर इलाज की दरकार होती है। ये गरीब मरीज ऐसे हैं जो लाखों रुपये निजी अस्पतालों में खर्च करने में असमर्थ हैं। ऐसे में अस्पताल में साल 2015 से खराब पड़ी रेडियोथेरेपी मशीन के चलते मरीजों को इलाज के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है।
मेडिकल कालेज के डा. सुभाष सिंह ने बताया कि रेडियोथेरेपी मशीन को ठीक कराने के लिए जिस मेटेरियल की आवश्यकता है, उसका भुगतान कर दिया गया है। आॅटोमेटिक एनर्जी रेगूलेटरी बोर्ड (एईआरबी), बांबे से एनओसी के पास होते ही मशीन को ठीक कराने का कार्य शुरु कर दिया जाएगा। जिसके बाद मशीन सुचारु रूप से कार्य करने लगेगी।
बड़ी संख्या में कैंसर मरीज आते हैं मेडिकल
मेडिकल में कैंसर के ट्रीटमेंट एवं दवाओं के लिए बड़ी संख्या में मरीज अस्पताल पहुंचते हैं। मरीजों का कहना है कि बाहरी अस्पताल या चिकित्सकों से इलाज कराने पर कैंसर मरीजों पर सिर्फ दवाओं का खर्चा ही करीब 15 से 20 हजार रुपये महीने तक का होता है। जो गरीब मरीजों की जद से बाहर है।
कैंसर पीड़ित मरीजों का कहना है कि अस्पताल में मशीन खराब होने के कारण उन्हें रेडियोथेरेपी की सुविधा नहीं मिल पा रही है। साथ ही अस्पताल में उन्हें दवाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। चिकित्सकों द्वारा उन्हें बाहर से दवाइयां लाने को कह दिया जाता है, जिसके कारण उन्हें बाहर मेडिकल स्टोर से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।
कैसे करती है कैंसर के इलाज में मदद
रेडिएशन थेरेपी कैंसर पीड़ित मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि यह उन्हें नई जिंदगी देकर उसे खुशियों से भर देते हैं। लेकिन यह काफी दुख की बात है कि मेडिकल चिकित्सालय में छह सालों से रेडियोथेरेपी मशीन खराब पड़ी है। जिसके कारण बड़ी संख्या में कैंसर मरीजों को इलाज का लाभ न मिलने के कारण दुख को झेलना पड़ रहा है। रेडिएशन थेरेपी को रेडियोथेरेपी भी कहा जाता है।
रेडिएशन थेरेपी कैंसर का इलाज करने का ऐसा तरीका है, जिसमें रेडिएशन किरणों के माध्यम से कैंसर के सेल्स को समाप्त किया जाता है। इसलिए रेडियोथेरेपी मशीन से रेडिएशन थेरेपी कैंसर को ठीक करने का सबसे आसान तरीका होता है। इसके साथ ही रेडिएशन थेरेपी कैंसर का इलाज करने के साथ-साथ भविष्य में कैंसर के होने की संभावना को भी कम कर देती है।
यदि रेडियोथेरेपी मशीन ठीक हो जाए तो लाखों लोगों की जान बच सकती है। बस मेडिकल प्रबंधन को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। वहीं, रेडिएशन थेरेपी मशीन से थेरेपी की शुरुआत सीटी स्कैन के साथ होती है। व्यक्ति को टेबल पर लिटाने के बाद रेडिएशन मशीन का इस्तेमाल करके उसके शरीर में बिन डालकर उसकी बीमारी का इलाज किया
जाता है।
टेक्नीशियन व फिजीशियन की भी कमी
रेडियोथेरेपी देने के लिए रेडिएशन आॅन्कोलॉजिस्ट, मेडिकल फिजिसिस्ट, रेडियोथेरेपी टेक्नोलॉजिस्ट, नर्सों सहित स्वास्थ्य पेशेवरों की एक टीम की आवश्यकता होती है। वहीं, मेडिकल के स्टाफ ने बताया कि यहां सिर्फ एक ही टेक्नीशियन उपलब्ध है। जबकि रेडियोथेरेपी प्रक्रिया के दौरान कम से कम तीन टेक्नीशियन की आवश्यकता होती है।
इसके साथ ही फिजिसिस्ट भी सिर्फ एक है। स्टाफ का कहना है कि फिजिसिस्ट व नए टेक्नीशियंस की तैनाती भी होनी चाहिए। जिससे इलाज में कोई कमी न रहे और समय भी बच सके। तीन टेक्नीशियंस का कार्य एक ही व्यक्ति को करने में अधिक समय लगता है।
दीवार पर लगाया मशीन बंद होने का नोटिस
कैंसर पीड़ित मरीजों को दीवार पर बंद मशीन का नोटिस चस्पा देखकर बहुत तकलीफ होती है। मरीजों का कहना है कि काफी दिनों से मेडिकल के चक्कर लगाकर थक चुके हैं। हर बार मशीन बंद होने की बात कहकर अस्पताल से वापस लौटा दिया जाता है। हर बार मेडिकल अस्पताल में आकर सिर्फ मायूसी ही हाथ लगती है। बंद कमरे में मशीन सालों से जंग खा रही है। कक्ष के बाहर ताला लगा हुआ है। कैंसर पीड़ित गरीब मरीजों का कहना है कि मशीन को जल्द ठीक कराया जाए। जिससे गरीब कैंसर मरीजों को इलाज में कोई परेशानी न हो।

