- सियासत का वो सितारा जो हाशिए पर चला गया
- किठौर के राजनीतिक घराने से ही थे सखावत हुसैन
जनवाणी संवाददाता |
किठौर: इंसान आता है, चला जाता है, मगर कुछ शख्सियतें ऐसी भी होती हैं, जिनको भूले नहीं भुला पाते। दुनिया से विदा होने के बाद भी वो लोगों के जेहन-ओ-जिक्र में जिंदा रहकर वक्त-बेवक्त प्रेरणा स्त्रोत का काम करते हैं। किठौर की एक ऐसी ही शख्सियत थे प्रधान सखावत हुसैन। सादगी, खुशमिजाजी और मिलनसार व्यवहार के बूते उन्होंने किठौर प्रधान से एमएलए तक का सफर तय किया। हालांकि अब उनका कोई सियासी वारिस नहीं मगर यादें अभी बाकी हैं।

किठौर में हाफिज लियाकत के यहां 1920 को जन्में सखावत हुसैन अपने परिवार की रिवायत के मुताबिक सफल राजनीतिज्ञ रहे। 1954 से 1971 तक किठौर प्रधान रहे। साथ ही कांग्रेस ज्वाइन कर प्रदेश की सियासत में भी सक्रिय हो गए। 1975 में आपातकाल के बाद कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में शामिल हुए। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर गढ़मुक्तेश्वर से जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे।
उन्होंने 1980 का विधानसभा चुनाव लोकदल के टिकट पर किठौर से लड़ा और कांग्रेस के भीम सिंह सीना से हार गए। तत्पश्चात वह 1985 में मुरादनगर से विधायक बनें। बाद में गाजियाबाद से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा मगर सफल नहीं हुए। वह प्यारेलाल शर्मा चेरिटेबिल टस्ट के पदाधिकारी भी रहे। मेरठ की नादिर अली बिल्डिंग में रह रहे उनके नाती हाजी परवेज बताते हैं कि जिंदगी के अंतिम कुछ वर्ष वह बसपा में भी रहे।
उर्दू और अंग्रेजी पर थी खास पकड़
हाजी परवेज बताते हैं कि शहर के फैज-आम कॉलेज से इंटरमीडिएट पास उनके नाना की उर्दू और अंग्रेजी पर खासी पकड़ थी। सखावत हुसैन फरार्टेदार अंग्रेजी बोलते थे।
विधायक होकर भी प्रधान ही कहलाएं
पूर्व विधायक सखावत हुसैन की सादगी पर लोगों के प्यार की बानगी देखिए कि विधायक होने के बावजूद वह प्रधान सखावत ही कहलाते रहे। किठौर में आज भी लोग उनको प्रधान सखावत ही कहते हैं। सखावत हुसैन फैसले लेने में भी अडिग थे। 2010 में उन्हें हज करने की इच्छा हुई। उन्होंने मोहसिना किदवई से मंशा जाहिर की तो मोहसिना ने कहा कि अगले साल दोनों साथ चलेंगे।
इस पर सखावत हुसैन ने दो टूक कहा कि यदि मैं अगले साल न रहा फिर और ऐसा ही हुआ। चंद दिनों में तैयारी कर वह अपने नाती परवेज के साथ हज को चले गए और वहां से लौटने के बाद 5 जनवरी 2010 को इंतकाल हो गया। चंद्रशेखर और चौधरी चरण सिंह के बहुत करीब रहे परवेज बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और चौधरी चरण सिंह से उनके नाना के पारिवारिक रिश्ते थे।

चंद्रशेखर जब भी मेरठ आते सखावत हुसैन से मुलाकात किए बिना दिल्ली नहीं लौटते थे। दोनों के ताल्लुकों में बेबाकी ऐसी कि कई बार देरी होने पर गाड़ी लेकर घर आ धमकते थे। वहीं चौधरी चरण सिंह से सखावत हुसैन की घनिष्टता ऐसी बताई जाती है कि 1972 में सखावत हुसैन की इकलौती संतान बेटी नुजहत परवीन की शादी थी। चौधरी चरण सिंह सखावत हुसैन के बुलावे पर शादी से दो दिन पहले उनके घर पहुंचे और शादी की तैयारियां कराईं।

