Thursday, May 14, 2026
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जनसंख्या पर भागवत की सलाह

Samvad 51


OP TRIPATHI 1अगले साल भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। जनसंख्या के लिहाज से वह चीन को पीछे छोड़ देगा। जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट में यह बात कही गई है। जनसंख्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इसकी वजह है विजयदशी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का भाषण। सरसंघचालक ने विजयदशमी के दिन जनसंख्या विस्फोट की समस्या पर चिंता जताई। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में जनसंख्या पर एक समग्र नीति बनाई जानी चाहिए जो सब पर समान रूप से लागू हो और किसी को इससे छूट नहीं मिले। भारत की जनसंख्या पर गौर करें तो सबसे प्रामाणिक आंकड़े 2011 की जनगणना के हैं। इसके आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल विवाहित महिलाओं की संख्या 33,96,21,277 थी जनमें 18,19,74,153 महिलाओं के दो या दो से कम बच्चे थे जबकि 15,76,47,124 के तीन या उससे ज्यादा संताने थी। यूएन के आंकड़ों में भारत की जनसंख्या के 142 करोड़ होने का अनुमान है। मौजूदा वक्त में जनसंख्या के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है। भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या को समस्याओं की बड़ी वजहों में से एक माना जाता रहा है। समय-समय पर संस्थाएं एवं विश्लेषक इस ओर इशारा करते रहे हैं। आइए इस रिपोर्ट में जानें भारत के लिए जनसंख्या विस्फोट क्यों बड़ी चुनौती है। हालांकि भारत में जनसंख्या-विस्फोट के हालात अब नहीं हैं। औसतन प्रजनन दर 2.1 के करीब स्थिर-सी लगती है, लेकिन आबादी की गति उसी तरह टिक-टिक कर बढ़ती जा रही है, जिस तरह ‘टाइम बम’ फटने से पहले आवाज करता है। भारत के संसाधन भी सीमित हैं। विश्व की करीब 2.45 फीसदी जमीन भारत के हिस्से में है, जबकि सिर्फ 4 फीसदी जल उपलब्ध है, लेकिन विश्व की 16-18 फीसदी जनसंख्या भारत में है। क्या ये समीकरण हमें भयभीत नहीं करते? क्या बढ़ती आबादी को हम सहजता से खिला-पिला सकते हैं? उसका सही भरण-पोषण कर सकते हैं? उसे बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छ पेयजल मुहैया करा सकते हैं?

ऐसे कई सवाल जेहन में उभर सकते हैं। सरसंघचालक भागवत ने सलाह दी है और देश का प्रत्येक जागरूक नागरिक भी यह सुझाव दे सकता है कि जनसंख्या-नियंत्रण पर समान और व्यापक नीति तैयार की जानी चाहिए। समान नीति हरेक समुदाय पर समान रूप से लागू होगी। इसे मुसलमानों को निशाना बनाकर, उनकी आबादी कम करने की, सरकार या संघी कोशिश न समझा जाए।

जनगणना के जो आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके मुताबिक 2019-20 के दौरान हिंदुओं की औसत प्रजनन दर 1.94 रही है, जबकि मुसलमानों में यह 2.36 थी। अंतर बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन भारत की कुल आबादी 142.1 करोड़ को छू चुकी है, जबकि चीन 142.6 करोड़ की आबादी के साथ पहले स्थान पर है। जनसंख्या के आंकड़े साफ दिखाते हैं कि हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा जा सकता है। मेरा-तेरा करने से काम नहीं चलेगा। दुनिया की आबादी इस साल 8 अरब हो जाएगी। वहीं, अगले साल भारत चीन को पछाड़ सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। समस्या आबादी नहीं है।

चुनौती यह है कि इतनी बड़ी आबादी को अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन कैसे मुहैया कराया जाए। इस चुनौती से मिलकर ही निपटा जा सकता है। इसका कोई दूसरा फॉर्मूला नहीं है। अब फोकस इस बात पर शिफ्ट हो चुका है कि हम गरीबी कितनी घटा सकते हैं। कितने लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। हेल्थकेयर फैसिलिटी के दायरे में कितने लोगों को लाया जा सकता है। विश्व के कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां जन-जन से जुड़े सभी प्रकार के विषयों और समस्याओं पर अनुसंधान किया जाता है। उन्हीं में से एक है स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, जिसके द्वारा विश्व जनसंख्या पर किए गए एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि विश्व में दूसरे स्थान पर रहने वाले देश भारतवर्ष की आबादी 78 वर्ष बाद अर्थात 2100 में 41 करोड़ घट जाएगी और जनसंख्या घनत्व भी कम हो जाएगा। वहीं चीन की आबादी 49 करोड़ पर सिमट जाएगी।
रिपोर्ट की मानें तो उसमें कहा गया है कि जब जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक होती है, तो उस आबादी के लिए ज्ञान और जीवन स्तर स्थिर हो जाता है, लेकिन यह शनै:-शनै: गायब भी हो जाता है, जो बेशक हानिकारक परिणाम भी है। आने वाले समय में भारत का जनसंख्या घनत्व काफी कम होने का अनुमान बताया गया है। आज भारत और चीन की आबादी एक जैसी दिखाई देती है, लेकिन घनत्व में बहुत बड़ा अंतर है। भारत में प्रति वर्ग किलोमीटर में औसतन 476 लोग रहते हैं, वहीं चीन में प्रति वर्ग किलोमीटर 148 लोग रहते हैं।

इस मसले पर केंद्र सरकार के मंत्रियों के अलग अलग स्वर सामने आते रहे हैं। पिछले महीने विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि जबरन जनसंख्या नियंत्रण के बहुत खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इससे लैगिक असंतुलन पैदा हो सकता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इस साल जुलाई महीने में कहा था कि जनसंख्या विस्फोट मुल्क की मुसीबत है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत बता चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाए जाने और दो बच्चों की नीति लागू करने की मांग वाली याचिका दाखिल गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अनिच्छा जताई थी। याचिका में दलील दी गई थी कि देश में जनसंख्या विस्फोट कई समस्याओं की जड़ है, लेकिन सर्वोच्च अदालत का कहना था कि कोई भी समाज शून्य समस्या वाला नहीं हो सकता है। सरकार को इस मसले पर नीतिगत निर्णय लेना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने 11 अक्टूबर तक के लिए सुनवाई टाल दी थी।

फिलहाल वक्त का सरोकार यह है कि जनसंख्या के असंतुलन को ठीक किया जाए। शहर और गांव के बीच यह असंतुलन अब भी भयावह है। व्यक्ति मजदूर है, गरीब है, झुग्गी-झोंपड़ी में रहने को विवश है, अनाज के लिए सरकार पर आश्रित है, लेकिन बच्चों की भीड़ पैदा कर रहा है। इस असंतुलन को दुरुस्त करना जरूरी है। संघ प्रमुख का सुझाव है कि धर्म पर आधारित जनसंख्या पर भी ध्यान देने की जरूरत है। समाधान तो समाज को जागरूक और शिक्षित करने से ही निकलेगा। इसके लिए देश के समस्त राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों को सोचना होगा कि ऐसी स्थिति में हम आप क्या करें और सरकार क्या करे?


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