Monday, February 16, 2026
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चुनावी चंदे से चांदी काटते कारपोरेट

Nazariya 22


इन दिनों चुनावी बॉन्डों को लेकर सर्वोच्च अदालत और उसके बाहर बहसा-बहसी जारी है। इस योजना पर कई में से कुछ आरोप हैं-सत्तारूढ पार्टी को चंदा देकर कारपोरेट, निजी हित साधना, सभी राजनीतिक पार्टियों को समान रूप से इसकी जानकारी न होना और आम वोटरों को चंदा देने और लेने वालों की कोई पहचान नहीं होना। वर्ष 2014 में बनी मौजूदा भारत सरकार, 2018 में चुनावी बॉन्ड योजना लेकर आई थी। यह अंधेरे में काला कपड़ा पहनकर लूट करने की संवैधानिक योजना थी जिसे तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकृति से तैयार किया था। इसके गुण-दोष व वैधानिकता पर विचार करने वाली याचिका वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय में पड़ी थी। कैसा गजब है कि ऐसे संवैधानिक मामले, जिनका देश के वर्तमान व भविष्य से निर्णायक संबंध है, न्यायालय पहुँच तो जाते हैं, लेकिन प्राथमिकता के आधार पर उनकी सुनवाई नहीं होती। न्यायालय ऐसे महत्वपूर्ण मामले को कब तक लटकाए रख सकता है, इसकी जवाबदेही होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक व संवैधानिक संरचना को यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतत: सब इसी संविधान की संतान हैं और यह संविधान भारत की जनता की संतान है। सार्वभौम सिर्फ जनता है जिसके प्रति संविधान की रोशनी में हर कोई जवाबदेह है।

ऐसे में सर्वोच्च अदालत में भारत के एटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी यह लिखित बयान कैसे दे रहे हैं कि भारत की जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि किस आदमी ने, किस पार्टी को कितना पैसा दिया है? जो सरकार जनता के वोट से बनती और जनता के नोट से चलती है, उस सरकार का कानूनी नुमाइंदा जब यह कहता है कि जनता को यह जानने का अधिकार है ही नहीं कि उसके पैसे का कौन, कैसा इस्तेमाल कर रहा है, तब वह असल में यह कह रहा होता है कि जनता की कोई हैसियत नहीं है। इन वेंकटरमणी महाशय को महीने की तनख्वाह जनता ही देती है और अदालतों की यह सारी व्यवस्था भी जनता के पैसों पर ही टिकी हुई है। ऐसे में यह कहना महान मूढ़ता या फिर महान अहमन्यता का प्रमाण है। यह देश की जनता की सार्वभौमिकता की अनदेखी है। इससे भी हैरानी की बात यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत ऐसा सरकारी दंभ सुन लेती है और चुप रहती है।

राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन कहां से मिले, यह यक्ष प्रश्न है। यह आर्थिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। तब सवाल यह उठता है कि चुनावी बॉन्ड योजना क्या चुनाव में धनपतियों के हस्तक्षेप पर रोक लगाती है? इस हस्तक्षेप को काबू में करने की कोई कोशिश अब तक प्रभावी नहीं हुई है क्योंकि राजनीतिक दल ईमानदार नहीं हैं। जरूरत ऐसा रास्ता खोजने की थी; और है, जिससे इस गठबंधन को तोडा जा सके, लेकिन सामने आई चुनावी बॉन्ड योजना।

चुनावी बॉन्ड वह अनैतिक योजना है जो बेईमानी को कानून-सम्मत बनाती है। दाता कौन है, यह पता नहीं है। आप पता करें, यह आपका अधिकार नहीं है। जिन्हें भीतरखाने पता है, वे इस खेल में शरीक हैं। इस तरह की गुमनामी धनबल से जनबल को परास्त करने का असंवैधानिक अधिकार देती है। इससे दाताओं को सत्ता का अभय मिलता है। इसलिए 2014 के बाद से भाजपा को अकूत धन मिलता रहा है। बाकी पार्टियां ‘सुदामा’ से ज्यादा हैसियत नहीं रखतीं। यह भाजपा का नहीं, सत्ता का कमाल है। कल को दूसरी कोई पार्टी सत्ता में होगी तो यह सारा धन उसकी तरफ बहने लगेगा। ऐसी व्यवस्था न नैतिक है, न लोकतांत्रिक और न ही संविधान-सम्मत। चुनावी बॉन्ड ऐसी सरकारी पहल थी जिसे न्यायपालिका को आगे बढ़कर निरस्त कर देना था, लेकिन ऐसा करना तो दूर, अदालत इसकी सुनवाई को ही तैयार नहीं हुई; और अब उसके सामने ही बगैर किसी रोक-टोक के सरकार कह रही है कि जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि सत्ता व धनपति मिलकर कैसा खेल रच रहे हैं। यह कानून जिस तरह अदालत के संवैधानिक अधिकार की तौहीन करता है, चुनाव बॉन्ड भी उसका वैसा ही मखौल उड़ाते हैं।

ऐसे में आखिर सवाल कौन पूछे और किससे पूछे? छापे वाला और फोटोवाला, दोनों मीडिया अब देश में कहीं बचा नहीं है। मीडिया के नाम पर सत्ता की जुगाली करते व्यापारिक संस्थान हैं जो कागज भी गंदा करते हैं और देश का मन भी। आज गजापट्टी में भी हमारे यहां से ज्यादा सार्थक मीडिया सांस लेता है। जब लोकतंत्र में से ‘लोक’ खत्म हो जाता है तब ‘तंत्र’ अपनी ही प्रतिध्वनि से आसमान गुंजाता है, अपनी ही सुनता-सुनाता है।


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