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गजब : ऐसे बदतर हालात, ख्वाब स्मार्ट सिटी के

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गजब : ऐसे बदतर हालात, ख्वाब स्मार्ट सिटी के
  • टूटी सड़कें, जाम, नाले नालियां, बगैर दरवाजों के टॉयलेट
  • जगह-जगह बजबजाती गंदगी से शहर नहीं बन सकता स्मार्ट

शेखर शर्मा |

मेरठ: नाम बदलने या फिर दावा भर कर देने से शहर को स्मार्ट नहीं बनाया जा सकता, इसके लिए जरूरी है कि लोगों को आधारभूत सुविधा दी जाएं। स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और यातायात सरीखी समस्याओं पर सतह पर काम किया जाए, लेकिन इस ओर ध्यान देने के बजाय सारा जोर नाम बदलने या फिर भावनाओं से जुड़ी चीजों को कुरदने पर दिया जा रहा है।

मूलभूत सुविधाओं को लेकर सिस्टम को चलाने वाले कितने गंभीर हैं? इसका अंदाजा शहर के वीआईपी सिविल लाइन इलाके को देखकर लगाया जा सकता है। पूरे जनपद की सड़कों का क्या हाल है? इसका भी अंदाजा सिविल लाइन में एसएसपी आवास से हजारी की प्याऊ वाले रास्ते को देखकर लगाया जा सकता है।

सिविल लाइन में न्याय विभाग व प्रशासन तथा पुलिस के तमाम अधिकारियों के आवास है, जब यहां यह हाल है तो पूरे जनपद की सड़कों का क्या हाल होगा, आसानी से समझा जा सकता है। दिल्ली रोड व रुड़की रोड सरीखे शहर के बीच से गुजरने वाले मेन हाइवे इस लायक नहीं रह गए हैं कि उन पर गाड़िया फर्राटा भर सकें। कमावेश यही स्थिति मवाना रोड और हापुड़ रोड की भी है।

दरअसल पिछले दिनों हुई झमाझम बारिश ने शहर की सड़कों का हुलिया बिगाड़ दिया। बागपत रोड़ से जुड़ी कालोनियों को जाने वाले रास्ते तो अब पैदल चलने लायक भी नहीं रह गए हैं। दावा भले ही स्मार्ट होने का कीजिए, लेकिन यदि सेहत ठीक नहीं तो सब बेकार है।

यहां बात मेरठ की बीमार स्वास्थ्य सेवाओं की जा रही है। सिस्टम चलाने वाले भले ही दावा कुछ भी करते हों। स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है यह कोरोना की पहली और दूसरी लहर में किसी से छिपा नहीं रह गया। आॅक्सीजन और बेड की कमी से न जाने कितनों की मौत हो गयी। हैरानी तो इस बात की है कि अभी भी हालात बहुत अच्छे नहीं। स्मार्ट तभी बनेंगे जब स्वास्थ्य और शिक्षित होंगे।

शिक्षा विभाग के स्कूलों की यदि बात की जाए तो बालिका ओं को पढ़ाने का दावा करने वाली सरकार के पास शायद इस बात का कोई जवाब न हो कि अच्छरौड़ा के स्कूल में टॉयलेट पर दरवाजे क्यों नहीं है। उसके टॉयलेट यूज करने लायक क्यों नहीं। वहां सांप, बिच्छू का डर हर वक्त क्यों सताता रहता है। इसकी तस्वीरें मौजूद हैं और तस्वीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं।

स्मार्ट सिटी को लेकर इंदौर से मुकाबले का दावा। इसके लिए निगम के अफसरों और पार्षदों को टूअर प्रोग्राम कराना इन तमाम कवायदों के बाद भी शहर कितना स्मार्ट हुआ है, इसे देखना है तो माधवपुरम से स्टे खत्ता रोड इलाके का एक राउंड लगा लीजिए।

यहां सड़क चलने के लिए नहीं बल्कि कूड़ा कचरा डालने के लिए यूज की जा रही है। लोगों का यहां जीना मुहाल है। नरक जैसे हालात बने हैं, स्मार्ट होने का दावा करने वाले यदि एक बार इस इलाके का चक्कर काट लें तो सारी गलतफहमी दूर हो जाएगी।

अभी तो काम शुरू होने का इंतजार

करीब सप्ताह भर पहले सूबे के सीएम ने समीक्षा बैठक के दौरान 20 अक्टूबर तक शहर को गड्ढा मुक्त किए जाने की हिदायत आला अफसरों को दी है। करीब 35 लाख की आबादी वाला यह जिला और एक माह की मोहलत। अभी काम तक शुरू नहीं किया जा सका है, जनपद की सड़कें कैसे गड्ढा मुक्त होंगी यह तो वक्त बताएगा। हालांकि हर साल इसी प्रकार के दावे सरकार की ओर से किए जाते हैं। यह बात अलग है कि इनका असर अफसरों पर आमतौर पर नजर नहीं आता।

मूलभूत सुविधाओं की किल्लत

शहर को स्मार्ट बनाने का दावा करने वाले टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधा को लेकर कितने गंभीर है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शहर में जगह-जगह टॉयलेट तो नगर निगम ने बनवा दिए हैं, लेकिन धोने के लिए उसमें पानी का इंतजाम नहीं है। टॉयलेट की यदि बात की जाए तो कुछ की छत तक गायब है। निगम प्रशासन के पास इतना वक्त नहीं कि कभी जाकर भारी भरकम रकम खर्च कर बनवाए गए टॉयलेटों की बदहाली की सुध ले लें।

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