Sunday, May 10, 2026
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पक्षियों की प्रजातियों पर संकट

Samvad


PANKAJ CHATURVEDI‘भारत में पक्षियों की स्थिति-2023’ रिपोर्ट के नतीजे नभचरों के लिए ही नहीं, धरती पर रहने वाले इंसानों के लिए भी खतरे की घंटी हैं। बीते 25 सालों के दौरान हमारी पक्षी विविधता पर बड़ा हमला हुआ है, कई प्रजाति लुप्त हो गर्इं तो बहुत की संख्या नगण्य पर आ गई। पक्षियों पर मंडरा रहा यह खतरा शिकार से कही ज्यादा विकास की नई अवधारणा के कारण उपजा है। एक तरफ बदलते मौसम ने पक्षियों के प्रजनन, पलायन और पर्यावास पर विषम असर डाला है तो अधिक फसल के लालच में खेतों में डाले गए कीटनाशक, विकास के नाम पर उजाड़े गए उनके पारंपरिक जंगल, नैसर्गिक परिवेश की कमी से उनके स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है। ऐसे ही कई कारण हैं, जिनके चलते हमारे गली-आंगन में पक्षियों की चहचहाहट कम होती जा रही है।

विदित हो पक्षियों के अध्ययन के लिए कई हजार पक्षी वैज्ञानिकों व प्रकृति प्रेमियों द्वारा लगभग एक करोड़ आकलन के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है। इसके लिए कोई 942 प्रजातियों के पक्षियों का अवलोकन किया गया। इनमें से 299 के बारे में बहुत कम आंकड़े मिल पाए। शेष बचे 643 प्रजातियों के आंकड़ों से जानकारी मिली कि 64 किस्म के चिड़िया बहुत तेजी से कम हो रही हैं, जबकि अन्य 78 किस्म की संख्या घट रही है। आंकड़े बताते हैं कि 189 प्रजाति के पक्षी न घट रहे है न बढ़ रहे हैं, लेकिन वे जल्द ही संकट में आ सकते हैं।

इस अध्ययन में पाया गया कि रैपटर्स अर्थात झपट्टा मार कर शिकार करने वाले नभचर तेजी से कम हो रहे हैं। इनमें बाज, चील, उल्लू आदि आते हैं। इसके अलावा समुद्री तट पर मिलने वाले पक्षी और बत्तखों की संख्या भी भयावह तरीके से घट रही है। वैसे भी नदी, तालाब जैसी जल निधियों के किनारे रहने वाले पक्षियों की संख्या घटी है। सुखद है, लेकिन आश्चर्यजनक कि एशियाई कोयल की संख्या बढ़ रही है, परंतु नीलकंठ सहित 14 ऐसे पक्षी हैं, जिनको घटती संख्या के चलते उन्हें आईयूसीएन की रेडलिस्ट में दर्ज करने कि अनुशंसा की है। रेड लिस्ट में संकटग्रस्त या लुप्त हो रहे जानवरों को रखा जाता है ।

जंगल में रहने वाले पक्षी जैसे कि कठफोडवा, सुग्गा या तोता, मैना, सातभाई की कई प्रजातियां, चिपका आदि की संख्या घटने के पीछे तेजी से घने जंगलों में कमी आने से जोड़ा जा रहा है। खेतों में पाए जाने वाले बटेर, लवा का कम होना जाहिर है कि फसल के जहरीले होने के कारण है। समुद्र तट पर पाए जाने वाले प्लोवर या चिखली, कर्ल, पानी में मिलने वाले गंगा चील बत्तख की संख्या बहुत गति से कम हो रही है। इसका मुख्य कारण समुद्र व तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण व अत्याधिक औद्योगिक व परिवहन गतिविधि का होना है।

घने जंगलों के मशहूर पूर्वोत्तर राज्यों में पक्षियों पर संकट बहुत चौंकाने वाला है। यहां 66 पक्षी-बिरादरी लगभग समाप्त होने के कगार पर हैं। इनमें 23 अरुणाचल प्रदेश में, 22 असम, सात मणिपुर, तीन मेघालय, चार मिजोरम, पांच नगालैंड और दो बिरादरी के पक्षी त्रिपुरा में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या गोडावण को तो अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने इसे संकटग्रस्त पक्षियों की सूची में शामिल किया है।

वर्ष 2011 में भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क क्षेत्रों में इनकी संख्या 250 थी जो 2018 तक 150 रह गई। भारत में इंडियन बस्टर्ड की बड़ी संख्या राजस्थान में मिलती है। चूंकि यह शुश्क क्षेत्र का पक्षी है, सो जैसे-जैसे रेगिस्तानी इलाकों में सिंचाई का विस्तार हुआ, इसका इलाका सिमटता गया। फिर इनके प्राकृतिक पर्यावासों पर सड़क, कारखाने, बंजर को हरियाली में बदलने के सरकारी प्रयोग शुरू हुए, नतीजा हुआ कि इस पक्षी को अंडे देने को भी जगह नहीं बची।

यही नहीं, जंगल में हाई टेंशन बिजली लाइन में फंस कर भी ये मारे गए। कॉर्बेट फाउंडेशन ने ऐसे कई मामलों का दस्तावेजीकरण किया, जहां बस्टर्ड निवास और उनके प्रवासी मार्गों में बिजली की लाइनें बनाई गई हैं। भारी वजन और घूमने के लिए सीमित क्षेत्र होने के कारण बस्टर्ड को इन विद्युत लाइनों से बचने में परेशानी होती है और अक्सर वे बिजली का शिकार हो जाते हैं।

यह केवल एक बानगी है। इसी तरह अंडमान टली या कलहंस या चंबल नदी के पानी में चतुराई से शिकार करने वाला हिमालयी पक्षी इंडियन स्कीमर या फिर नारकोंडम का धनेष; ये सभी पक्षी समाज में फैली भ्रांतियों और अंधविश्वास के चलते शिकारियों के हाथों मारे जा रहे हैं।

पालघाट के घने जंगलों में हरसंभव ऊंचाई पर रहने के लिए मशहूर नीलगिरी ब्लू रोबिन या शोलाकिली पक्षी की संख्या जिस तेजी से घट रही है, उससे साफ है कि अगले दशक में यह केवल किताबों में दर्ज रह जाएगा। बदलते मौसम के कारण एक तरफ साल दर साल ठंड के दिनों में आने वाले प्रवासी पक्षी कम हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ बढ़ती गर्मी के चलते कई पंछी ऊंचाई वाले स्थानों पर पलायन कर रहे हैं। लगातार विकास के नाम पर बस्ती में दशकों से लगे पेड़ों को काटने से भी कई पक्षी मारे जा रहे हैं।

उधर, कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने बहुत से पक्षियों के प्रिय भोजन कीड़े-मकोड़ों के नगण्य आकर दिया है। एक बात और, यह जलवायु परिवर्तन का ही प्रभाव है कि अब वैश्विक रूप से पक्षियों के लिए जानलेवा एविएशन मलेरिया और ऐसे ही संक्रामक रोगों का विस्तार हो रहा है। ताजा रिपोर्ट बताती है कि कोई सात फीसदी पक्षी ऐसी ही बीमारियों के कारण असामयिक मारे गए। पवन ऊर्जा के बड़े पंखों में फंसने, हवाई सेवा के विस्तार से पक्षियों के पर्यावास का दायरा घटने से भी इनकी संख्या घट रही है ।

पक्षियों के संख्या घटना असला में देश के समृद्ध जैव विविधता पर बड़ा हमला है। एक तरफ पक्षी घट रहे हैं, तो उनके आवास स्थल पेड़ों पर भी बड़ा संकट आया हुआ है। देश में न केवल वन का दायरा कम हो रहा है, बल्कि भारत में मिलने वाले कुल 3708 प्रजातियों में से 347 खतरे में हैं। इसरो के डाटा बेस ट्रीज आॅफ इंडिया के मुताबिक ऐसे पेड़ों की संख्या पर अधिक संकट है, जो लोकप्रिय पंछियों के आवास और भोजन के माध्यम हैं।

समझना होगा, जब तक पक्षी हैं, तब तक यह धरती इंसानों के रहने को मुफीद है। यह धर्म भी है, दर्शन भी और विज्ञान भी। यदि धरती को बचाना है तो पक्षियों के लिए अनिवार्य भोजन, नमी, धरती, जंगल, पर्यावास की चिंता समाज और सरकार दोनों को करनी होगी।


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