Wednesday, September 22, 2021
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Homeसंवाददुख में ईश्वर

दुख में ईश्वर

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तुम किसी अनजाने मार्ग से घूमते-घूमते परमात्मा के पास पहुंच गए हो, मंदिर करीब है, इसीलिए सुख बज रहा है। इस घड़ी को चूकना मत। इस घड़ी में तो जल्दी से खोजना, कहीं किनारे पर ही, हाथ के बढ़ाने से ही मंदिर का द्वार मिल जाएगा, लेकिन लोग दुख में याद करते हैं, सुख में भूल जाते हैं! सुख का अर्थ है, जब तुम्हारे जाने-अनजाने परमात्मा करीब होता है, चाहे जानो, चाहे न जानो! सुख जब तुम्हारे भीतर बजता है, तो इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा तुम्हारे बहुत करीब आ गया है।

दुख में तुम मंदिर से बहुत दूर पड़ गए हो, मंदिर से तुम्हारी अनंत दूरी है। दुख में तो भरोसा ही नहीं आता कि ईश्वर हो भी सकता है। दुख में कहां भरोसा आ सकता है! दुख में तो ऐसा लगता है, इस संसार में कोई नहीं है। दुख में तो ऐसा लगता है कि कोई शैतान चला रहा है इस संसार को।

कोई दुष्ट! दुख में तो ऐसा लगता है कि समाप्त कर लो अपने को-न कोई कृतज्ञता, न कोई धन्यवाद का भाव उठता, दुख में कैसे उठे, लेकिन लोग दुख में मंदिर जाते, मस्जिद जाते, भगवान को याद करते, प्रार्थना करते और सुख में भूल जाते हैं। सुख में मंदिर से दूरी घटती है।

सुख के क्षण में ही तुम करीब से करीब होते हो। उस समय सरक जाना। उस समय लेट जाना जमीन पर साष्टांग, रख देना सिर भूमि पर, ठंडी गीली लान पर लेट जाना, आंख बंद कर लेना, उस क्षण सोच लेना अपने को कि मिल रहे हो पृथ्वी के साथ, एक हो रहे पृथ्वी के साथ।

तुम पाओगे, कभी-कभी आ जाती है लहर, तरंग की तरह तुम्हारे भीतर प्राणों में कुछ कांप जाता है, कोई नयी बीन बजती। धीरे-धीरे पहचान हो जाएगी और धीरे-धीरे तुम्हें कला आ जाएगी।

तुम धीरे-धीरे पहचानने लगोगे कि कब इसके होने के क्षण होते हैं। कैसी दशा होती है, तुम्हारी जब यह निकटता में घट जाती है बात और कैसी दशा होती है, तुम्हारी जब यह मुश्किल होती है बात। फिर तुम पहचान पकड़ जाओगे।


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