
मुकेश पोपली |
बेरोजगारी से पीड़ित युवाओं के लिए एक परीक्षा के एक प्रश्नपत्र में एक सवाल पूछा गया, ‘दादी और नानी की सलाह में अंतर बताइए।’ जवाब विस्तार से लेकिन दौ सौ शब्दों में सीमित करते हुए देना था। कुछ प्रतियोगी सकपकाए, कुछ घबराए और कुछ मुस्कराए भी।
प्रतियोगियों की गजब वाली एकता जो उस समय सामने आई वैसी तो हमारे देश के विपक्ष को तो छोड़िए सत्ता पक्ष में भी कभी दिखाई नहीं दी। आप कहेंगे कि परीक्षा देने वालों का मकसद एक ही है कि नौकरी मिल जाए। विपक्ष का भी तो एक ही ख्वाब होता है कि वर्तमान सरकार को उखाड़ फेंका जाए। क्या कहा कि सभी नेता एक जैसी प्रवृत्ति नहीं रखते। आपको मालूम होना चाहिए कि सभी प्रतियोगी भी एक जैसी प्रवृत्ति के नहीं पाए जाते। कुछ वो प्रतियोगी होते हैं, जिनकी उम्र निकली जा रही है और इस बीच में केवल चार साल वाली नौकरी के लिए न चाहते हुए भी आवेदन करना पड़ता है। कुछ इस प्रवृत्ति के होते हैं कि उनके दादा, बाप, ताऊ तो दसवीं पास करके सरकारी नौकरियों में घुस गए जबकि हम तो एमए हैं, पीएचडी भी हैं, हम सफाई कर्मचारी भी बनने को तैयार हैं। कुछ ऐसे भी कि तनख़्वाह मोटी हो।
चूंकि यह प्रश्न पेपर का अंतिम प्रश्न था इसलिए चलती परीक्षा के अंतिम पंद्रह-बीस मिनट पहले कमरे में खुसर-पुसर शुरू हो गई। कमरे में मौजूद दोनों निरीक्षक एक-दूसरे का मुंह देखते हुए आपस में किसी अनहोनी की आशंका से परीक्षा कक्ष में चक्कर लगाने लगे। पता किया तो इस प्रश्न के बारे में पता चला। जो उग्र प्रवृत्ति के थे, वह उखड़ गए। मध्यम प्रवृत्ति वाले प्रतियोगी इसका उत्तर लिखने के लिए शरीर के तापमान को कम करने ‘सुविधाएं’ लिखे कक्ष की ओर कूच कर गए तो कुछ ने अपने सामने रखी पानी की बोतल का ढक्कन खोल दिया। जो बिना तैयारी के थे, वह मुस्करा रहे थे, बल्कि खिलखिला भी रहे थे। उनमें से ही एक ने कह दिया कि दादी-नानी माने पक्ष-विपक्ष। इतना कहते ही टीका-टिप्पणी शुरू। आजकल वैसे हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी राजनीति घुस आई है।
इस बहस के लिए कुछ प्रतियोगी पक्ष के तो कुछ विपक्ष और कुछ ऐसे भी जो केवल नामित हैं, या निर्दलीय हैं, तीन कोनों में जा कर बैठ गए और अपने आगामी कदम के बारे में विचार-विमर्श करने लगे। संसद-संसद का खेल शुरू हो गया और हंगामा भी। दोनों निरीक्षककभी इधर, कभी उधर।
सबसे पहले सत्ता पक्ष वालों को बोलने के लिए कहा गया। उनका कहना था कि इस तरह के प्रश्नों को अक्सर इसलिए पूछा जाता है, क्योंकि नौकरी में उच्चाधिकारियों द्वारा तरह-तरह की सलाह दी जाती हैं, जो आगामी योजनाओं के निर्माण में काम आती हैं। इस प्रकार के प्रश्नों से परीक्षार्थी का मन टटोला जाता है और बहुत बार परिणाम उलट-पुलट भी हो जाता है। पहले वाली सरकार के समय भी ऐसे प्रश्न पूछे गए हैं। जिनके अपने घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। यह देश है, इनकी नानी का घर नहीं है।
यह सुनकर विपक्ष वाले बिदक गए और बोले कि यह प्रश्न न तो हमारी किताबों में है और न ही किसी गाइड में। किसी कोचिंग वाले ने भी इस प्रकार के प्रश्न कभी हल कराए ही नहीं। यह परीक्षा सिर्फ एक बहाना है। फीस के नाम पर करोड़ों रुपया इकट्ठा कर लिया गया, गरीबों को और गरीब बना दिया गया। बेरोजगारों के साथ खिलवाड़ किया गया है। हम यह परीक्षा रद्द करवाना चाहते हैं। मंत्री जी का दौ सौ वोटों से जीतकर आना, फिर दौ सौ सदस्यों को लांघकर उनका मंत्री बन जाना और इस प्रश्न को केवल दौ सौ शब्दों तक सीमित कर देना महज इत्तेफाक नहीं कहा जा सकता। यह सत्ता पक्ष की सोची समझी साजिश है। हम इनकी दादागिरी नहीं चलने देंगे। यह कोई इनकी दादी का बाड़ा नहीं है।
कुछ देर तक हंगामा चलता ही रहा। तीसरा समूह सिर्फ मुस्कराने का काम कर रहा था, क्योंकि यह आग तो उन्होंने ही लगाई थी। दोनों निरीक्षकों ने बारी-बारी से ‘शांति बनाए रखें। इस परीक्षा में पास होने के लिए आपके घरवालों ने मन्नतें मानी हैं। वे लोग आपके बारे में क्या सोचेंगे? आप देश का भविष्य हैं। आप शांत हो जाइए ताकि परीक्षा की कार्यवाही जारी रखी जा सके।’
बेरोजगार थे, परीक्षा रद्द होने के डर से बेचारे मान गए। कुछ देर बाद मुख्य परीक्षा अधिकारी से कहकर समय को पंद्रह मिनट बढ़ा दिया गया और बाद में सबको एक कप चाय भी पिलाई गई। जबरदस्त टकराव के बावजूद एक बड़ा हादसा टल गया।


