Saturday, April 25, 2026
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उम्मीद: नूतन साल में क्या जाम से मिलेगी निजात?

  • अफसरों के दावे हवा-हवाई, अवैध कब्जों से गुलजार है पूरा शहर, नेता भी चहेतों को कब्जे कराने में सबसे आगे

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: गुजरे साल में यदि किसी मुसीबत का सबसे ज्यादा सामना शहर के लोगों ने किया तो वो है जाम। जाम के नाम पर बातें तो बहुत कहीं गयीं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। जाम की मुसीबत से मुक्त कराने का दम भरने पाले अफसरों ने चाहे वो मेडा के अफसर हो या फिर निगम प्रशासन के अथवा पुलिस के अफसर सभी ने दावे खूब किए, लेकिन किसी एक अफसर का दावा ऐसा नहीं जो जमीन पर नजर आता हो और तो और दावे करने वाले अफसर का ठिकाना सिविल लाइन एरिया है। जब सिविल लाइन ही जाम से बेहाल है तो बाकि शहर की बात करना अभी बेमाने होगी।

अवैध कब्जों पर अफसर क्यों हैं मौन?

वीआईपी में शुमार सिविल लाइन इलाके में हटवाने के बजाए अफसर कब्जों पर मौन बने है। पूरे शहर के अवैध कब्जे हटवाने का दम भरने वाले मेडा और नगर निगम के अफसर ही सिविल लाइन इलाके में सरकारी जमीन पर कर लिए गए अवैध कब्जों से पूरी तरह से बेखबर हैं। निगम के नगरायुक्त का कैंप कार्यालय और मेडा वीसी का मुख्य कार्यालय सिविल इलाके में पड़ता है। ये दोनों ही बडेÞ अफसर दिन में कई बार आते जाते हैं, लेकिन लगता है कि सड़क किनारे नाले नालियों की पटरी पर कर लिए गए अवैध कब्जे इन्हें या तो नजर नहीं आते या फिर मामला सेटिंग-गेटिंग का है।

यदि मामला सेटिंग-गेटिंग का भी नहीं है तो फिर इन दोनों अफसरों पर या तो ऊपरी दवाब है जो सड़क किनारे नाले नालियों पर किए गए कब्जों पर कार्रवाई के लिए हाथ खोलने के बजाए फिलहाल तो हाथ बांधे आ रहे हैं, वर्ना क्या वजह है जो मेडा आफिस से लेकर पुलिस लाइन तक सड़क पर किनारे होटल और ढाबे खुल गए हैं। यह हाल तो तब है जब पूरे दिन जाम सरीखे हालात रहते हैं। इस रास्ते से पुलिस प्रशासन के तमाम उच्च पदस्थ अफसरों का गाड़ियां यहां से गुजरती हैं, उसके बाद भी नजर नहीं पड़ना और कार्रवाई का ना किया जाना,

इससे लगता है कि जरूर इस सब के पीछे कोई ऐसा है जो सब पर भारी है। अवैध कब्जों की वजह से लगने वाले जाम में फंसने वालों को उम्मीद है कि निगम प्रशासन की नींद शायद टूट जाए। वैसे जो आसार नजर आ रहे हैं, उससे लगता नहीं कि कुछ होगा। यह बात इसलिए कही जा रही है, क्योंकि मेरठ महोत्सव पांच दिन चला। इन पांच दिनों में भी कई फड वाले वहीं अपने जगह पर जम रहे। कुछ को जरूर हटाया गया, लेकिन मेडा आॅफिस वालों को नहीं छुआ गया।

पैदल निकलना भी दुश्वार

शहर के कमिश्नरी चौराहे की सीमाएं थाना लालकुर्ती व सिविल लाइन से मिलती हैं, लेकिन जाम से निपटने के लिए इंतजाम की बाता करें तो यह चौराहा अफसरों को आईना दिखाने को काफी है। दो-दो थानों की कमिश्नरी, एसएसपी समेत कई पुलिस अफसरों के चंद कदम की दूरी पर बंगले उसके बाद भी सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक अवैध मार्केट गुलजार रहती है। यदि कोई जलसा या जुलूस आ जाए तो पैदल निकलना भी दुश्वार हो जाता है। जाम ना लगे इसके नाम पर तमाम काम होते हैं, लेकिन जो अवैध मार्केट है, बस उसे नहीं हटाया जाता।

हाईकोर्ट में विचाराधीन

शहर में जाम को लेकर दायर की गई जनहित याचिका हाईकोर्ट में विचाराधीन है। जनहित याचिका दायर करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट मनोज चौधरी निवासी मिशन कंपाउंड ने बताया कि सर्दी के अवकाश के चलते कोर्ट बंद थीं, कोर्ट खुलने जा रही हैं। उन्हें कोर्ट में रिज्वाइंटर दाखिल करना है। उन्होंने बताया कि तमाम साक्ष्य कोर्ट को सौंपे गए हैं।

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