जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: न पीठ पर बस्ता, न पैरों में छूते और न ही गर्म कपड़े। बैंच तो दूर की बात है बच्चों को टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। जी हां! जिले के बेसिक शिक्षा विभाग से संचालित कुछ स्कूलों को जोड़ अधिकांश स्कूलों की यही कहानी है।
शिक्षा पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद व्यवस्था चरमराई दिखाई दे रही है। क्योंकि जिला स्तर पर बैठ शिक्षाधिकारियों की सुस्ती और लापरवाही की वजह से न तो समय पर नौनिहालों को सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ मिल पा रहा है और न ही शिक्षण पूरी तरह से शिक्षण कार्य में रुचि दिखा रहे है।
सोमवार को जनवाणी टीम ने शहर के कुछ प्राथमिक विद्यालयों का भ्रमण किया तो वहा देखा गया कि कुछ विद्यालयों में छात्र बैंच की बजाये टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ने को मजबूर है तो कुछ विद्यालयों में बैंच तो हैं, लेकिन वह भी किसी के द्वारा विद्यालय को दान दी गई है। ऐसे में एक बैंच पर चार बच्चे बैठकर पढ़ाई कर रहे है। सोचने वाली बात ये है कि ऐसे में नौनिहाल अपने भविष्य की नींव कैसे रख पाएंगे।
मेन्यू के अनुसार नहीं हो रहा मिड-डे मील का वितरण
कक्षा एक से आठ तक के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील की बेहतर गुणवत्ता का दावा शिक्षाधिकारियों द्वारा किया जाता रहा हैं। इतना नहीं मिड-डे मील वितरण को लेकर शिक्षाधिकारियों द्वारा स्कूलों का निरीक्षण भी किया जाता है, लेकिन इसके बाद भी जिले के कुछ स्कूलों में मानक के अनुसार मिड-डे मील का वितरण नहीं किया जा रहा है।
मोहनपुरी स्थित एक प्राथमिक विद्यालय में मेन्यू के मुताबिक छात्र-छात्राओं को सोमवार को मौसमी फल दिया जाना था, लेकिन उन्हें चावल का वितरण किया गया।

यही हाल जिले के अन्य विद्यालयों का भी है। वहीं, बच्चों को भोजन से पहले हाथ साफ करने तक के लिए शिक्षकों द्वारा नहीं कहा जा रहा है।
आपसी सांठगांठ कर स्कूलों से गायब रहते हैं शिक्षक
अधिकारियों की लापरवाही के चलते अधिकांश बेसिक स्कूलों के शिक्षक आपस में सांठगांठ कर या तो स्कूल नहीं पहुंचते है या फिर हाजिरी लगा समय से पहले स्कूल से गायब हो जाते है।
यह हाल मोहनपुरी प्राथमिक विद्यालय में देखने को मिला जहां पांच में से केवल एक शिक्षिका के माध्यम से 102 छात्रों की कक्षा संचालित की जा रही थी।

पूछने पर शिक्षिका ने बताया कि कुछ कार्य की वजह से दो शिक्षामित्र व प्रधानाध्यापिक और एक शिक्षिका स्कूल से बाहर है। बेसिक शिक्षाधिकारी योेगेंद्र कुमार का कहना है कि कुछ समय पहले स्कूलों का औचक निरीक्षण किया गया था, जिसमें कमी मिलने पर शिक्षकों पर कार्रवाई भी की गई है।
यदि स्कूलों में शिक्षण कार्य समय पर नहीं होगा तो उन स्कूलों के खिलाफ आगे भी कार्रवाई होगी।
पैसा अभिभावकों के खाते में, जिम्मेदारी शिक्षकों के माथे
प्रदेश सरकार की नई योजना के मुताबिक यूनिफार्म खरीदने के लिए सीधे अभिभावकों के खाते में पैसे भेजे जा रहे हैं।
मगर गौर करने वाली बात यह है कि सरकार ने ड्रेस वितरण में होने वाली धांधली को तो रोक दिया, लेकिन क्या सभी बच्चों को ड्रेस मिल पा रही है इसका संज्ञान लेने वाला कोई निर्धारित किया या फिर नहीं।
बता दें कि ड्रेस वितरण का पैसे तो अभिभावकों के खाते में पहुंच रहा हैं,लेकिन इसे देखने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है। अब शिक्षक कैसे अभिभावकों पर दवाब बनाए कि वह बच्चों की यूनिफार्म बनाकर दे।
कुछ मामले ऐसे भी सामने आ रहा है। जिसमें अभिभावकों ने पैसा खर्च लिया है और बच्चे बिना यूनिफार्म के स्कूल पहुंच रहे हैं। जबकि खाते में बजट आ चुका है।

