Friday, January 27, 2023
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विपक्ष कितना है तैयार ?

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2024 के आम चुनाव के लिए विपक्ष ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। वैसे कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से ही इसकी शुरुआत हो गई थी। वो अलग बात है कि कांग्रेस स्वयं स्वीकार नहीं करती कि उसकी यात्रा का आम चुनाव से कोई संबंध हैं। पिछले एक दशक से देश की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस येन-केन-प्रकरेण सत्ता हासिल करने को आतुर है। और उसकी सारी कवायद आम चुनाव को लेकर ही है। भले ही भारत जोड़ो यात्रा का वृहत्तर परिप्रेक्ष्य हो और कांग्रेस यह दावा करे कि यह चुनावी नहीं है, पर उसके समर्थक भी अपनी ‘तपस्या’ की 2024 में विजयी चुनावी परिणति अवश्य देखना चाहेंगे। भारत जोड़ो यात्रा आगामी 30 जनवरी को श्रीनगर में समाप्त होगी, उससे पहले ही ‘हाथ से हाथ जोड़ो अभियान’ 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के मौके पर, शुरू होगा। उसमें कांग्रेस के चुनाव चिह्न ‘हाथ’ की भी नुमाइश की जाएगी। मंडल, जिला, राज्य स्तर पर कांग्रेस कार्यकतार्ओं में राहुल गांधी का पत्र वितरित किया जाएगा, जिसे मोदी सरकार के खिलाफ चार्जशीट कहा जा रहा है। यानी पत्र की विषय-वस्तु प्रधानमंत्री मोदी के विरोध पर ही टिकी होगी। कांग्रेस ‘हाथ अभियान’ के जरिए देश के 6 लाख गांवों, करीब 2.5 लाख पंचायतों और 10 लाख बूथों तक पहुंचने की कोशिश करेगी। इसे ‘मतदाता जोड़ो मिशन’ नाम भी दिया गया है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे से 23 विपक्षी नेताओं को आमंत्रण भिजवाया गया है कि वे 30 जनवरी, महात्मा गांधी की पुण्य-तिथि पर और ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के समापन समारोह के साक्षी बनने के लिए श्रीनगर पहुंचें। न्योता भेजने में ही सियासत की गई है, क्योंकि तेलंगाना की ‘भारत राष्ट्र समिति’ के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव, आंध्रप्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस तथा तेलुगूदेशम पार्टी, ओडिशा के बीजद एवं मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, दिल्ली-पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, असम की कांग्रेस सरकार में घटक पार्टी रही आॅल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट आदि को न्योता नहीं भेजा गया है।

क्या ये पार्टियां विपक्ष की मजबूत धुरियां नहीं हैं? क्या उनके नेता विपक्ष का महागठबंधन तैयार करने में महती भूमिका अदा नहीं करेंगे? हम ओवैसी की पार्टी को अलग रखते हैं, क्योंकि वह लोकतांत्रिक नहीं, मुस्लिमवादी पार्टी है। हालांकि वह भी कांग्रेस की सत्ता-साझेदार रह चुकी है। दरअसल इस शुरुआती कोशिश पर ही विपक्ष दरकने लगता है।

यानी कांग्रेस लोकसभा की करीब 100 सीटें तो छोड़ कर चल रही है, जिन पर उसे भरोसा है कि विपक्षी एकता नहीं हो पाएगी! इनके अलावा, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जद-यू एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद एवं बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती आदि नेता भी श्रीनगर जाएंगे, फिलहाल यह सवालिया है।

विपक्षी नेता अन्य सियासी दलों को यात्रा में शामिल होने के लिए मिल रहे न्योते को कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने से दूर रहने के लिए पार्टी सहयोगियों का दबाव झेलने वाले राहुल गांधी को 2024 के संसदीय चुनाव में भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश मान रहे हैं।

2024 में विपक्ष की बागडोर संभालने के लिए भूतपूर्व जनता दल के कुनबे को साथ लाने की जुगत है। जनता दल (यूनाइटेड), इंडियन नैशनल लोकदल (इनेलो), समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल…नीतीश कुमार ऐसी कोशिशों में लगे हैं कि दशकों तक बड़े-बड़े राज्यों पर राज करने वाली ये पार्टियां साथ आ जाएं।

पिछले दिनों जब संसद सत्र चल रहा था, नीतीश ने अपनी पार्टी के अध्यक्ष ललन सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से मिलने भेजा। गौड़ा के आवास पर हुई बैठक में सिंह का मेसेज साफ था -नीतीश की जेडी (यू) और देवेगौड़ा की जेडी (एस) का विलय हो जाना चाहिए। नीतीश चाहते हैं जनता दल के पुराने दिन वापस आ जाएं।

उनके प्लान का पहला हिस्सा- कुनबे से बिखरी पार्टियां एकजुट होकर नया मोर्चा बनाएं और विपक्ष में अहम भूमिका अदा करें। वह वीपी सिंह जैसा करिश्मा दोहराना चाहते हैं। दूसरे चरण में नीतीश का प्लान है कि क्षेत्रीय दलों को इस मोर्चे का साथ देने के लिए मनाया जाए। फिर तीसरे चरण में, कांग्रेस से समर्थन जुटाया जाएगा। अगर यह योजना फलीभूत नहीं होती तो आजमाया हुआ नुस्खा भी है- ज्यादा से ज्यादा गैर-बीजेपी दलों को एक मंच पर लाया जाए, फिर कांग्रेस से समर्थन मांगा जाए। नीतीश का प्लान अभी शुरुआती दौर में ही है। बिखर चुके कुनबे को एकजुट कर पाना इतना आसान नहीं।

इन सबके बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने 67वें जन्मदिन पर एक राजनीतिक ऐलान कर सभी को चैंका दिया है। उनके मुताबिक, इस साल कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के विधानसभा चुनावों में बसपा अकेले, अपने बलबूते पर ही चुनाव लड़ेगी। इतना ही नहीं, 2024 का लोकसभा चुनाव भी, गठबंधन के बिना ही, लड़ेगी।

मायावती ने साफ कहा है कि जो गठबंधन का भ्रम फैला रहे हैं और बसपा के साथ गठबंधन की योजनाएं बना रहे हैं, वे ऐसी कवायदें बंद कर दें। मायावती के ऐसे ऐलान की संभावना और अपेक्षा नहीं थी। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे ने उन्हें भी आमंत्रण भेजा था कि वह ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के समापन-समारोह में शामिल हों। उप्र, राजस्थान, मप्र, दिल्ली, पंजाब और कर्नाटक आदि राज्यों में बसपा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पक्ष है, जो विपक्षी एकता के प्रयासों को खंडित कर सकता है।

यदि 2024 में भाजपा और मोदी के पक्ष में बहुमत नहीं आता है, तो सवाल होगा कि सरकार कौन और कैसे बनाएगा? 2004 में जिस तरह कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बनाया गया था, तो उसमें विभिन्न गैर-भाजपा दलों को गोलबंद करने का प्रयास सीपीएम के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने किया था। आज वाममोर्चा बेहद कमजोर स्थिति में है और राहुल गांधी को नेता मानने पर असहमत है। तब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा सांसदों की संख्या भी काफी थी। आज सपा के 3-4 सांसद ही लोकसभा में हैं।

यदि यही स्थिति रहती है, तो कांग्रेस के लिए 53 से 100 सांसदों तक पहुंचना ही टेढ़ी खीर होगा। भारत जोड़ो यात्रा से भले ही कांग्रेस में थोड़ी ऊर्जा और आक्रामकता नजर आई हो, उसका चुनावी असर दिखना बाकी है। 2024 की लड़ाई में नरेंद्र मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का चेहरा कौन होगा? इस सवाल का जवाब चुनाव से पहले मिलना मुश्किल ही है। संभावना यह भी है कि नेता बनने की चाहत में विपक्षी दलों के बीच सहमति कभी बने ही नहीं। विपक्ष का बिखराव 2024 में मोदी का रास्ता आसान बनाएगा।


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