Monday, June 15, 2026
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सफल है मोदी के साथ जयशंकर का साथ

 

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भारत-अमेरिका के बीच हाल ही में टू प्लस टू वार्ता हुई। इसके अलावा भारत-अमेरिका आभासी शिखर सम्मेलन भी हुआ जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर, अमेरिका के रक्षा मंत्री लायड जे. आस्टिन, विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने शिरकत की। इस दौरान देश-दुनिया से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। टू प्लस टू वार्ता के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि भारत में मानवाधिकारों के मुद्दे पर अमेरिका की नजर है और उन्होंने भारत को ज्ञान देने की कोशिश भी की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका पर जोरदार पलटवार किया। भारत ने अमेरिका की आंख में आंख डालकर उसे जवाब दे दिया। यह पहला मौका है जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत को नसीहत देने वाले अमेरिका को इस तरह जवाब दिया कि उसे फजीहत झेलनी पड़ी।

इससे पहले भी एस. जयशंकर ने रूस से तेल की खरीद के मामले पर दो टूक कहा था कि भारत अपनी जरूरत के मुताबिक तेल खरीदता है। हम एक महीने में जितना तेल खरीदते हैं, उतना यूरोप एक दोपहर भर में खरीदता है। इस जवाब को सुनकर अमेरिका ने रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर अपना रुख नरम कर लिया और बयान जारी कर कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीद कर प्रतिबंधों का कोई उल्लंघन नहीं किया। इससे एस. जयशंकर की जय-जय हो रही है। यूक्र ेन और रूस के मसले पर भारत की कूटनीति की दुनियाभर में तारीफ हो रही है।

एस. जयशंकर ने मानवाधिकार मसले पर भी कह डाला कि जब भारतीय समुदाय के अमेरिका में मानवाधिकारों की बात की जाएगी तो भारत चुप नहीं बैठेगा। उन्होंने न्यूयार्क में सिख समुदाय के दो लोगों पर हमले का जिक्र कर अमेरिका को करारा जवाब दिया। अमेरिका को आईना दिखाने पर जयशंकर की कूटनीतिक क्षेत्रों में भी जमकर सराहना हो रही है। कूटनीतिक क्षेत्रों का कहना है कि अमेरिका को हमारे लोकतंत्र का अपमान करने का कोई हक नहीं है।

पूर्व में भी अमेरिका सीएए कानून और अल्पसंख्यक समुदाय से व्यवहार को लेकर भारत की आलोचना कर चुका है। भारत में मुस्लिमों को लेकर एक फर्जी नैरेटिव चलाया जा रहा है। उस पर कई देशों द्वारा ट्वीट किए जा रहे हैं। इनमें 14 प्रतिशत अकेले अमेरिका में बैठे लोगों द्वारा किए गए हैं। यह भी सच है कि भारत में मुस्लिम अरब देशों से भी कहीं अधिक सुरक्षित हैं। अपवाद स्वरूप कुछ घटनाएं जरूर होती रहती हैं। अमेरिका में पिछले एक दशक में नस्लीय भेदभाव भी काफी बढ़ चुका है।

अमेरिका की कुल जनसं?या में अश्वेत लोगों की आबादी सिर्फ 13 प्रतिशत है लेकिन अमेरिका की जेलों में बंद अश्वेत लोगों की सं?या 33 प्रतिशत से ज्यादा है जबकि वहां कुल आबादी में श्वेत अमेरिकी 76 प्रतिशत हैं लेकिन इसके बावजूद जेलों में बंद ऐसे लोगों की संख्या 3० प्रतिशत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका में अश्वेत नागरिकों के साथ नस्लीय भेदभाव होता है। वहां गोरे लोगों की तुलना में अश्वेत लोगों को 5 गुना ज्यादा जेल की सजा होती है। वहां अश्वेत नागरिकों की हत्या को लेकर आंदोलन भी लंबे समय से चलाया जा रहा है।

अमेरिका में तो एशिया मूल के लोग भी सुरक्षित नहीं हैं। वर्ष 2०2० में अमेरिका में अश्वेत नागरिकों के खिलाफ हिंसा की 2 हजार 871 घटनाएं हुई थीं। बंदूक संस्कृति के चलते रोज आम लोगों का खून बहाया जा रहा है। अमेरिका को लगता है कि दुनिया में मानवाधिकारों और लोकतंत्र की चिंता सिर्फ उसी को ही है जबकि दुनिया जानती है कि उसने केवल युद्ध उन्माद में इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में विध्वंस का कितना बड़ा खेल खेला। एक ग्लोबल सर्वे के मुताबिक अमेरिका के 59 फीसदी लोग वहां के लोकतंत्र से असंतुष्ट हैं जबकि भारत में अधिकांश लोग देश के लोकतंत्र से संतुष्ट हैं।

भारत के मुकाबले अमेरिका का लोकतंत्र काफी खोखला है, इसलिए बेवजह सरपंच बनकर दूसरों को नसीहत देना बंद करना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उसे करारा जवाब देकर भारत के आत्मस?मान का ही परिचय दिया है।
बहरहाल भारत के विदेश मंत्री के जवाब ने अमेरिका को इस बात का भान करा दिया है कि अब भारत बदल गया है। उसकी फारेन पालिसी बदल गई है। वो जवाब देना भी जानता है और वो भी जोरदार ढंग से तथ्यों के साथ। अमेरिका को दोनों ही बार दो टूक जवाब देने वाले एस जयशंकर मोदी सरकार पार्ट 1 में सुषमा स्वराज के साथ काम करते हुए प्रधानमंत्री के अनआफिशियल एडवाइजर के रूप में सक्रि य थे लेकिन 2०19 में जब सुषमा स्वराज की जगह किसी और को विदेश मंत्री बनाए जाने की बात आई तो पीएम मोदी ने एस जयशंकर पर भरोसा जताया। इसके पीछे की भी एक दिलचस्प कहानी है।

आपको याद होगा वो दौर जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कई देशों की यात्र की लेकिन कई देशों के राजदूतों से उस दौरान मोदी को उचित प्रोटोकाल नहीं मिला। वजह विश्व के चौधरी अमेरिका का 2002 के गुजरात दंगों की वजह से वीजा नहीं दिया जाना रहा लेकिन 2०12 का चीन दौरा मोदी के लिए काफी खास रहा। चीन के गणमान्य हस्तियों से मोदी की मुलाकात हुई और इसकी शुरूआत से लेकर पूरी पटकथा जिस शख्स ने लिखी, उसका नाम एस जयशंकर ही है |

जो उस वक्त बतौर भारतीय राजदूत चीन में तैनात थे। कहा जाता है कि वहीं से दोनों के बीच जो कैमिस्ट्री बनी, उसका उपयोग ज्योग्राफिक्ल इक्वेशन को साधने के लिए हालिया दिनों में किया जा रहा है। करीब तीन साल के कार्यकाल में जयशंकर ने साबित कर दिया है कि वह इस पद के लिए बेस्ट चाइस थे। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, चीन के बारे में भी जयशंकर की डिप्लोमेटिक समझ के लोग कायल हैं। हाल के दिनों में यूक्रेन और रूस की जंग के बीच जयशंकर ने रूस और अमेरिका दोनों को साध रखा है। एक भारत की तरफ से मध्यस्थता की बात करता नजर आता है तो दूसरा उसे अपना अहम साझेदार बताता है।

अशोक भाटिया


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