जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: वैदिक ज्योतिष के अनुसार, देवगुरु बृहस्पति 15 जुलाई से 9 अगस्त 2026 तक अस्त (दग्ध) रहेंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के मुताबिक इस दौरान विवाह, मुंडन, जनेऊ और अन्य मांगलिक कार्यों पर लगभग 25 दिनों तक विराम रहेगा। इस बार गुरु अस्त की अवधि चतुर्मास के साथ पड़ रही है, जिसके कारण धार्मिक दृष्टि से भी शुभ कार्यों को टालने की परंपरा है।
क्यों होता है गुरु अस्त?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, वर्तमान में बृहस्पति कर्क राशि के पुष्य नक्षत्र में गोचर कर रहे हैं। 16 जुलाई के आसपास सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश करने के बाद दोनों ग्रह एक-दूसरे के बेहद करीब आ जाएंगे। जब बृहस्पति सूर्य से लगभग 11 डिग्री के भीतर पहुंच जाता है, तो उसे ‘अस्त’ या ‘दग्ध’ माना जाता है। सूर्य की तेज आभा के कारण बृहस्पति दिखाई नहीं देता और ज्योतिष में उसके शुभ प्रभाव को कमजोर माना जाता है।
क्या होगा इसका प्रभाव?
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, बृहस्पति ज्ञान, धर्म, शिक्षा, संतान, समृद्धि और शुभता का कारक ग्रह है। इसके अस्त रहने की अवधि में कुछ लोगों को कार्यों में विलंब, निर्णय लेने में कठिनाई या अन्य प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति की जन्मकुंडली, ग्रह दशा और अन्य ज्योतिषीय योगों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।
इन राशियों को बरतनी होगी विशेष सावधानी
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, कर्क, धनु, मकर और मीन राशि के जातकों को इस अवधि में धैर्य और संयम के साथ कार्य करने की सलाह दी जाती है। महत्वपूर्ण फैसले सोच-समझकर लेने और अनावश्यक विवादों से बचने की भी सलाह दी जाती है।
इस दौरान क्या करना रहेगा शुभ?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु अस्त की अवधि में भगवान विष्णु की पूजा, गुरु बीज मंत्र का जाप, पीले वस्त्र एवं पीली वस्तुओं का दान, ध्यान और आध्यात्मिक साधना करना शुभ माना गया है। पुजारी उमेश नौटियाल के अनुसार, यह समय आत्मचिंतन और धार्मिक साधना के लिए अनुकूल है, जबकि विवाह और अन्य मांगलिक कार्य गुरु उदय होने के बाद करना अधिक शुभ माना जाता है।

