Wednesday, May 27, 2026
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बाजार के हवाले शिक्षा

Samvad


snehveer pundir 1भारत में शिक्षा को प्राचीन काल से ही बहुत सम्मानजनक स्थान दिया गया है। वेदों के अनुसार, ‘शैक्षणिक संस्थाएं एक देवालय के समान है जहां शिक्षा की सुगंध फैली होती है।’ भारत में शिक्षा के लिए गुरुकुल जैसी संस्थाएं बनाई गई, जहां राजा के बेटे को भी किसी बच्चे के साथ झोंपड़ी में ही रहकर शिक्षा प्राप्त करनी होती थी। लेकिन आधुनिक विश्व में अधिकतर शैक्षणिक संस्थाएं व्यवसायिक दुकानों में बदल दी गई है, जहां शिक्षा बेची जा रही है। वर्तमान व्यवस्था में अगर आपकी जेब जितनी भारी है आप अपने बच्चे के लिए उतनी ही बेहतर शिक्षा का प्रबंध कर सकते हैं। मैडिकल जैसी अति आवश्यक शिक्षा तो लगभग अमीर वर्ग के बच्चों के लिए सुरक्षित सी ही कर दी गई हैं। इसके अलावा भी बहुत कम खर्च में सरकार के भरोसे यानी समाज के पैसे से मिल जाने वाली आईआईएम और आईआईटी जैसी डिग्रियां भी बेहद महंगी कर दी गई हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में लगातार महंगी होती शिक्षा पर उचित टिप्पणी करते हुए कहा है कि शिक्षा लाभ कमाने का व्यवसाय नहीं है। असल में भारत का सर्वोच्च न्यायालय आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ मेडिकल कॉलेज की तरफ से दायर याचिका सुन रहा था, जिसके अनुसार कॉलेज ने बेतहाशा फीस वृद्धि कर दी।

गहराई से देखा जाए तो यह स्थिति केवल किसी एक राज्य की नहीं है बल्कि पूरे देश के हर प्रदेश में हर इलाके की है जिसमें शिक्षा का व्यवसायीकरण उसे महंगा दर महंगा करता जा रहा है। आजकल स्कूल कॉलेज खोलना सेवा का कार्य नहीं बल्कि केवल एक अच्छा कारोबार माना जाता है।

शिक्षा का यह निजीकरण आर्थिक सुधारों (कुछ लोगों के अनुसार, जिन्हें आर्थिक बिगाड़ कहा जाए तो ज्यादा सही होगा) के बाद इस तर्क के साथ बड़े स्तर पर शुरू किया गया था कि इससे देश में विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थान स्थापित होंगे जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी।

और देखते ही देखते देश में निजी शिक्षण संस्थानों और निजी मेडिकल कॉलेजों की बाढ़ आ गई। शहरों और कस्बों की गली-गली में प्राइवेट स्कूल और कॉलेज खुल गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजीकरण का रास्ता खुलते ही तमाम बड़े-बड़े अस्पताल, यूनिवर्सिटी, कॉलेज और आधुनिक सुविधाओं से लैस पब्लिक स्कूल खोले गए, लेकिन इन सब का प्रमुख उद्देश्य लोक कल्याण ना होकर केवल मुनाफा था।

सरकार द्वारा इस तरीके के सभी संस्थान केवल लोक कल्याण को ध्यान में रखकर खोले जाते रहे हैं। नेताओं और पूंजीपतियों के इस गठजोड़ ने इस मुनाफे के धंधे में घुसकर सभी नियम कानून बेमानी कर दिए। इन स्कूल कॉलेजों में मोटी फीस लेकर बच्चों का दाखिला किया जाने लगा और डिग्रियां बांटी जाने लगीं।

इसी के चलते प्रत्येक वर्ष यूजीसी द्वारा बहुत से विश्वविद्यालयों को ब्लैक लिस्ट भी किया जाता रहा है। बेतहाशा बढ़ती फीस पर लगाम के लिए समय समय पर सरकार और न्यायालयों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा, लेकिन इस गठजोड़ को ये सब प्रयास भी तोड़ नही पाए।

रोजाना बढ़ती फीसों ने अभिभावकों की कमर तोड़ कर रख दी, कहीं फार्मो के नाम पर तो कहीं किताबों के नाम पर और कहीं स्कूल की यूनिफार्म के नाम पर अभिभावकों का लगातार शोषण जारी है। हम सबको मालूम है कि एक अच्छे पब्लिक स्कूल में किसी बच्चे को पढ़ाने के लिए लगभग पांच से दस हजार प्रतिमाह तक का खर्च सामान्यत: करना पड़ता है।

जबकि हम सभी लोगों को यह भी अच्छे से मालूम है कि बेरोजगारी के इस दौर में शिक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ी डिग्री मानी जाने वाली पीएचडी के बाद भी तमाम ऐसे लोग हैं, जो अनुबंध पर अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। उनको वेतन के नाम पर आठ से दस हजार रुपए प्रतिमाह ही मिल पाता है।

पब्लिक स्कूलों में तो और भी कम वेतन पर अध्यापकों को रखा जाता है। और यह पैसा भी सामान्यत: उन्हें पूरे बारह महीने के लिए नहीं मिलता है बल्कि जब तक कॉलेज या स्कूल खुलता है, तभी तक उन्हें यह पैसा दिया जाता है। यानी कुल मिलाकर अधिकतम नौ से दस महीने का पैसा ही दिया जाता है।

अगर मेडिकल शिक्षा की बात करें तो किसी एक बच्चे को मेडिकल में मास्टर डिग्री करने के लिए लगभग एक से डेढ़ करोड़ रुपए तक का खर्च करना पड़ सकता है। स्वाभाविक है कि किसी भी सामान्य परिवार के लिए यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। अभी तक हम सभी लोग मनुवाद को कोसते चले आए हैं।

मनुवाद रहा था या नहीं, इस पर तो आपके विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन आज की इस मुक्त अर्थव्यवस्था में जिस मनीवाद का जन्म हुआ है, वह निर्विवाद है। बिना मनी के जैसे आप अपने बच्चे को किसी अच्छे स्कूल में दाखिल तक नहीं करा सकते, ऐसे ही आप किसी अच्छे अस्पताल में अपना इलाज भी नहीं करा सकते।

वहीं अगर आपके पास पर्याप्त धन है तो आप कोई भी डिग्री प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि करोड़ों रुपए लगाकर डॉक्टर बनने वाले ये लोग क्या जन कल्याण के लिए अपनी सेवाएं देंगे या केवल अधिक से अधिक धन कमाने के लिए? आए दिन सड़क पर पैदा होने वाले बच्चों और मृत शव तक को कंधों पर उठाए लोगों की खबरें और फोटो देखकर भी अगर हमारी संवेदनाएं नही जगती तो यह हमारे सभ्य होने पर एक प्रश्न चिन्ह है।

हमे रुक कर एक पल जरुर सोचना चाहिए कि मुनाफाखोरी के चलते कहीं हम अपने इंसानी मूल्यों ही से तो दूर नही निकल गए। एक तरफ जहां सातवें वेतन आयोग में एक अनपढ़ सफाईकर्मी को पंद्रह से बीस हजार, आठवी पास चपरासी को बीस से पच्चीस हजार रुपये तक वेतन दिया जाता है वहीं एक पीएचडी योग्यताधारी को पांच से दस हजार और वो भी केवल सात या आठ माह के लिए दिए जाने वाला वेतन क्या पूरी नौजवान पीढ़ी के साथ भद्दा मजाक नहीं है?

महंगाई के इस दौर में जब अधिकांश पब्लिक स्कूलों की फीस दो से दस हजार रुपये प्रतिमाह तक चुकानी पड़ रही हो, महंगाई ने दाल रोटी को भी आम आदमी की पहुंच से दूर खींचने में कोई कोर कसर न रख छोड़ी हो, एक जोड़ी सामान्य जूते की कीमत दो से पांच हजार रुपये तक हो गई हो, ऐसे में क्या इन पढ़े लिखे बेरोजगारों को व्यवस्था ने भगवान भरोसे रख छोड़ा है?

एक तरफ केंद्र सरकार लगातार कह रही है कि कोरोना काल के बाद से लगातार सरकार लगभग 80 करोड लोगों के लिए खाद्यान्न तक की व्यवस्था कर रही है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी अपने भोजन तक की व्यवस्था करने में सक्षम नहीं हो पाई है।

तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि करोड़ों रुपये खर्च करके मिलने वाली मेडिकल डिग्री हो या अति महंगी फीस पर कर दी गई आईआईएम और आईआईटी जैसी डिग्री केवल अमीर वर्ग के लिए सुरक्षित की जा रही है।


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