
विश्व के किसी भी देश में युद्ध, हिंसा, गदर, मारा-मारी की बातों का समाचार सुनते ही मन बैठ जाता है। फिर विश्व शांति की खोज में विश्व फलक के विद्वानों, दार्शनिकों, धर्मगुरुओं आदि के विचार मस्तिष्क में दौडने लगते हैं। मस्तिष्क मैक्समूलर के पास गया और उनके विचारों को पढ़ा। उन्होंने कहा था कि, ‘जब तक सत्य को न मानने वाले लोग मौजूद हैं, तब तक उसे बार-बार कहते रहने की जरूरत है।‘ विचार करें तो सत्य, विश्व शांति है और सभी जीवों की रक्षा है। सत्य ही कल्याण का मार्ग है, सत्य का कोई विकल्प नहीं है।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी अर्थात् सृष्टि का हर एक जीव ईश्वर का अंश है वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशी का है लेकिन चकाचौंध की इस दुनिया में कहीं भी सुख और शांति दिखाई नहीं दे रही है। चारों ओर मारामारी की घटनाओं के समाचार छपते रहते हैं।
वर्तमान में हो रहा रूस-यूक्र ेन युद्ध मानव शांति के लिए हानिकारक है। युद्ध की घटना को टीवी पर देख-सुनकर गांधी जी के विचारों को उनकी पुस्तकों में पढ़ने बैठ गया। ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश’ पुस्तक में गांधी जी लिखते हैं कि, ‘मैं स्वयं युद्ध का विरोधी हूं। इसीलिए मैंने अवसर मिलने पर भी कभी मारक अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना नहीं सीखा है। शायद इसीलिए मैं प्रत्यक्ष मानव संहार से बच सका हूँ।‘ लेकिन वर्तमान में तो विश्व के कितने ही देश परमाणु हथियार बनाकर पूरी मानव जाति को ही नहीं पूरी सृष्टि को संकट में डाले हुए हैं। एक बार परमाणु हमले की विनाश लीला को विश्व देख चुका है।’ क्या एक बार फिर से विश्व उसी दहलीज पर खड़ा है?
गांधी जी ‘सत्य ही ईश्वर है’ पुस्तक में लिखते हैं कि, ‘जहां तक मुझे दिखाई देता है, अणु बम ने उस श्रेष्ठ भावना की हत्या कर दी है, जो युगों से मानव जाति का आधार रही है। लड़ाई के कुछ नियम हुआ करते थे, जिनसे वह स‘ बनी हुई थी। अब हम नग्न सत्य जान गये हैं। अब ताकत के सिवा युद्ध का कोई कानून नहीं रहा। अणु-बम से मित्र राष्ट्रों की थोथी जीत तो हो गई पर साथ ही उसने थोड़े वक्त के लिए तो जापान की आत्मा का खून कर दिया है।’
वास्तव में एक देश दूसरे देश को और विश्व को अपनी ताकत दिखाने में लगा हुआ है। ताकत के इस खेल में आम जन, जीवों आदि को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। नभचर, थलचल, जलचर हर जगह तबाही के निशान देखे जा सकते हैं। पहले विनाश करो, फिर विनाश के काले धब्बे मिटाने का प्रयास करो, गांधी जी लिखते हैं कि, ‘बम की इस अत्यन्त करूण दुर्घटना से हमें सबक तो यह सीखना है कि जैसे प्रतिहिंसा से हिंसा नष्ट नहीं होती, वैसे ही जवाबी बमों से अणु-बम नष्ट नहीं होगा। मानव जाति को अहिंसा के द्वारा ही हिंसा से छुटकारा पाना होगा।’
युद्ध कभी किसी का भला नहीं कर सकता है। युद्ध की विभीषिका के कारण कितने ही लोग घर से बेघर हो जाते हैं, कितने ही लोगों का जीवन नष्ट हो जाता है जीवन सामान्य से परे भय, आशंका, त्रसदी में ही बीत जाता है। गलती किसकी, निर्णय किसका, भुगतान आम जन करता है। जैसे भी हो, दो देशों के बीच युद्धों की बातों को सदा के लिए रोकना होगा। उनके आपसी द्वंद्वों को शांति, भाईचारे, आपसी बातचीत से ही हल करना होगा।
डा. नीरज भारद्वाज


