Friday, July 30, 2021
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प्रतिरक्षा कोशिकाओं का अधिक उत्पादन भी खतरनाक

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वैज्ञानिकों के मुताबिक 1918 में फैले फ्लू और 2003 में सार्स महामारी (सार्स महामारी का कारण भी कोरोना वायरस परिवार का ही एक सदस्य था) के दौरान भी शायद इसी वजह से बड़े पैमाने पर मौत हुर्इं थीं। और शायद एच1एन1 स्वाइन फ़्लू में भी कई मरीजों की मौत, अपनी रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं के बागी हो जाने की वजह से ही हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि महामारियों वाले फ़्लू में मौत शायद वायरस की वजह से नहीं बल्कि मरीज के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक सक्रिय होने की वजह से होती है।

हाल ही में नोवेल कोरोनवायरस के कारण होने वाले रोग कोविड-19 से संक्रमित व्यक्तियों की जांच में पता चला है कि इस संक्रमण से ग्रसित व्यक्तियों में साइटोकिन स्टॉर्म की संभावना सबसे अधिक है। साइटोकिन स्टॉर्म प्रतिरक्षी कोशिकाओं एवं उनके सक्रिय यौगिकों (साइटोकिन्स) का अति उत्पादन है, जो फ्लू संक्रमण में अक्सर फेफड़ों में सक्रिय प्रतिरक्षी कोशिकाओं के बढ़ने से संबंधित होता है।

हमारे शरीर में जब भी कोई बैक्टीरिया या वायरस घुसता है तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उससे लड़ती है और उसे कमजोर करके खत्म कर देती है। लेकिन,कई बार हमारे शरीर के दुश्मन या बीमारी से लड़ने वाली कोशिकाओं की ये सेना बागी हो जाती है। जब हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर रोगों से लड़ने की बजाय हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगती है, तो उसे ‘साइटोकाइन स्टॉर्म’ कहते हैं।
शरीर में जब भी साइटोकाइन स्टॉर्म होता है तो ये सेहतमंद कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है। खून के लाल और सफेद सेल खत्म होने लगते हैं और जिगर को नुकसान पहुंचाते हैं। जानकारों का कहना है कि साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान मरीज को तेज बुखार और सिरदर्द होता है। कई मरीज कोमा में भी जा सकते हैं। ऐसे मरीज हमारी समझ से ज्यादा बीमार होते हैं। हालांकि अभी तक डॉक्टर इस परिस्थिति को महज समझ पाए हैं। जांच का कोई तरीका हमारे पास नहीं है। इसमें इम्यून सेल फेफड़ों के पास जमा हो जाते हैं और फेफड़ों पर हमला करते हैं। इस प्रक्रिया में खून की नसें फट जाती हैं।

उनसे खून रिसने लगता है और खून के थक्के बन जाते हैं। नतीजतन शरीर का ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। दिल, गुर्दे, फेफड़े और जिगर जैसे शरीर के नाजुक अंग काम करना बंद करने लगते हैं या कह सकते हैं कि ये शिथिल पड़ने लगते हैं। किसी भी फ्लू संक्रमण के मामले में एक साइटोकिन स्टॉर्म फेफड़ों में सक्रिय प्रतिरक्षी कोशिकाओं की वृद्धि के साथ संबंधित होता है जो एंटीजन से लड़ने के बजाय, फेफड़ों की सूजन एवं द्रव निर्माण तथा श्वसन संकट की स्थिति उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप रोगी के फेफड़ों की सूजन एवं उसके फेफड़ों में द्रव बनने से श्वसन संकट उत्पन्न हो सकता है और वह एक सेकेंड्री बैक्टीरियल निमोनिया से ग्रसित हो सकता है। जिससे अक्सर रोगी की मृत्यु हो जाती है। इस स्थिति को जांच और इलाज के बाद नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन कोविड-19 के मरीजों में इसे काबू करने के लिए क्या तरीका हो सकता है, फिलहाल कहना मुश्किल है।

आम तौर पर, साइटोकिन्स शरीर में प्रतिरक्षा प्रोटीन होते हैं। जो बाहरी बीमारियों से लड़ते हैं। लेकिन कोरोना के मामले में, यह गड़बड़ है। बर्मिंघम में अलबामा विश्वविद्यालय के डॉ. रैंडी क्रोन ने कहा कि साइटोकिन्स एक प्रतिरोधी प्रोटीन है जो हमारे शरीर में संक्रमण से लड़ सकता है। जब भी कोई बीमार हो जाता है, तो हर कोई अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली में विश्वास करता है कि वो उसे बचाएगी। यह शरीर में एक ऐसी चीज है जो बैक्टीरिया, बीमारियों और वायरस से लड़ती है। लेकिन अगर शरीर इससे लड़ता है और यह बाहरी रोगों से लड़ता है। इस मामले को साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम कहा जाता है। एक रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली रोग, बैक्टीरिया या वायरस से भ्रमित होती है। फिर शरीर में साइटोकिन प्रोटीन पैदा होते हैं। ये शरीर में अच्छी कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं। साइटोकिन स्टॉर्म किसी संक्रमण, आॅटो-इम्यून स्थिति या अन्य बीमारियों के कारण हो सकता है। इसके प्रारंभिक संकेतों एवं लक्षणों में तेज बुखार, शरीर में सूजन एवं लालिमा, गंभीर थकान एवं मितली आदि शामिल हैं।

साइटोकिन स्टॉर्म कोरोनोवायरस संक्रमित रोगियों में कोई विशेष लक्षण नहीं हैं। यह एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया है जो अन्य संक्रामक एवं गैर-संक्रामक रोगों के दौरान भी हो सकती है। साइटोकिन्स प्रोटीन को संकेत देते हैं जो स्थानीय उच्च सांद्रता में कोशिकाओं द्वारा जारी किए जाते हैं। साइटोकिन स्टॉर्म या साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के अति उत्पादन संबंधी विशेषता होती है और इस प्रक्रिया में शिथिलता का कारण स्वयं साइटोकिन्स होते हैं। अमेरिका में भी कोविड के मरीजों में साइटोकाइन स्टॉर्म का प्रकोप ज्यादा देखा गया है। डॉक्टरों का कहना है कि कोविड-19 के मरीजों में प्रतिरोधक क्षमता के सेल्स फेफड़ों पर बहुत जल्दी और इतनी तेजी से आक्रमण करते हैं कि फेफड़ों पर फाइब्रोसिस नाम के निशान बना देते हैं। ऐसा शायद वायरस की सक्रियता की वजह से होता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार, साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम संयुक्त राज्य में कोरोना वायरस से होने वाली 27 प्रतिशत मौतों का कारण है। लेकिन यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि साइटोकिन्स से पहले बुजुर्गों में कोई अन्य बीमारियां हैं या नहीं। 65 से 84 वर्ष की आयु के बीच डिमेंशिया से पीड़ित 3 से 11 प्रतिशत लोगों में साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम था।

55 से 64 वर्ष की आयु के केवल 1 से 3 प्रतिशत लोग मारे गए। 20 और 54 की उम्र के बीच के लोगों में 1 प्रतिशत से भी कम साइटोकिन पाए गए। जर्नल ‘साइंस एडवांस’ में प्रकाशित शोध के अनुसार कोविड-19 रोगियों में से 5 प्रतिशत से कम, जिनमें कुछ गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति भी शामिल थे, को साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम के रूप में जानी जाने वाली ‘हाइपरइन्फ्लेमेटरी’ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया थी।

कोविड-19 के मरीजों में साइटोकाइन स्टॉर्म पैदा होने की जानकारी दुनिया को वुहान के डॉक्टरों से ही मिली है। उन्होंने 29 मरीजों पर एक रिसर्च की और पाया कि उनमें आईएल-2 और आईएल-6 साइटोकाइन स्टोर्म के लक्षण थे। वुहान में ही 150 कोरोना केस पर की गई एक अन्य रिसर्च से ये भी पता चला कि कोविड से मरने वालों में आईएल-6 सीआरपी साइटोकाइन स्टोर्म के मॉलिक्यूलर इंडिकेटर ज्यादा थे। जबकि जो लोग बच गए थे उनमें इन इंडिकेटरों की उपस्थिति कम थी।

ऐसा पहली मर्तबा नहीं है कि साइटोकाइन स्टॉर्म का रिश्ता किसी महामारी से जोड़ कर देखा जा रहा है। इसे वर्ष 1918-20 में ‘स्पैनिश फ्लू’ महामारी के दौरान रोगी की मृत्यु होने के संभावित प्रमुख कारणों में एक माना जाता है। इस महामारी से विश्व भर में 50 मिलियन से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। और हाल के वर्षों में एच1एन1, स्वाइन फ्लू व एच5एन1 और बर्ड फ्लू के मामलों में भी इसके लक्षण देखने को मिले थे।

जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही असंतुलित हो जाएगी तो मौत होना तय है। हालांकि डेक्सामेथासोन और अन्य स्टेरॉयड की साइटोकिन स्टॉर्म इलाज के लिए सिफारिश की जाती है लेकिन उन मरीजों में ये दवाएं उल्टा असर कर सकती हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले ही कमजोर हो चुकी है। अपनी इम्यून सेल को बेकाबू होने से बचने के लिए जरूरी है कि रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही शांत किया जाए। इसके इलाज के लिए स्टेरॉयड ही पहली पसंद है। लेकिन कोविड के संदर्भ में अभी ये स्पष्ट नहीं है कि स्टेरॉयड इसमें लाभकारी होंगे या नहीं।
-शैलेंद्र चौहान


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