Tuesday, August 9, 2022
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जैविक खेती को बढ़ावा देना कृषकों के लिए हितकर

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अशोक ‘प्रवृद्ध’ |

रासायनिक रूप से उगाये गए एवं आनुवांशिक परिवर्तनयुक्त भोजन के खतरों के प्रति लोगों का मत विपरीत वृद्धि कर रहा है। असंख्य शोध अध्ययनों में यह प्रमाणित हो चुका है कि हानिकारक कृषि प्रणालियों के कारण उत्पन्न हुई मृदा क्षरण, बीज एवं मौसम के असंतुलन आदिसमस्त हानिकारक परंपराओं को जैविक कृषि प्रक्रियाओं के प्रयोग द्वारा रोका जा सकता है। इसलिए जैविक कृषि समय की मांग व जरूरत को देखते हुए जैविक कृषि को अपनाना ही कृषकों के लिए बेहतर होगा।

प्राचीन काल से ही भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर रहने के कारण ही कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का रीढ़ कहा व माना जाता हैं। बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अब बड़ी मात्रा में खाद्यान्न की आवश्यकता को देखते हुए किसान कम समय में ज्यादा उत्पादन प्राप्त करने के उद्देश्य से खेती करने के लिए जैविक खाद के स्थान पर रासायनिक खाद का उपयोग करने लगेहैं। रासायनिक खाद अर्थात प्रकृति से न मिलने वाले तत्वों की बनीखाद के तेजी से बढ़ते उपयोग के कारण आज हर ऋतु में बिन मौसम वाले फल व सब्जी भी आसानी से बाजारों में उपलब्ध हैं।

रासायनिक खाद के अधिकाधिक प्रयोग से कम समय में अधिक मात्रा मेंखाद्यान्न वस्तुओं का उत्पादन हो रहा है। रासायनिक खादों, कीटनाशकों व दवाओं की खेती में बढ़ती मात्रा से इसके गंभीर परिणाम निकलकर सामने आ रहे हैं। रासायनिक खेती से पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुंच रहा हैं। मृदा अपरदन के होने में सबसे बड़ा कारक रासायनिक खाद का बढ़ता प्रयोग ही है। वर्षा के समय रासायनिकतत्वों के जल में मिलने से यह जल को भी दूषित करता है। जिससे जल प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही हैं।

रासायनिक खाद के क्रय, जल के दुगुने व्यय से किसानों को अपनी लागत की तुलना में कम आय प्राप्त हो पाती है। जिसके कारण उन्हें आर्थिक संकटों से भी जूझना पड़ता है। रासायनिक खेती मानव, जीव- जंतु के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत ही हानिकारक है।

जैविक खेती, रासायनिक खेती की तुलना में अधिक सस्ती है। इसमें प्राकृतिक संसाधनों व फसल अवशेषों का सदुपयोग होता है, जिससे गंदगी भी कम फैलती हैं। मिट्टी के उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने, जल के अत्यधिक मात्रा में उपयोग पर अंकुश लगाने व जल प्रदूषण को रोकने के लिए एक माध्यम बनकर यह पर्यावरण मित्र भी सिद्ध होता है। पर्यावरण मित्र होने के नाते यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक है।

जैविक कृषि अर्थात खेती से प्राप्त फसल कृषक, मिट्टी एवं बीज में शुद्ध, स्वस्थ भोजन और जीवन के लिए पोषणकारी प्रभाव उत्पन्न करने वाली होने के कारण दीर्घकालिक सिद्ध हो सकती है। जैविक कृषि ही प्राकृतिक विधान के सामन्जस्य युक्त कृषि है, और किसान, उसकी फसल, एवं पर्यावरण का बड़े स्तर पर पोषण व समर्थन करती है। जैविक कृषि में जैविकतत्व, कुशलता तत्व, चेतना तत्व, प्रकृति की रचनात्मकता का वह तत्व है, जो पौधों के विकास की विभिन्न अवस्थाओं एवं पोषक तत्वों का सहायक होता है। जैविक कृषि व्यक्ति एवं प्रकृति के मध्य, व्यक्ति एवं समष्टि के मध्य संबंध को प्रगाढ़ करती है।

जैविक कृषि की तकनीक व्यक्ति एवं सामूहिक जीवन का संतुलन इस तरह से बनाती है कि इसके परिणाम स्वरूप प्रकृति संतुलित एवं सहयोगी बन जाती है। शुद्ध जैविक भोजन के लिए वर्तमान जैविक मानकों से उत्तम अत्यन्त कड़े मानकों को जैविक कृषि के उत्तरोतर वृद्धि से ही प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय प्राचीन कृषि तकनीकों के प्रयोग द्वारा, किसान उच्चतर चेतना तक उठ प्रकृति के समस्त नियमों के सामन्जस्य में जीवन जीने की प्रेरणा पा सकते हैं।

जैविकीय का प्रयोग पौधों की आंतरिक क्षमता में वृद्धि करने के लिए किया जाता है, जिससे प्राकृतिक गुणों से भरपूर उत्पादन, किसान के लिए एक स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण हो और वह प्रचुरता से स्वस्थ कृषि उत्पाद दे सके। जैविक कृषि का मूल सिद्धांत प्रकृति के कुशल हाथों को नियोजित करना है, कृषि उत्पादन को प्रभावित करने वाले घटकों की अत्यन्त जटिल संरचना को शांतता से व्यवस्थित करने के लिए पूर्ण प्राकृतिक विधानों का उपयोग करना है।

जैविक कृषि, प्राकृतिक विधानों की पूर्ण रचनात्मकसामर्थ्य को कृषि के प्रत्येक स्तर में अभिव्यक्त करती है। प्रकृति के समस्त नियम मृदा, बीज, ऋतुएं एवं किसान के सहयोग के लिए सहायक होते हैं, ताकि ऋतुएं समय पर आयें एवं फसलें प्रचुरता में हों।

भारत एवं वैश्विक बाजार में जैविक कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग के मद्देनजर अत्यन्त सरल भारतीय सनातन कृषि सिद्धांतों, प्राकृतिक विधानों को जैविक कृषि में जोड़ने से भारतीय किसान कृषि के क्षेत्र में क्रांति ला सकते हैं। भारतीय कृषक सर्वोत्तम कृषक हैं, वे आदि सनातन काल से ही प्राकृतिक कृषि का आधारभूत ज्ञान रखते हैं एवं अत्यन्त सरलता से प्राचीन काल से चली आ रही जैविक कृषि प्रक्रियाओं को आत्मसात कर सकते हैं। जैविक कृषि आत्म निर्भरता लायेगी, नागरिकों को और भारतीय शासन को राहत प्रदान करते हुए किसानों को अतिरिक्त आनंद प्राप्त होगा।

वर्तमान मेंकृषि की आधुनिक प्रणालियों ने प्रकृति के नियमों का उपयोग कर बीज एवं फसलों की आनुवंशिक विशेषता व मृदा संरचना को परिवर्तित करने एवं कृषि भूमि के अन्तिम छोर तक को उपयोग में लाने के लिए अनेकश: विधियां, प्रविधियां विकसित की हैं, तथा प्राकृतिक विधानों के आंशिक उपयोग के कारण से, प्रकृति में असाधारण असंतुलन की स्थितियां निर्मित हुई हैं। मृदा कटाव, क्षरण, एवं विषैले उर्वरकों एवं कीटनाशकों के हानिकारक प्रभावों से आनुवंशिक विनाश हुआ है।

पाश्चात्य वैज्ञानिकों के लाख प्रयासों के बाद भी प्रकृति के नियमों का समर्थन सुनिश्चित करने वाली कोई ऐसी आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। कृषि के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण घटक, ऋतुओं को समय पर आना सम्भव करा सकने की कोई विधि अब तक ढूंढी नहीं जा सकी। और तो और मौसम की सही सटीक जानकारी देने की प्रणाली अब तक विकसित नहीं की जा सकी। आज भी अधिकांशत: मौसम पूवार्नुमान गलत ही साबित होते हैं, जिन्हें देख लगता है, जैसे इतने पढ़े लिखे वैज्ञानिक मौसम की सिर्फ तुक लगाने के लिए यहां बैठे हैं।

उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतत रूप से अपनी विखंडित सतह को छोड़ देती है, और पथरीली भूमि के नीचे से मृदा की अपनी जीवंत सतह को पुन: धारण करती है। मानव के कुकृत्यों से मृदा का प्राकृतिक संतुलन बाधित होता चला गया और परिपक्व मृदा अधिक अथवा न्यून रूप से एक सतत गहराई एवं स्वरूप तक अनिश्चित समय तक अपना संरक्षण कर पाने में असमर्थ हो चली है।

मृदा क्षरण मानव कुप्रबंधन द्वारा तीव्रतर होता जा रहा है। मृदा के संतुलन को आक्रामक कृषि तकनीकों द्वारा, अनियंत्रित वनों की कटाई अथवा अत्यधिक निकासी, अत्यधिक पैदावार से प्राकृतिक संपदा का विनाश करके क्षति पहुंचायी जाती रही है।

मृदा का क्षरण मानव समाज एवं पर्यावरण के मध्य- असामन्जस्य का आधुनिक लक्षण है।देर से ही सही परन्तु वर्तमान में रासायनिक कृषि की अत्यन्त प्रदूषित एवं हानिकारक प्रक्रियाओं के प्रति भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में जागृति आई है, औरआनुवांशिकीय परिवर्तनयुक्त भोजन को उगाने एवं खाने के गंभीर परिणामों को लेकर लोग सचेत हुए हैं।


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